इस शहर की बाकी गवाहियां सुनना अभी बाकी है…


लाल बत्ती पर 201 सेकंड- तीन मिनट इक्कीस सेकंड। इतने समय में आदमी अपने जीवन के कई फैसलों पर पुनर्विचार कर सकता है। मैंने फिलहाल गुड़गांव में घर लेने वाले फैसले को चुना। बाकी फैसलों के लिए आगे और चौराहे थे।

मैं दुनिया का सबसे उबाऊ आदमी हूँ। मेरी पत्नी इसकी गवाही दे सकती हैं। बच्चे को स्कूल छोड़ना, वापस लाना, उसकी पढ़ाई के सिलसिले में निकलना और घर लौटना। मेरे जीवन में रोमांच का इतना ही बजट है। गुड़गांव उस बजट में भी पूरा मनोरंजन उपलब्ध करा देता है।

मैं वास्तुकार हूँ। इमारतों को देखकर खुश हो सकता हूँ। उनका अनुपात, सामने का खुलापन, धूप आने की गुंजाइश, लेकिन बच्चे के साथ सड़क पर निकलते ही मेरी पेशेवर रुचि कुछ छोटी हो जाती है। अब सवाल यह है कि मोड़ कहाँ से लेना है, सामने वाला अचानक कहाँ जाएगा और घर कब पहुँचेंगे। ऊपर देखिए तो शहर का आत्मविश्वास दिखाई देता है। नीचे देखिए तो अपनी गाड़ी बचाइए। स्वागत है। अब रास्ता खुद निकालिए।


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रास्ते में भाजपा के स्वागत वाले बोर्ड दिखाई देते हैं। स्वागत करने की इच्छा प्रबल है। आने वाले को यह भरोसा हो जाता है कि उसके यहाँ पहुँचने से किसी को खुशी हुई है। अब वह आगे कैसे पहुँचेगा, यह उसका निजी मामला है।

एक भाई साहब नीली टी-शर्ट में थे। उस पर ‘Oliver’ लिखा था। फोन देखते हुए चल रहे थे और लगभग गिरते-गिरते बचे। एक पल के लिए लगा कि शरीर और मोबाइल अलग-अलग दिशाओं में विकास कर रहे हैं। शरीर को सड़क चाहिए थी। मोबाइल को ध्यान। दोनों में समझौता होते-होते बचा।

एक ऑटो पर AK-47 का स्टिकर था। सड़क पर जगह माँगने का यह तरीका मुझे कुछ अधिक स्पष्ट लगा। फिर डीपीएस की बस दिखाई दी। दूध के कैन लेकर जाता एक साइकिल वाला भी। इन्हीं सड़कों पर बच्चे स्कूल पहुँचते हैं और दूध घर पहुँचता है। दोनों यात्राओं की रफ्तार, सुरक्षा और साधन कितने अलग हैं।

कार के भीतर बैठकर मैं अपनी देरी गिन रहा था। साइकिल वाले की देरी का हिसाब मेरे पास नहीं था। उसकी तरफ से कहानी लिख देना आसान होता। उससे पूछना अधिक ईमानदार होता। उस दिन मैंने उससे बात नहीं की। इसलिए उसके बारे में उतना ही कह सकता हूँ जितना देखा। वह दूध के कैन लेकर उस सड़क पर जा रहा था जिस पर मुझे कार में भी सावधान रहना पड़ रहा था।

कार डिटेलिंग की दुकान दिखाई दी। नाम था ‘Wings’। गाड़ियों की सुंदरता को लेकर हमारी चिंता देखकर अच्छा लगा। उनकी चमक बचाने के लिए बाकायदा विशेषज्ञ हैं। सड़क के उस हिस्से के लिए किस विशेषज्ञ से मिलना चाहिए, जहाँ पहुँचकर गाड़ी के भीतर बैठे आदमी का पूरा शरीर हिल जाता है, यह मुझे नहीं मालूम।

एक बड़ा झटका लगा तो बातचीत भी टूट गई। सड़क ने अपनी टिप्पणी दर्ज करा दी थी।


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वास्तुकला में हम प्रवेश-द्वार पर बहुत मेहनत करते हैं। तस्वीर में वह अच्छा दिखता है। मगर किसी इमारत तक पहुँचने का अनुभव उसके गेट से काफी पहले शुरू हो जाता है। फुटपाथ कहाँ है, सड़क कैसे पार होगी, बच्चा कहाँ उतरेगा, बारिश में कहाँ पैर रखेंगे। इन सवालों का उत्तर केवल चमकदार लॉबी नहीं दे सकती।

मेरे लिए इस सफर का सबसे असहज हिस्सा यही है। मैं इमारत और शहर को अलग-अलग देखने की सुविधा खो देता हूँ। किसी परिसर की अच्छी योजना की तारीफ करते समय उसके बाहर की यात्रा भी याद आती है। घर का पता शानदार हो सकता है। घर पहुँचने का रास्ता भी जीवन का हिस्सा है।

रास्ते की पान की गुमटियों में भी एक छोटा-सा संसार है। मेरे अनुभव में सिगरेट का भाव एक जगह से दूसरी जगह बदल जाता है। कहीं एक रुपया ऊपर, कहीं दो रुपये, कहीं एक रुपया कम। शहर में एक ही चीज़ खरीदने के लिए भी अपने इलाके का ज्ञान चाहिए।

काँच की बड़ी इमारतों को देखते हुए हम ऐसी दुकानों को दृश्य के किनारे रख देते हैं, लेकिन सड़क पर चलते आदमी की जरूरत कई बार वहीं पूरी होती है। शहर की पहचान में उनका नाम छोटा है। रोज़मर्रा में उनकी जगह छोटी नहीं।

फिर मोमो की दुकान दिखाई दी, पीछे खाली मैदान। सड़क पर चलते हुए दिमाग कहानियाँ बनाने लगता है। यहाँ काम करने वाले कहाँ रहते होंगे, कितनी दूर से आते होंगे, कब लौटते होंगे, लेकिन मैदान देखकर किसी का घर तय नहीं किया जा सकता। मेरे पास सवाल थे, उत्तर नहीं। शायद शहर को समझने की शुरुआत वहीं होती है जहाँ हम अपनी चतुर टिप्पणी रोककर किसी से उसका हाल पूछते हैं।


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बच्चे को लाने-ले जाने का रास्ता किसी नगर-योजना की रिपोर्ट जैसा नहीं दिखता। उसमें बस, ऑटो, साइकिल, दुकान, फोन देखता पैदल आदमी और जल्दी में निकला एक पिता होता है, लेकिन शहर की योजना आखिर इन्हीं के बीच काम करनी है।

मेरे पास कार है। मैं बैठकर शिकायत कर सकता हूँ। इस सुविधा को भूलकर अपनी परेशानी को सबकी परेशानी कहना ठीक नहीं होगा। फिर भी, मेरा छोटा-सा सफर एक सवाल छोड़ता है: अगर मेरे लिए यह रास्ता इतना उलझा हुआ है, तो उस आदमी का सफर कैसा होगा जिसे यहाँ पैदल चलना है?

इसका जवाब मुझे कार की खिड़की से पूरा नहीं मिलेगा। कभी उतरना पड़ेगा। दूध के कैन वाले साइकिल सवार से, दुकान चलाने वाले से, बच्चे के साथ सड़क पार करते किसी अभिभावक से बात करनी पड़ेगी। अभी मेरे पास अपने सफर की गवाही है। शहर की बाकी गवाहियाँ सुनना बाकी है।

आखिरकार मैं अपनी मंजिल पर पहुँचा। उस दिन का साधारण काम पूरा हुआ। बच्चे को लेकर निकला था, शहर के बारे में कुछ और सवाल लेकर लौटा। अगली बार फिर वही रास्ता होगा। वही जल्दी। शायद फिर कोई लाल बत्ती।