जैसे-जैसे सोनम वांगचुक का सत्याग्रह जंतर-मंतर पर तीसरे सप्ताह में प्रवेश कर रहा है, वैसे-वैसे इस आंदोलन से जुड़े सवाल बदलने लगे हैं।
यह आंदोलन केवल किसी एक परीक्षा या किसी एक पेपर लीक का विरोध नहीं था। यह देश की शिक्षा व्यवस्था, भर्ती परीक्षाओं में लगातार हो रही धांधलियों, बेरोज़गारी और युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ के खिलाफ उभरा था। यही कारण है कि इसने केवल छात्रों को नहीं, बल्कि अभिभावकों, मध्यम वर्ग और करोड़ों युवाओं को गहराई से प्रभावित किया।
कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में यह धरना 20 जून से चल रहा है। सोनम वांगचुक ने 28 जून को अपना अनिश्चितकालीन उपवास शुरू किया। उनके साथ छह छात्र नेता और कार्यकर्ता- आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा, जेएनयू छात्रसंघ के संयुक्त सचिव दानिश अली, मनीष, दीपक, ऋषिकेश और अमीन और उनके साथ कई अन्य छात्र-युवा भी आमरण अनशन पर बैठे हैं। अनशनकारियों की तबीयत लगातार बिगड़ रही है। सत्रहवें दिन तक सोनम वांगचुक का लगभग साढ़े आठ किलो वज़न कम हो चुका था। दानिश अली को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। दूसरों को भी चिकित्सकीय देखभाल की ज़रूरत पड़ी है। स्वाभाविक है कि लोगों की चिंता बढ़ रही है। इसी के साथ दो तरह के सवाल लगातार सामने आ रहे हैं।
संदेह के महान क्षण में
पहला, विपक्ष कहां है? राहुल गांधी क्यों नहीं आए? अखिलेश यादव, ममता बनर्जी और दूसरे विपक्षी नेता जंतर-मंतर पर आकर इन युवाओं के साथ क्यों नहीं बैठे? दूसरा, सोनम वांगचुक और बाकी को अब अपना उपवास समाप्त कर देना चाहिए, चूंकि उन्होंने देश का ध्यान इस मुद्दे की ओर खींच दिया है इसलिए अब अपनी जान जोखिम में डालने का क्या औचित्य?
दोनों सवाल सुनने में महत्वपूर्ण लगते हैं। मुझे लगता है कि दोनों ही हमें असली मुद्दे से भटका रहे हैं। असल सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी जंतर-मंतर क्यों नहीं पहुंचे। असल सवाल यह है कि देश भर के युवाओं के इतने बड़े आंदोलन के बावजूद केंद्र सरकार चुप क्यों है? धर्मेंद्र प्रधान अब तक इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे हैं? सरकार इस पूरे संकट पर जवाब देने से क्यों बच रही है?
राहुल गांधी कहां हैं– सवाल नहीं राजनीतिक जाल है!
इस सवाल का जवाब देने से पहले हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। 2011 का इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन याद कीजिए। अन्ना हजारे का अनशन पूरे देश का केंद्र बन गया था। टीवी चैनल चौबीसों घंटे उसी को दिखा रहे थे। देश भर में धरने हुए। बाद में उसी आंदोलन से आम आदमी पार्टी निकली। आज पीछे मुड़कर देखें तो उस आंदोलन को लेकर तरह-तरह की बहसें हुईं। बहुत लोगों ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उस आंदोलन का राजनीतिक लाभ उठाया। इन बातों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इतना तो साफ है कि उस आंदोलन के बाद भारतीय राजनीति की दिशा बदल गई।
आज परिस्थिति बिल्कुल अलग है। आज भाजपा सत्ता में है। इस बार उसके सामने युवाओं का आंदोलन खड़ा है। शिक्षा मंत्री खुद आंदोलन के निशाने पर हैं। इसलिए सरकार एक अवसर तलाश रही है कि असली मुद्दे से ध्यान हटाया जा सके। जरा कल्पना कीजिए कि कल राहुल गांधी, अखिलेश यादव और कांग्रेस का पूरा शीर्ष नेतृत्व जंतर-मंतर पहुंच जाए। क्या होगा? क्या अगले दिन टीवी चैनलों पर शिक्षा व्यवस्था की चर्चा होगी? क्या धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा मांगा जाएगा? क्या लाखों युवाओं की परीक्षा व्यवस्था पर बहस होगी? बिल्कुल नहीं। उलटे पूरा विमर्श बदल जाएगा।
पूरा गोदी मीडिया और उनकी ट्रोल आर्मी यही बहस फैलाएगी कि ‘हम नहीं कहते थे सीजेपी कांग्रेस का आंदोलन है’! सवाल होगा कि क्या सोनम वांगचुक विपक्ष के हाथों इस्तेमाल हो रहे हैं? क्या यह सरकार गिराने की साजिश है? भाजपा के प्रवक्ता, ट्रोल आर्मी और गोदी मीडिया ठीक यही चाहते हैं। वे पहले से ही यह नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके के पुराने राजनीतिक संबंधों को उछाला जा रहा है। “ईकोसिस्टम”, “विदेशी फंडिंग”, “विपक्ष की साजिश” जैसी बातें लगातार हवा में छोड़ी जा रही हैं।
सुविधा और दृश्यता के एक ईवेंट में नैतिक वैधता, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता का प्रश्न
यानी असली लड़ाई शिक्षा की नहीं रहेगी, बल्कि यह साबित करने की लड़ाई बन जाएगी कि आंदोलन किसका है। आखिर विपक्ष सरकार को यह मौका दे ही क्यों? मुझे लगता है कि विपक्ष की परीक्षा इस बात से नहीं होगी कि राहुल गांधी जंतर-मंतर पहुंचे या नहीं। उसकी परीक्षा संसद में होगी।
मानसून सत्र शुरू हो रहा है। अगर विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को नहीं घेरता, धर्मेंद्र प्रधान से जवाब नहीं मांगता, शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा घोटालों को संसद का केंद्रीय मुद्दा नहीं बनाता, तब उसकी आलोचना कीजिए। वह असली कसौटी होगी। फोटो खिंचवाना कसौटी नहीं है।
क्या सोनम वांगचुक को उपवास तोड़ देना चाहिए?
यह सवाल पहले वाले से कहीं अधिक गंभीर है क्योंकि यह लोगों की वास्तविक चिंता से पैदा हुआ है। देश भर के अनेक बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सोनम वांगचुक और बाकी अनशनरत व्यक्तियों से अपील की है कि वे अपना उपवास समाप्त कर दें। उनकी चिंता स्वाभाविक है। जब कोई व्यक्ति लगातार बीस दिनों तक भोजन छोड़ देता है और उसका शरीर तेजी से कमजोर होने लगता है, तो उसके जीवन की चिंता होना स्वाभाविक है।
नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ काम करते हुए मैंने कई बार मेधा पाटकर को लंबे अनशन करते हुए देखा है। आंदोलन के भीतर हर बार यही दुविधा पैदा होती थी। एक तरफ साथी की गिरती हुई सेहत सामने होती थी, दूसरी तरफ यह सवाल कि क्या सरकार पहले जागेगी या शरीर पहले जवाब दे देगा। यह केवल राजनीतिक नहीं, भावनात्मक और नैतिक संकट भी होता है, लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि कोई व्यक्ति आमरण अनशन पर बैठता ही तब है जब वह इन सब बातों को पहले से जानता है। सोनम वांगचुक को यह भ्रम नहीं रहा होगा कि पांच या सात दिन के भीतर सरकार की अंतरात्मा जाग जाएगी और धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दे देंगे। उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि वे किस सरकार के सामने बैठे हैं।
इस सरकार में पिछले बारह वर्षों का अनुभव हमें क्या बताता है? क्या यह वही सरकार नहीं है जिसके शासन में फादर स्टेन स्वामी जेल में ही मर गए? क्या यही सरकार नहीं है जिसके सामने प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल, जिन्हें बाद में स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के नाम से जाना गया, गंगा की रक्षा के लिए 111 दिन के उपवास के बाद अपनी जान गंवा बैठे? क्या इन घटनाओं ने सत्ता को विचलित किया?
श्रद्धांजलि: आज आदिवासियों के हक में उठने वाली एक आवाज़ मौन हो गयी!
सच तो यह है कि यह सरकार बार-बार यह दिखा चुकी है कि नैतिक अपील भर से उस पर कोई असर नहीं पड़ता। गांधी का सत्याग्रह उस व्यवस्था के सामने खड़ा था जिसमें नैतिक दबाव की कुछ गुंजाइश बची हुई थी। आज हम ऐसी राजनीति के सामने हैं जो नैतिकता की भाषा तो बोलती है, लेकिन उसका संचालन पूरी तरह राजनीतिक गणित से होता है। इसलिए यह मान लेना कि केवल उपवास से सरकार झुक जाएगी, शायद वास्तविकता को ठीक से समझना नहीं होगा।
यही कारण है कि मुझे बार-बार लगता है कि हमें सोनम वांगचुक से यह कहना बंद करना चाहिए कि वह उपवास तोड़ दें। उससे कहीं अधिक जरूरी यह पूछना है कि हम उनके साथ क्या कर रहे हैं। क्या हम केवल सोशल मीडिया पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं या इस संघर्ष को अपनी जिम्मेदारी भी मान रहे हैं?
यह सरकार कौन सी भाषा समझती है?
अगर पिछले एक दशक का राजनीतिक इतिहास देखें तो एक बात बिल्कुल साफ दिखाई देती है कि इस सरकार ने बहुत कम मौकों पर अपने फैसले वापस लिए हैं और जब भी लिए हैं, उसके पीछे नैतिक दबाव नहीं बल्कि राजनीतिक दबाव रहा है। किसान आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
सरकार ने तीन कृषि कानून इसलिए वापस नहीं लिए कि उसे अचानक किसानों की दलीलें समझ में आ गईं। उसने इसलिए कदम पीछे खींचे क्योंकि वह आंदोलन धीरे-धीरे पूरे देश का राजनीतिक प्रश्न बन गया था। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकलकर उसने राष्ट्रीय स्वरूप ले लिया। सरकार को लगने लगा कि यदि वह नहीं झुकी तो इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी। यानी सरकार अंततः उसी भाषा को समझती है जिसे हम राजनीतिक शक्ति कहते हैं।
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अगर यह बात सही है, तो हमारी पूरी रणनीति भी उसी समझ पर आधारित होनी चाहिए। सोनम वांगचुक के कमजोर होते शरीर को देखकर केवल दुखी होने से कुछ नहीं होगा। उनकी लड़ाई को इतना बड़ा बनाना होगा कि सरकार के लिए उसे नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से असंभव हो जाए। यहीं मुझे लगता है कि हम सबकी भूमिका शुरू होती है।
आंदोलन केवल उन चंद लोगों का नहीं रह सकता जो जंतर-मंतर पर बैठे हैं। यदि ऐसा हुआ तो सरकार इंतजार करेगी कि शरीर पहले टूटे या आंदोलन। यदि वही आंदोलन देश भर के विश्वविद्यालयों, कस्बों, शहरों और गांवों तक फैल गया तब तस्वीर बदल जाएगी। इतिहास हमें यही सिखाता है। कोई भी बड़ा जनांदोलन केवल राजधानी में बैठकर सफल नहीं हुआ। वह तब सफल हुआ जब लोगों ने उसे अपना आंदोलन बना लिया।
हम सब एक बड़े विपक्ष का हिस्सा हैं…
आखिर में मैं फिर उसी बात पर लौटना चाहता हूं- सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी या आमिर खान जंतर-मंतर पहुंचे या नहीं। सवाल यह भी नहीं है कि सोनम वांगचुक कब अपना उपवास समाप्त करेंगे। ये सवाल हमें असली मुद्दे से भटकाते हैं। असल सवाल है कि क्या हम इस आंदोलन को इतना बड़ा बना पाएंगे कि सरकार के लिए इसे नजरअंदाज करना असंभव हो जाए?
अगर सचमुच हम चाहते हैं कि धर्मेंद्र प्रधान जवाब दें, शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो, पेपर लीक और परीक्षा घोटालों पर जवाबदेही तय हो और युवाओं के भविष्य के साथ हो रहा खिलवाड़ रुके, तो यह लड़ाई केवल जंतर-मंतर पर बैठे चंद लोगों के भरोसे नहीं जीती जा सकती। इसे पूरे देश का आंदोलन बनाना होगा।
जरूरत इस बात की नहीं है कि हर कोई जंतर-मंतर पहुंचे। जरूरत इस बात की है कि हर शहर, हर विश्वविद्यालय, हर जिले और हर गांव में अपना-अपना जंतर-मंतर खड़ा हो। कहीं एक दिन का उपवास हो, कहीं जनसभा हो, कहीं मशाल जुलूस निकले, कहीं छात्र अपने कॉलेज के बाहर बैठें। यह आंदोलन तभी ताकत पकड़ेगा जब लोग इसे अपना आंदोलन समझेंगे।
भारत के नागरिकों, छात्रों-युवाओं से भारत जोड़ो अभियान की अपील
किसान आंदोलन इसलिए सफल नहीं हुआ क्योंकि कुछ लोग दिल्ली की सीमाओं पर बैठे थे। वह इसलिए सफल हुआ क्योंकि पूरा देश धीरे-धीरे उसके साथ खड़ा हो गया। यही बात हर बड़े जनआंदोलन पर लागू होती है। इसलिए विपक्ष की भूमिका केवल संसद तक सीमित नहीं है। राजनीतिक दल अपनी भूमिका निभाएंगे। किसान संगठन अपनी लड़ाई लड़ेंगे। ट्रेड यूनियनें अपने मोर्चे पर रहेंगी। महिला, दलित, आदिवासी, पर्यावरण और नागरिक अधिकारों के आंदोलन अपनी-अपनी जगह संघर्ष करेंगे। यही लोकतंत्र की ताकत है। हर संघर्ष मिलकर उस व्यापक लोकतांत्रिक विपक्ष का निर्माण करता है जो किसी भी निरंकुश सत्ता को चुनौती दे सकता है।
हमें एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी है। हमें एक-दूसरे की लड़ाइयों को मजबूत करना है। इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत यह नहीं है कि हम सोनम वांगचुक से बार-बार कहें कि वे उपवास समाप्त कर दें। सबसे बड़ी ज़रूरत यह है कि हम उनके उपवास को राजनीतिक रूप से इतना शक्तिशाली बना दें कि सरकार के पास सुनने के अलावा कोई विकल्प न बचे।
जंतर-मंतर एक है। उसे सौ बनाना होगा। फिर हजार। तभी यह संघर्ष कुछ लोगों का धरना नहीं रहेगा, बल्कि देश के युवाओं का जनांदोलन बनेगा। शायद तभी सरकार पहली बार महसूस करेगी कि उसके सामने केवल सात अनशनकारी नहीं, बल्कि अपने भविष्य के लिए खड़ा पूरा देश है।
मधुरेश कुमार सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हैं। वे सामाजिक, पारिस्थितिक और लोकतांत्रिक न्याय के प्रश्नों पर सक्रिय जन आंदोलनों से जुड़े हैं। जनपथ पर लिखे उनके सारे लेख यहां पढ़ें।

