जिस राष्ट्र में अपने मन-विचार से काम करने की आजादी न हो, उसे नष्ट हो जाना चाहिए: स्वामी विवेकानंद


‘सांस्कृतिक संश्लेषक’ स्वामी विवेकानंद राजनेता नहीं थे लेकिन राष्ट्रवादियों में सबसे महान थे।

सिस्टर निवेदिता (नोट्स ऑफ सम वांडरिंग विद स्वामी विवेकानंद)

साल 2014 का वह बसंत बहुत पीछे छूट चुका है. वह अपने साथ नई खुशबुएं, फूल और पत्ते तो लेकर आया था लेकिन उसी के साथ ऐसी अनंत बेचैनियां और अंतहीन प्रश्नाकुलताएं भी ले आया जो भारत के दिल दिमाग को आज तक मथ रही हैं.

हिंदुस्तान के दिल दिमाग को मथने वाली इन प्रश्नाकुलताओं में जिसकी तासीर सबसे विभाजनकारी, विकृत और तीखी है उसका नाम है राष्ट्रवाद. आज जबकि राष्ट्रवाद का नशा उफान पर है, विवेकानंद के जन्मदिन पर, उनके बारे में बात करने की जरूरत इसलिए है क्योंकि आज भारत जिस संकीर्ण राष्ट्रवाद से मुकाबिल है, उसका उत्स कहीं न कहीं स्वामी विवेकानंद में दर्शाया जाता है.

पिछले कुछ दशकों में खासतौर से 90 के बाद चली धार्मिक कट्टरता की हवा ने विवेकानंद जैसे क्रांतिकारी, संन्यासी और मानवतावादी दार्शनिक को हिंदू पहचान के साथ जड़बद्ध कर दिया. और ध्यान रहे ये सब कुछ सायास, एक परियोजना के तहत किया गया था ताकि हिंदुत्व के खोखले दावे को अमली जामा पहनाने के लिए एक नायक की तलाश पूरी की जा सके. धार्मिक कट्टरता की बुनियाद पर खड़ी की जा रही राजनीतिक इमारत पर वैचारिकता और सामाजिक-दार्शनिक वैधानिकता का रंग-रोगन जो करना था.

संकीर्ण राष्ट्रवादियों – जिनका मतलब अनिवार्यत: प्रधानमंत्री मोदी की पार्टी बीजेपी, उसका पितृ संगठन आरएसएस और पुछल्ले हिंसक समूहों से है – ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए विवेकानंद के द्वारा इस्तेमाल किए गए जिस शब्द का सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया वो है – हिंदू.

संकीर्ण राष्ट्रवादियों  के इस समूह न केवल ‘हिंदू’ शब्द को विकृत किया, इसे एक धार्मिक पहचान का पर्यायवाची बना दिया बल्कि विवेकानंद की उदात्त वैचारिकी को भारत के स्मृति पटल से मिटाने का भी काम किया है.

चूंकि विवेकानंद ने अपने भाषण, लेखन, पत्र व्यहार और परिचर्चा आदि में हिंदू और हिंदुत्व के साथ-साथ मातृभूमि को शक्तिशाली बनाने की कल्पना बार-बार पेश की है इसीलिए उन्हें ‘हिंदू पुरुत्थानवादी’ के रूप में आसानी से चित्रित किया जा सका. आक्रामक प्रचार अभियान के जरिए लोगों के मन में विवेकानंद की एक ऐसी छवि बनाई गई जो आक्रामक हिंदू राष्ट्रवादी की है जबकि सचाई इसके विपरीत है.

राष्ट्रवाद की बहस में जिस ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग बार-बार किया जाता है उसका असल में विवेकानंद द्वारा प्रयुक्त किए गए शब्द से कोई वास्ता नहीं. इतिहासकार अमिय पी. सेन ने अपनी किताब ‘स्वामी विवेकानंद’ में लिखा है कि विवेकानंद ‘हिंदू’ शब्द का इस्तेमाल व्यापक सांस्कृतिक संदर्भों में किया करते थे. उनके लिए ये शब्द संकीर्ण अलगाववादी सोच का प्रतीक नहीं था. सिस्टर निवेदिता ने भी लिखा है कि जब विवेकानंद को खासतौर से हिंदू धर्म के अनुयायियों की बात करनी होती थी तब वो ‘वैदिक या वेदांतिक’ शब्द का इस्तेमाल करना पसंद करते थे न कि हिंदू.

बहरहाल, एक खास भौगोलिक क्षेत्र में रहने वालों के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द कैसे एक समूह की धार्मिक पहचान तक सीमित हो गया ये शोध का विषय है, लेकिन जहां तक बात विवेकानंद द्वारा प्रयुक्त ‘हिंदू’ शब्द की है उसका आरएसएस-बीजेपी-एबीवीपी द्वारा प्रचारित हिंदू शब्द से कोई वास्ता नहीं. विवेकानंद के हिंदू में मुसलमान, क्रिश्चियन, जैन, पारसी सब समाहित हैं.

‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की बहस में अक्सर विवेकानंद को इस्लाम के बरक्स खड़ाकर संघ-बीजेपी के लोगों ने उग्र धार्मिक राष्ट्रवाद की परिकल्पना पेश की है, लेकिन विवेकानंद के जीवन और दर्शन को देखने के बाद यह स्पष्ट होता है कि ऐसी व्याख्या न केवल मनगढ़ंत और भ्रामक है बल्कि तथ्यात्मक रूप से भी गलत है.

‘इसेंशियल्स ऑफ हिंदुइज्म’ में विवेकानंद ने खुद इस बारे में विस्तार से लिखा है. उनकी लिखी ये चंद लाइनें बीजेपी-आरएसएस के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं :

ये जो हिंदू शब्द है, जिसका आजकल हम फैशन की तरह इस्तेमाल करते हैं, अपने सारे अर्थ खो चुका है. ये शब्द सिंधु नदी के इस पार रहने वालों के लिए प्रयुक्त होता था.

स्वामी विवेकानंद, इसेंशियल्स ऑफ हिंदुइज्म

यह बात सही है कि विवेकानंद ने देश के पतित स्वाभिमान और गुलाम मानसिकता के लिए बाहरी आक्रमणकारियों, खासतौर से मुस्लिम आक्रांताओं को जिम्मेदार माना लेकिन उनका जोर हमलों के नकारात्मक प्रभाव पर ज्यादा, हमलावरों की धार्मिकता पर कम था.

अगर हमलावर जैन या बौद्ध या हिंदू होते तो भी विवेकानंद उतनी ही प्रखर आलोचना करते. सचाई यह है कि विवेकानंद हिंदुत्व की बुराइयों जैसे छुआछूत आदि के कट्टर आलोचक और इस्लाम के साथ उसके समन्वय के प्रखर समर्थक थे. वो मानते थे कि इन दोनों धर्मों को मिलाकर एक नया इंसान और नया समाज बनाने की जरूरत है. यही वजह है कि सिस्टर निवेदिता ने अपनी किताब “नोट्स ऑफ सम वांडरिंग विद स्वामी विवेकानंद” में उनको ‘सांस्कृतिक संश्लेषक’ की उपाधि दी है.

विलियम रैडिस की संपादित की हुई किताब “स्वामी विवेकानंद एंड मॉर्डनाइजेशन ऑफ हिंदुइज्म” भी पढ़ने लायक है. इस किताब में विवेकानंद की एक मशहूर चिट्ठी का जिक्र किया गया है. इस चिट्ठी में इस्लाम के प्रति विवेकानंद की समझ के निदर्शन होते हैं.

इतिहासकार नेमाई बोस ने भी अपने लेख “स्वामी विवेकानंद एंड चैलेंज ऑफ फंडामेंटलिज्म” में बताया है कि विवेकानंद ने सरफराज हुसैन नाम के एक शख्स को चिट्ठी लिखी थी जिसमें दोनों धर्मों के सर्वश्रेष्ठ पहलुओं को मिलाने की भावुकता भरी अपील है. विवेकानंद ने कहा था कि मातृभूमि के उत्थान के लिए यही एकमात्र उम्मीद की किरण है.

प्रायोगिक इस्लाम के बिना वेदांत का दर्शन चाहे वो कितना ही अच्छा क्यों न हो मानवजाति के लिए पूरी तरह से बेकार है. हमारी मातृभूमि के लिए दो महान व्यवस्थाओं हिंदुत्व और इस्लाम का मिलन – जिसका दिमाग वेदांती का हो और शरीर इस्लाम का – एक मात्र उम्मीद की किरण है!

विवेकानंद

जाहिर है विवेकानंद का राष्ट्रवाद मिश्रित और बहुलतावादी था. इसके सूत्र उनके जीवनानुभव से निकले थे. विवेकानंद खुद अपनी जिंदगी की एक घटना का जिक्र बार-बार करते थे जो इस्लाम के प्रति उनकी उदार सोच को बयान करती है. यहां उसका जिक्र ज़रूरी है.

परिव्राजक बनकर देश भ्रमण कर रहे विवेकानंद एक बार अलमोड़ा में घूमते हुए बेहोश होकर गिर गए थे. शायद कई-कई दिनों से न खाने की वजह से. विवेकानंद जहां बेहोश हुए उसके सामने एक दरगाह थी. विवेकानंद ने कई-कई बार इस घटना का जिक्र किया है कि दरगाह की रखवाली करने वाले फकीर जुल्फिकार अली ने उस संकट की घड़ी में उनकी जान बचाई थी. जुल्फिकार अली ने विवेकानंद को खाने के लिए ककड़ी दी थी.

एक तरफ विवेकानंद की इस्लाम के साथ मेल-मिलाप की कोशिश और निजी कृतज्ञता और दूसरी तरफ आज के संकीर्ण राष्ट्रवादियों का अभियान – इन दोनों को मिलाकर देखिए तो जाहिर होता है कि विवेकानंद को इस व्यापक देश से, समाज से काटकर एक हिंदूवादी के रूप में पेश करने की जो कोशिशें की गई हैं वो कितनी वीभत्स और आपराधिक हैं.

इसी तरह कुछ और भी उदाहरण हैं. इतिहासकार नेमाई साधन बोस ने लिखा है कि 1891 में जब विवेकानंद राजस्थान के अलवर में थे तब उन्होंने धर्म के मुद्दे पर कई मौलवियों से चर्चा की और उनके घर खाने पर भी गए. उस वक्त मुसलमानों के घर पर एक हिंदू संन्यासी का खाने के लिए जाना बहुत बड़ी बात थी.

नेमाई बोस के मुताबिक माउंट आबू में एक मुसलमान वकील ने मुसीबत के वक्त विवेकानंद को अपने घर पर रखा था. विवेकानंद एक गुफा में ध्यान करने गए थे लेकिन पानी भरने की वजह से गुफा रहने लायक नहीं थी इसलिए वकील ने उन्हें अपने घर बुलाया. विवेकानंद के गेरुआ परिधान को देखकर वकील ने उनके लिए अलग से भोजन पानी के प्रबंध की बात की तो विवेकानंद ने उसे सिरे से खारिज कर दिया. विवेकानंद ने मुसलमान परिवार के साथ ही खाना खाया.

बाद में जब खेतड़ी के महाराजा को इस बारे में पता चला तो उन्होंने विवेकानंद से सवाल किया, “आप मुसलमान के साथ कैसे रह सकते हैं. वो तो जब तक आपका खाना छू देता होगा.” विवेकानंद ने जवाब दिया, “मैं आपके हर सामाजिक कायदे से ऊपर हूं. मैं एक भंगी के साथ भी खाना खा सकता हूं. मुझे आपका आपके समाज का कोई भय नहीं. आपको न तो ईश्वर के बारे में कुछ पता है और न ही धर्मग्रंथों के बारे में.”

इन घटनाओं का जिक्र इसलिए जरूरी है ताकि हिंदू धर्म के साथ इस्लाम और दूसरे धर्मों को मिलाकर विवेकानंद अपने दौर में भारत के लिए जिस राष्ट्रीयता की अवधारणा पेश कर रहे थे, उसे कल्पना या अपवाद मानकर खारिज न किया जा सके.

विवेकानंद ने मातृभूमि के उत्थान के लिए जिस राष्ट्रवाद की कल्पना की है उसके मूल में मानवतावाद, आध्यात्मिक विकास और सांस्कृतिक नवजागरण है न कि मुसमलानों से घृणा. अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए विवेकानंद ने वेदांत को अपना उपकरण बनाया. वो मानते थे कि हर देश का अपना मूल स्वभाव होता है और भारत का मूल स्वभाव आध्यात्मिकता है. इसीलिए विवेकानंद ने आध्यामिक उत्थान पर खासा जोर दिया.

उनकी पुख्ता मान्यता थी कि बिना आध्यात्मिक उत्थान के भारत में कोई बदलाव नहीं होगा. उन्होंने कहा था :

हर देश का एक गंतव्य होता है. हर देश को एक संदेश देना होता है. हर देश को एक मिशन पूरा करना होता है. हमें अपने मिशन को समझना होगा. उस गंतव्य को समझना होगा जहां हमें जाना है. उस भूमिका को समझना होगा.

विवेकानंद जिस भूमिका को समझने की बात करते थे वो नए मनुष्य और नए समाज के निर्माण की भूमिका थी. यह करुणा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और विश्व बंधुत्व पर आधारित आधुनिक-शक्तिशाली भारत के निर्माण की भूमिका थी. विवेकानंद के पूरे दर्शन का सार यही था लेकिन संकीर्ण राष्ट्रवादियों ने विवेकानंद के इस पक्ष को छानकर बाहर निकाल दिया. 

आज विवेकानंद के नाम पर एक ऐसे भारत का विचार लोगों को दिमाग में भरा जा रहा है जो अतीतगामी और धार्मिक पहचान से जड़बद्ध है लेकिन यह विवेकानंद के प्रति अपराध से कम नहीं.

विवेकानंद के जिस दूसरे अहम पक्ष पर आज सबसे ज्यादा बात करने की जरूरत है वह है निजी स्वतंत्रता को उनका समर्थन. इस पक्ष पर कम ही बात की जाती है. विवेकानंद लोगों की निजी आज़ादी के प्रबल समर्थक थे लेकिन विवेकानंद की प्रतिमा तले राष्ट्रवाद की अश्लील नारेबाजी करने वालों का व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति क्या रवैया है– हम सब जानते हैं.

दस्तावेज बताते हैं कि अमेरिका और ब्रिटेन की यात्रा के दौरान विवेकानंद ने व्यक्तिगत आज़ादी के महत्व को ठीक से देखा समझा था. ऐसी ही आज़ादी वो अपने देश के लोगों के लिए चाहते थे. वो चाहते थे कि भारत न केवल राजनीतिक रूप से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी स्वतंत्र हो. उनकी निगाह में ऐसा राष्ट्र जो अपने लोगों की आज़ादी सुनिश्चित न करा सके और जिसमें हर किसी को अपने तरह से जीने का हक न हो – बेकार था.

इसी बात को “स्वामी विवेकानंद एंड मॉर्डनाइजेशन ऑफ हिंदुइज्म” में हिलट्रुड रुस्टाव ने इस तरह लिखा है कि विवेकानंद ऐसा समाज चाहते थे जहां बड़े से बड़ा सत्य उद्घाटित हो सके और हर इंसान को उसके देवत्व (अहमियत) का अहसास हो सके.

स्टाव के मुताबिक विवेकानंद मानते थे कि जहां (जिस देश में) हर किसी को विचार और मनमुताबिक काम करने की आजादी होनी चाहिए और अगर ऐसा न हो सके तो उस समाज और उस राष्ट्र को नष्ट हो जाना चाहिए.

आज के दौर में राष्ट्र के नष्ट होने की बात करना भी आपराधिक हो चुका है, पर ऐसा खुद विवेकानंद ने किया था. विवेकानंद का मानना था कि नैसर्गिक और स्वस्थ राष्ट्रवाद का विकास तभी होगा जब न सिर्फ धर्मों के बीच बल्कि पूरब और पश्चिम की संस्कृतियों के बीच भी बराबरी का आदान प्रदान हो. 1893 में शिकागो की धर्मसभा में दिया गया विवेकानंद का भाषण उनकी विश्वबंधुत्व की सोच को बिल्कुल स्पष्ट तरीके से सामने रखता है. उनकी पहली लाइन ही थी ‘अमेरिकी भाई और बहनों’.

शिकागो के भाषण का उल्लेख करते हुए लेखक तपन राय चौधरी ने “स्वामी विवेकानंद एंड मॉर्डनाइजेशन ऑफ हिंदुइज्म” में लिखा है कि विवेकानंद सच को अपना देवता मानते थे और कहते थे कि पूरी दुनिया मेरा देश है. राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता उनके लिए किसी संकीर्णता का नाम नहीं था.

शिकागो धर्मसभा के विदाई भाषण में विवेकानंद ने कहा था: 

धर्मों के बीच एकता के बारे में बहुत कुछ कहा गया है लेकिन अगर कोई यह सोचता है कि एक धर्म के दूसरे धर्म पर जीत स्थापित करने से एकता स्थापित होगी तो वो गलत है. मैं उन्हें कहना चाहता हूं कि बंधु, आप गलत उम्मीद लगा बैठे हैं. क्या मुझे यह उम्मीद लगानी चाहिए कि क्रिश्चियन हिंदू हो जाएं. या फिर हिंदू और बौद्धों को क्रिश्चयन हो जाना चाहिए. ईश्वर माफ करे!

जाहिर है विवेकानंद हर तरह की विविधता के समर्थक थे. बहुलता पर आधारित राष्ट्रवाद उनका लक्ष्य था न कि एक धर्म, एक शैली और एक राजनीतिक विचार के इर्द-गिर्द पनपने वाला राष्ट्रवाद उनकी सोच में था.

उनका कहना था:

हल पकड़े हुए किसानों की कुटिया से नए भारत का उदय हो. मछुआरों के दिल से नये भारत का उदय हो. मोची और भंगियों से नए भारत का उदय हो. पंसारी की दुकान से नये भारत का जन्म हो. उसे फैक्ट्री से पैदा होने दो. बाजार में उसका जन्म हो. बगीचों और जंगलों से उसे निकलने दो. पर्वतों और पहाड़ों से वो निकले.

राष्ट्रवाद के आपराधिक शोर-शराबे से भरे इस दौर में विवेकानंद की ये परिभाषा शायद ही ठीक बैठे इसीलिए कोशिश करके उसे किताबों से और चर्चा से निकाल दिया गया है.

इसलिए इस बात को एक बार फिर से समझने की और समझाने की जरूरत है कि विवेकानंद वो कतई नहीं हैं जो बीजेपी-आरएसएस से जुड़े लोग प्रचारित करते हैं.

विवेकानंद वो हैं जिन्हें भारत की मिट्टी के कण-कण से प्यार था. जैसा कि वो खुद कहते थे:

मैं भारतीय हूं और हर भारतीय मेरा भाई है. अज्ञानी हो या फिर गरीब हो या फिर अभावग्रस्त हो या फिर ब्राह्मण हो या फिर अछूत हो वो मेरा भाई है. भारतीयता मेरा भाई है मेरी जिंदगी है. भारत के देवी और देवता मेरे देवी देवता हैं. भारत का समाज मेरे बचपन का पालना है और मेरे जवानी के आनंद का बगीचा है. मेरे बुढ़ापे की काशी है. भारत की मिट्टी मेरे लिए सबसे बड़ा स्वर्ग है.


(दैनिक भास्कर समूह की पत्रिका ‘अहा ज़िंदगी’ में राष्ट्रवाद श्रृंखला के तहत यह लेख मई 2016 अंक में प्रकाशित हुआ था).


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