बिहार: नीतीश कुमार की आखिरी पारी साबित हो सकता है यह चुनाव

भाजपा अपनी राजनीति में बहुत स्पष्ट है और कमज़ोर आदमी को ग़ुलाम बनाना चाहती है। बिहार में स्थिति जितनी ख़राब होगी राज्य सरकार के लिए उतनी ही कठिन और अनुकूल होगी और यह माहौल भाजपा के लिए लाभदायक होगा। भाजपा का मानना है कि मध्यम वर्ग और व्यापारी समुदाय पहले ही की तरह उनके साथ बने रहेंगे लेकिन नीतीश कुमार, भाजपा की इस सस्ती और घटिया राजनीति को समझने में नाकाम रहे।

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बलात्कार पीड़िता पर ही दोषारोपण करने के मामले में जज को हटानी पड़ी आपत्तिजनक टिप्पणी

कुछ दिन पहले 22 जून को कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस कृष्णा दीक्षित ने बलात्कार के एक मामले में संदिग्ध को जमानत दी थी। दरअसल, राकेश बी. बनाम कर्नाटक राज्य के इस मुकदमे में न्यायाधीश महोदय ने बलात्कार के अभियुक्त को गिरफ्तारी पूर्व जमानत देते हुए कहा था कि शिकायतकर्ता उस कथित अपराध के बाद सो गयी थी ‘‘जो एक स्त्री के लिए अशोभनीय है; यह वह तरीका नहीं है जैसी कि हमारी महिलाएं व्यवहार करती हैं जब उन्हें प्रताडित किया जाता है।’’

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कानून का राज होता यहां तो दो ‘गज’ दूरी के चक्कर में नप गया होता पूरा देश!

विधिक माप अधिनियम 2009 के अनुसार किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा पोस्टर विज्ञापन अथवा दस्तावेज़ में मीट्रिक प्रणाली के अलावा नाप जोख की किसी दूसरी प्रणाली के शब्द का इस्तेमाल कानूनन जुर्म है, जिसके लिए दस हज़ार रुपए का जुर्माना या एक साल तक की सज़ा हो सकती है।

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“एक अश्वेत दास के लिए 4 जुलाई क्या मायने रखती है?” फ्रेडरिक डगलस का ये सवाल आज भी जिंदा है!

डगलस ने हज़ारों दासों की बेड़ियों की बात रखी जो आज़ादी के बावजूद भी आज़ाद नहीं हो पाए थे (अलग-अलग राज्यों ने अपने-अपने अवरोधक कानून बना दिए थे), और उनकी यातनाओं का उल्लेख किया। उनके उत्पीड़न के यथार्थ में अमरीका को उन्होंने मिथ्यावादी और खोखला पाया। दासता अमरीका की बहुचर्चित और अद्वितीय मानी जाने वाली आज़ादी पर एक धब्बे समान थी।

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चेयरमैन पद पर अम्बानी का रास्ता साफ़ करने के लिए जगदीश उपासने बनाये गये भर्ती बोर्ड के अध्यक्ष?

बीती फरवरी में ए. सूर्यप्रकाश प्रसार भारती के चेयरमैन पद से सेवामुक्त हुए थे, तब से यह पद खाली है. सूर्यप्रकाश लगातार दो कार्यकाल तक चेयरमैन रहे. उनके जाने के बाद से प्रसार भारती के बोर्ड में 13 पद खाली पड़े हुए हैं.

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आज से शुरू हुई लाखों कोयला मजदूरों की हड़ताल का समर्थन हर देशभक्त को क्यों करना चाहिए?

जिन लोगों ने ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ नामक फिल्म देखी होगी उसने यह पाया होगा कि कोयले के राष्ट्रीयकरण के पहले कैसे गुलामों की तरह कोयला मजदूरों की जिंदगी थी। इस बात को अस्सी के दशक में बनी फिल्म ‘काला पत्थर’ में भी दर्शाया गया है। इन गुलामी के दिनों की वापसी के खिलाफ कोयला मजदूरों की यह तीन दिवसीय हड़ताल है जो आज से शुरू होकर 4 जुलाई तक चलेगी।

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हरियाणा में टिड्डियों ने खरीफ़ की फसलों को पहुंचाया नुकसान, किसान सभा ने की मुआवजे की मांग

राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के बाद अब हरियाणा में भी टिड्डियों ने दस्तक दी है. राजस्थान का बॉर्डर पार कर हरियाणा के महेन्द्रगढ़, रेवाड़ी और झज्जर जिले में पहुंचे टिड्डी …

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गांव और शहर के बीच झूलती जिंदगी में देखिए बेनकाब वर्ग विभाजन का अक्स

लॉकडाउन के दौरान शहरों में रोजगार पूरी तरह से ठप हो जाने के बाद मजदूरों को अपना गांव दिखायी पड़ा था जहां से वे शहर की तरफ पलायन करके आये थे ताकि वे अपने और अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी का इंतजाम कर सकें. अब, जब हम लॉकडाउन से अनलॉक की तरफ बढ़ रहे हैं तो एक बार फिर वे रोजगार की तलाश में उसी शहर की तरफ निकलने लगे हैं.

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वसंत राव और रजब अली: चौहत्तर बरस में गुमनाम हो गयी सेवा दल के जिगरी दोस्तों की साझा शहादत

विडम्बना ही है कि स्वाधीनता संग्राम के दो महान क्रांतिकारियों रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला खान की दोस्ती एवं शहादत को याद दिलाती इस युवा जोड़ी की स्मृतियों को लेकर कोई खास सरगर्मी शेष मुल्क में नहीं दिख रही है। इसकी वजहें साफ हैं।

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भारत में हर रोज पुलिस अभिरक्षा में क्यों होती हैं मौतें?

पुलिस के चरित्र को बदलने के लिए समाज व राज का लोकतांत्रिक होना जरूरी है. यदि समाज चाहता है कि उसे मानवीय, संवेदनशील एवं कानून का सम्मान करने वाली पुलिस मिले तो पुलिस में मूलभूत सुधारों की जरूरत होगी, जिसे कोई भी सरकार या मौजूदा पूंजीवादी दल नहीं करना चाहते है. इसके लिए नई जन राजनीति को खड़ा करना होगा!

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