काशी के कुशवाहा ‘कान्‍त’: साहित्य में खामोश कर दिए गए एक अध्‍याय का 75वें साल में जगना


हिंदी साहित्य की धुंधली पगडंडियों पर कहीं पीछे छूट गए नामों और प्रसंगों को फिर से उजाले में लाने का एक भावपूर्ण प्रयास रविवार को बनारस में साकार हुआ, जब पत्रकार विजय विनीत की आगामी पुस्तक ‘काशी के कुशवाहा कान्‍त’ के आवरण का मड़ौली स्थित मेहता आर्ट गैलरी में लोकार्पण हुआ। इसी क्रम में चित्रकार अमित कुमार के तैलचित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन हुआ, जिसने इस आयोजन को रचनात्मकता की एक और गहराई प्रदान की।

कुशवाहा ‘कान्‍त’ का की हत्‍या हुए बीती फरवरी में 74 साल पूरे हुए हैं। उनकी मौत का रहस्‍य इतने साल बाद भी अनसुलझा है। वे बनारस के ऐसे उपन्यासकार थे, जिनके बागी तेवर और लेखनी की रुमानियत को आज भी याद किया जाता है। विजय विनीत ने सितम्‍बर 2022 में पहली बार कुशवाहा ‘कान्‍त’ को इतिहास की धूल से निकाला और उनके ऊपर न्‍यूजक्लिक पर एक लंबी कहानी लिखी थी। उसके बाद से ही वे कान्‍त पर किताब लिखने में लगे हुए थे।

प्रतिष्ठित चित्रकार मनीष खत्री द्वारा बनाए गए आवरण चित्र के लोकार्पण के अवसर पर नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री और कवि व्योमेश शुक्ल ने कहा कि यह कृति हिंदी साहित्य के उस महत्वपूर्ण, किंतु उपेक्षित अध्याय को केंद्र में लाती है जिसे समय की धूल ने लगभग ढंक दिया था। उनके अनुसार, लेखक ने काशी के इस चर्चित उपन्यासकार के जीवन और रचनात्मक संसार को एक नई, ईमानदार दृष्टि से देखने का साहस किया है- ऐसी दृष्टि, जो सतही चमक से दूर जाकर सच्चाइयों की गहराइयों में उतरती है। साथ ही यह किताब रहस्य, रूमान और अफवाहों के कुहासे को चीरते हुए कुशवाहा कान्‍त के व्यक्तित्व और सृजन के ठोस आयामों को उजागर करती है। यह केवल जीवनी नहीं, बल्कि साहित्य के भीतर छुपे सवालों की गंभीर पड़ताल है।



जाने-माने उद्घोषक अशोक आनंद ने कहा कि ‘काशी के कुशवाहा कान्‍त’ में संवेदना और संतुलन का ऐसा सधा हुआ मेल है, जो बिना किसी अतिनाटकीयता के अन्याय, उपेक्षा और सामाजिक विषमताओं की सच्चाइयों को पाठक के सामने रखता है। वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र दुबे ने विनीत की रचनाधर्मिता को रेखांकित किया और चित्रकार अमित कुमार की कला की सराहना की। अधिवक्ता मिथिलेश कुशवाहा, सुरेश सिंह और वरिष्ठ पत्रकार डा.अरविंद सिंह ने अमित कुमार के चित्रों की गहराई को सराहा।

इस मौके पर सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. लेनिन ने बताया कि पचास और साठ के दशक में हिंदी उपन्यास के पाठकों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले कुशवाहा कान्‍त को समझने के लिए यह पुस्तक एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदर्भ है। यह केवल साहित्य का अध्ययन नहीं, बल्कि उस दौर की सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक जटिलताओं को समझने का एक संवेदनशील माध्यम भी है।

कोरस–2026 नाम के के इस आयोजन में बनारस शहर के गणमान्य नागरिकों, प्रबुद्ध साहित्यकारों, कलाकारों और उद्यमियों की उपस्थिति रही। यह आयोजन स्मृतियों, सवालों और संवेदनाओं का एक ऐसा संगम था, जिसने उपस्थित हर व्यक्ति को भीतर तक छू लिया।


द्वारा-

अमित कुमार
मेहता आर्ट गैलरी


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