फ़लस्तीन-इज़रायल: सात दशक पुराना एक अंतहीन टकराव और ताज़ा अध्याय

विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने इज़रायल का सिर्फ रस्मी विरोध किया है क्योंकि दोनों देश लगातार अपने संबंध को इज़रायल के साथ मजबूत कर रहे हैं। यूएई ने इज़रायल में अपना दूतावास भी बनाया है और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध भी स्थापित हो चुके हैं। इसी का परिणाम है कि इज़रायल लगातार फ़लस्तीन को दबाने की कोशिश कर रहा है।

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अफगानी महिलाओं के लिए क्या गुलामी का नया अध्याय साबित होगी अमेरिकी सेना की वापसी?

करीमी और अन्य युवा महिलाएं जो पार्लर में काम कर रही हैं, उन्होंने कभी तालिबान के शासन का अनुभव नहीं किया, लेकिन वे सभी यह चिंता करती हैं कि अगर तालिबान सत्ता हासिल कर लेता है, तो उनके सपने खत्म हो जाएंगे।

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क्यूबा में कास्त्रो युग का अंत और समाजवाद के भविष्य से जुड़े कुछ सवाल

बीते 19 अप्रैल को कानेल राष्ट्रपति के साथ-साथ क्‍यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया यानि फर्स्ट सेक्रेटरी भी बन गए, जैसा कि विगत में फिदेल कास्त्रो और राऊल कास्त्रो थे। यह क्‍यूबन कम्युनिस्ट पार्टी का शीर्ष स्थान है। कानेल से क्‍यूबा के लोगों की अलग अपेक्षाएं हैं।

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ज्ञान की खोज में एक महापंडित और यायावर

ज्ञान की इतनी तीव्र पिपासा और जन-चेतना के प्रति निष्ठा ने राहुलजी के व्यक्तित्व को इतना प्रभा-मंडल दिया कि उसे मापना किसी आलोचक की सामर्थ्य के परे है। इसके अलावा जो सबसे बड़ी विशेषता थी- वह यह थी कि यश और प्रशंसा के ऊँचे शिखर पर पहुँचकर भी वे सहृदय मानव थे।

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लगातार धधक रही है उत्तराखंड के जंगलों में आग, चपेट में 11 जिले, वायुसेना काम पर

नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, हरिद्वार और रुद्रप्रयाग जिले ज्यादा प्रभावित हुए हैं। आग बेकाबू होती गई है, जिससे ग्रामीण दहशत में हैं और कई वन्य जीवों का जीवन संकट में है।

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घृणा और विरोध की एक चीख, जो आज भी सुनाई देती है…

जन्म के समय अपनी पहली चीख़ के बारे में स्वयं गोर्की ने लिखा है- ‘मुझे पूरा यकीन है कि वह घृणा और विरोध की चीख़ रही होगी।’ इस पहली चीख़ की घटना 1868 ई. की 28 मार्च की 2 बजे रात की है लेकिन घृणा और विरोध की यह चीख़ आज इतने वर्ष बाद भी सुनाई दे रही है। यह आज का कड़वा सच है और मैक्सिम गोर्की शब्दों का अर्थ भी है – बेहद कड़वा।

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आज के दौर में भगत सिंह को देखने का संदर्भ और दृष्टि क्या हो?

भगत सिंह का यह आह्वान काफी मूल्यवान है- खासकर ऐसे समय में, जब आज भी क्रान्तिकारी ताकतें दलितों पर होने वाले जातीय व व्यवस्था जनित उत्पीड़न के खिलाफ कोई कारगर हस्तक्षेप नहीं कर पा रही हैं।

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दांडी मार्च के 91 वर्ष: जन आंदोलन से आततायी सत्ताओं को झुकाया जा सकता है

आज की युवा पीढ़ी के दिमाग से इस घटना और इसके महत्व को बताने के लिए 91 साल पहले हुई उस ऐतिहासिक यात्रा के केंद्र पर उन स्मृतियों को सहेजने के लिए एक स्मारक बनाया गया है।

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महिला-मुक्ति और सम्मान का सवाल श्रम की मुक्ति के साथ नत्थी है, इसे नहीं भूलना चाहिए

आजादी के बाद समझौतावादी धारा का समर्थक धनी, पूंजीपति वर्ग सत्ता में आने के बाद निहित वर्ग-स्वार्थ के कारण महिलाओं की मुक्ति की दिशा में ठोस कदम उठाने से हमेशा परहेज करता रहा।

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सौ साल के रेणु: मनुष्य की परतदार यातनाओं का कथा-शिल्पी

वे अमूर्त से सैद्धान्तिक सवालों पर बहस नहीं करते थे। उनके विचारों का स्रोत कहीं बाहर-पुस्तकीय ज्ञान में न था, राजनीतिक हस्तक्षेप में उनका विश्वास बढ़ रहा था। उनके मन में एक आशा पनप रही थी। और जब ऐसा कुछ हुआ, तो रेणु अचानक सक्रिय हो गए।

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