UP: 16 लाख कर्मचारियों का महंगाई भत्ता रोके जाने के खिलाफ़ याचिका पर इलाहाबाद HC में सुनवाई


लखनऊ,  17 जून: उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा 16 लाख राज्य कर्मचारियों व शिक्षकों के महंगाई भत्ते पर रोक के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है जिस पर गुरुवार को पहली सुनवाई हुई और 23 जून की अगली तारीख लगा दी गयी।

लोकमोर्चा के प्रवक्ता, शिक्षक कर्मचारी नेता अनिल कुमार यादव ने महंगाई भत्ते पर रोक के आदेश को रद्द करने को इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका संख्या 4445 / 2020 पर 18 जून को जस्टिस सूर्य प्रकाश केशरवानी की कोर्ट में सुनवाई हुई।

याचिकाकर्ता अनिल कुमार यादव ने बताया कि कोरोना महामारी से उत्पन्न आपात स्थिति का हवाला देकर योगी सरकार ने 24 अप्रैल को महंगाई भत्ते पर रोक लगा दी थी। शासनादेश में 01 जनवरी 2020, 01 जुलाई 2020 व 01 जनवरी 2021 से देय मंहगाई भत्ता व महंगाई राहत के भुगतान पर रोक लगा दी गई है। वेतन में महंगाई भत्ता व राहत से एक बड़ा हिस्सा जुड़ता है।

सरकार के इस फैसले से 16 लाख से अधिक राज्य कर्मचारियों, शिक्षकों और पेंशनभोगी रिटायर्ड कर्मचारियों को कोरोना संकट से समय भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। उनके हितों की रक्षा के लिए लोकमोर्चा संयोजक अजीत सिंह यादव के निर्देश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर करने का निर्णय लिया गया। उन्होंने बताया कि याचिका में कहा गया है कि योगी सरकार का महंगाई भत्ता रोकने का शासनादेश असंवैधानिक है।

उन्होंने बताया कि महंगाई भत्ता कर्मचारियों के वेतन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। चौथे वेतन आयोग की रिपोर्ट में महंगाई भत्ते पर अलग से चैप्टर दिया गया है। संविधान में भी वेतन के साथ भत्तों का भी जिक्र है। इससे समझा जा सकता है कि संविधान निर्माताओं ने वेतन के साथ भत्तों को महत्वपूर्ण माना था। 

बिना आर्थिक आपातकाल लगाए सरकार मंहगाई भत्ते को नहीं रोक सकती। कोरोना महामारी के संकट के समय में जबकि ज्यादातर कर्मचारी कोरोना वारियर की भूमिका में जीवन का रिस्क लेकर जनता के लिए काम कर रहे हैं, ऐसे समय में कर्मचारियों व उनके परिजनों को आर्थिक सहयोग व प्रोत्साहन की आवश्यकता है। पेंशनभोगियों के पास तो आय का कोई और जरिया भी नहीं है। सभी साठ वर्ष से अधिक उम्र के हैं जो कोरोना काल के दौरान हाई रिस्क के दायरे में आते हैं। उनकी पेंशन से कटौती करना कोरोना काल में उन्हें संकट में डालना है।

शिक्षक कर्मचारी नेता ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि माननीय उच्च न्यायालय कर्मचारियों शिक्षकों को न्याय देगा और सरकार के शासनादेश को रद्द कर देगा।


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