सरकारों ने अधिकतम गति सीमा 30 किमी प्रति घंटे करने का वादा क्यों किया है


कोविड महामारी के दौरान पिछले साल हुई तालाबंदी के कारण सड़क दुर्घटनाएं तो कम हुई हैं पर सड़क दुर्घटनाओं में मृत होने वालों की संख्या उस अनुपात में कम नहीं हुई हैं। हर साल 13 लाख से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में मृत होते हैं- हर 24 सेकंड में एक व्यक्ति। तेज़ रफ़्तार से मोटरवाहन चलाना सड़क दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण रहा है जिससे पूर्णत: बचाव मुमकिन है। 40-50 प्रतिशत लोग तय गति सीमा से अधिक रफ़्तार से गाड़ी चालते हैं। हर एक किमी प्रति घंटे की रफ़्तार बढ़ाने पर 4-5% जानलेवा सड़क दुर्घटना होने का खतरा बढ़ जाता है।

इसीलिए आज संपन्‍न हो रहे छठवें संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह का प्रमुख सन्देश यही है कि सरकारें अपने किये वादानुसार अधिकतम गति सीमा 30 किमी प्रति घंटे को सख्ती से लागू करें जिससे न केवल सड़क दुर्घटनाएं कम हों और सड़क दुर्घटनाओं से मृत्यु दर में गिरावट आये बल्कि अन्य लाभ भी मिलें, जैसे कि सड़क सबके लिए सुरक्षित जगह बने, पर्यावरण लाभान्वित हो और अन्य सतत विकास लक्ष्य की ओर हम सब प्रगति कर सकें।

नेल्सन मंडेला की पोती ज़ोलेका मंडेला ने 11 साल पहले अपनी 13 वर्षीय बच्ची ज़ेनानी को सड़क दुर्घटना में खो दिया था। ज़ोलेका मंडेला अब इसी मुहि‍म में समर्पण के साथ लगी हैं कि सड़क सबके लिए सुरक्षित बने, लोग सड़क पर सुरक्षित महसूस करें और आराम से आवागमन करें- पैदल चलें, साइकिल चलाएं, बच्चे अपने विद्यालय बेझिझक सुरक्षित जा सकें। ज़ोलेका मंडेला भी यही मांग कर रही हैं कि अधिकतम गति सीमा 30 किमी प्रति घंटे से अधिक न हो। ज़ोलेका मंडेला का यह कहना है कि 30 किमी प्रति घंटे से अधिक गति सीमा करना एक तरह से मृत्युदण्ड देने जैसा है।

शोध बताते हैं कि हर एक मील प्रति घंटे की रफ़्तार कम करने पर 6% सड़क दुर्घटना होने का खतरा कम हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एक किमी प्रति घंटे की रफ़्तार बढ़ाने पर 3% सड़क दुर्घटना और 4-5% सड़क दुर्घटना में मृत होने का खतरा बढ़ जाता है।

पिछले साल 19-20 फरवरी 2020 को स्टॉकहोम में दुनिया के सभी देशों के मंत्रि‍यों की एक उच्चस्तरीय बैठक हुई और सड़क सुरक्षा के लिए सबने संयुक्त रूप से एक स्टॉकहोम डिक्लेरेशन (स्टॉकहोम घोषणापत्र) ज़ारी किया। इस बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे हमारे देश के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी। इस स्टॉकहोम घोषणापत्र का एक बहुत महत्वपूर्ण वादा है कि सभी देश अधिकतम गति सीमा को 30 किमी प्रति घंटा करें और सख्ती के साथ प्रभावकारी ढंग से उसको लागू करवाएं।

फरवरी 2020 के स्टॉकहोम घोषणापत्र के बाद अगस्त 2020 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में 194 देशों के प्रमुखों ने भी सड़क सुरक्षा के प्रति अपना समर्थन दिया और 2020 तक जो लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया (सड़क दुर्घटना और मृत्यु दर को 50% कम करने का), उसको 2030 तक पूरा करने के वादे को पुन: दोहराया गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा में देशों के प्रमुखों ने स्टॉकहोम घोषणापत्र के वादों के अनुरूप ही (जिसमें 30 किमी प्रति घंटा अधिकतम गति सीमा शामिल है) सड़क सुरक्षा के लिए अपना समर्थन दिया।

दुनिया में अनेक शहरों में 30 किमी प्रति घंटे की अधिकतम गति सीमा लागू हो गयी है। ब्रुसेल्स (बेल्जियम), पेरिस (फ्रांस) और स्पेन देश के अनेक शहर, बोगोटा (कोलंबिया), अक्रा (घाना), हो ची मिन्‍ह सिटी (वियतनाम) आदि इनमें प्रमुख हैं। तंज़ानिया में अधिकतम गति सीमा कम करने से सड़क दुर्घटनाएं 26% कम हो गयी हैं। टोरंटो (कनाडा) में 2015 में जब अधिकतम गति सीमा 40 किमी प्रति घंटे से 30 किमी प्रति घंटे की गयी तो वहां सड़क दुर्घटनाएं 28% कम हो गयीं और गंभीर प्राणघातक सड़क दुर्घटनाएं तो दो-तिहाई कम हो गयीं! कोलंबिया (बोगोटा) में अधिकतम गति सीमा कम करने से सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु 32% कम हो गयी। लन्दन (इंग्लैंड) में पाया गया कि अधिकतम गति सीमा को कम करने से सड़क दुर्घटनाएं 42% कम हो गयीं। इंग्लैंड के एक और शहर ब्रिस्टल में 2008 में जब 30 किमी (20 मील) प्रति घंटे की अधिकतम गति सीमा लागू की गयी तो 2016 तक जानलेवा सड़क दुर्घटनाओं में 63% गिरावट आ चुकी थी।

https://twitter.com/LenaHudafor30/status/1395669568228519937?s=20

अधिकतम गति सीमा को 30 किमी प्रति घंटे करने की मुहि‍म में वैश्विक स्तर पर एक बुलंद आवाज़ हैं लीना हुदा, जिन्होंने “30 प्लीज़” नमक अभियान शुरू किया है। उन्होंने सिटिज़न न्यूज़ सर्विस (सीएनएस) से कहा कि वह जर्मनी में पली-बढ़ी हैं जहां लोग कारप्रेमी हैं और वहां कार उद्योग भी बहुत प्रभावशाली है, परन्तु पैदल चलने वालों और साइकिल चलाने वालों की सुरक्षा के लिए भी सशक्त इंतज़ाम हैं। उन्हें जर्मनी में पैदल चलने या साइकिल चलाने में कभी भी असुरक्षित नहीं लगा। कार चलाने वालों को यह नहीं लगता है कि ‘वह सड़क के मालिक हैं’ बल्कि सड़क को सबके साथ सुरक्षा से साझा करने की समझ को प्राथमिकता दी गयी है। सड़क पर खेलते हुए बच्चे या साइकिल चलाते हुए लोग या पैदल चलते लोग नहीं बल्कि कार चलाने वाले लोग ‘देख के चलते हैं’ कि बच्चों, पैदल या साइकिल पर चलने वाले लोग सुरक्षित रहें और सड़क अधिकार की प्राथमिकता पाएं। यदि सड़क पर बच्चे खेल रहे हैं तो जर्मनी में इसका स्वागत किया जाता है परन्तु जर्मनी के अलावा अन्य जगह पर इसी बात पर लोग नाराजगी व्यक्त करते हैं।

लीना जब जर्मनी से वोल्लोंगोंग, ऑस्ट्रेलिया आ गयीं, तो उनको सड़क सुरक्षा में अंतर और गहराई से समझ आया। ऑस्ट्रेलिया में अधिकतर जगह अधिकतम गति सीमा 50 किमी प्रति घंटे की है और स्कूल आदि के पास 40 किमी प्रति घंटे की है। यदि 30 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से आ रही गाड़ी से किसी की दुर्घटना हो जाती है तो मृत होने का 10% से भी कम खतरा है, परन्तु यदि गाड़ी 50 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से आ रही हो तो दुर्घटना होने पर मृत होने का खतरा 85% है। इसीलिए वह ’30 प्लीज़’ अभियान का नेतृत्व कर रही हैं जिससे सड़क सभी लोगों के लिए सुरक्षित बने, बच्चे सुरक्षा और आराम से पैदल या साइकिल से स्कूल आदि जा सकें और अन्य सभी वर्ग के लोग भी सड़क का पूरा उपयोग कर सकें।


विश्व स्वास्थ्य संगठन महानिदेशक द्वारा पुरस्कृत बॉबी रमाकांत स्वास्थ्य अधिकार और न्याय पर लिखते रहे हैं और सीएनएस, आशा परिवार व सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) से जुड़े हैं.


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