भारत में कानून के राज की अवमानना हो रही है: SC के पूर्व जस्टिस मदन लोकुर


कॉमन कॉज़ और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (CSDS) के लोकनीति कार्यक्रम द्वारा स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट, 2020-2021 का विमोचन किया गया. रिपोर्ट के विमोचन में शामिल सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन लोकुर ने कहा कि कानून में कुछ ऐसी खामियां और अस्पष्टताएं हैं जिनका फायदा उठा कर पुलिस महकमे के कुछ संदिग्ध तत्व कानून के राज की अवमानना करते हैं.

”क्या भारत में कानून के राज की अवमानना हो रही है?” इस विषय पर अपनी बात रखते हुए पूर्व न्यायधीश मदन लोकुर ने कानून व्यवस्था पर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए. नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ उपजे आंदोलन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बार-बार मेट्रो स्टेशन बंद किए गए ताकि प्रदर्शनकारियों को इकट्ठा होने से रोका जा सके या छात्रों को कक्षाओं में जाने से रोका जा सके. क्या लोगों को परेशान किए बिना विरोध प्रदर्शन का प्रबंधन या कानून व्यवस्था बनाए रखना संभव नहीं है?

हर साल सिविल सोसायटी वॉचडॉग कॉमन कॉज़, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के सहयोग से स्टेटस ऑफ पुलिसिंग रिपोर्ट (एसपीआईआर) जारी करती है. रिपोर्ट के पहले खंड का 19 अप्रैल को एक कार्यक्रम में विमोचन किया गया जिसमें बड़ी संख्या में पूर्व और कार्यरत पुलिसकर्मियों, शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं ने भाग लिया. इस रिपोर्ट को नीचे पढ़ा जा सकता है.

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रिपोर्ट के विमोचन में शामिल यूपी पुलिस और बीएसएफ के पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री प्रकाश सिंह ने इस विषय पर चर्चा करते हुए सवाल किया, ”क्या गैर-न्यायिक हत्याएं राज्य की नीति हो सकती हैं?” उन्होंने कहा कि जब लोग गैर-न्यायिक हत्याओं के पक्ष में खड़े हो जाएं तो इसका एक मतलब यह भी होता है कि उनका देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में कोई विश्वास नहीं है.

पूर्व महानिदेशक और पुलिस आयुक्त डॉ. मीरान बोरवंकर ने कहा, “अगर हम चाहते हैं कि गैर-न्यायिक हत्याएं रुकें, तो पुलिस, अभियोजन, फोरेंसिक लैब, न्यायपालिका और जेलों को मजबूत करना होगा.” उन्होंने आपराधिक न्याय प्रणाली के सभी प्रतिनिधियों के संयुक्त प्रशिक्षण पर भी जोर दिया ताकि गैर-न्यायिक हत्याओं को रोका जा सके.

स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट, 2020-2021 नामक इस रिपोर्ट को दो खंडों में विभाजित किया गया है. पहला खंड हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में पुलिसिंग पर केंद्रित है. यह हिंसाग्रस्त, अतिवाद या विद्रोह से प्रभावित जिलों और राज्यों में पुलिस की प्रकृति और उनकी कार्यशैली का एक अध्ययन है. भारत और दक्षिण एशिया में पुलिसकर्मियों के दृष्टिकोण, उनकी कार्य स्थितियों, प्रशिक्षण और तैयारियों के साथ-साथ संघर्षग्रस्त इलाकों के विभिन्न हितधारकों के साथ उनके संबंधों के बारे में विस्तार से बात करने वाला अपने तरह का पहला अध्ययन है. इस अध्ययन में 11 राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों के 27 जिलों और चार पूर्वोत्तर राज्यों व मध्य-भारत के वामपंथी अतिवाद से प्रभावित क्षेत्र के पुलिसकर्मियों और नागरिकों दोनों के आमने-सामने सर्वेक्षण शामिल हैं (सर्वेक्षण में शामिल जिलों की एक सूची रिपोर्ट के परिशिष्ट 1 में दी गई है).

अध्ययन में सरकारी एजेंसियों द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों का भी विश्लेषण किया गया है. सर्वेक्षणों को भारत भर के विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में शिक्षाविदों के एक नेटवर्क द्वारा समन्वित किया गया था जो सीएसडीएस के लोकनीति कार्यक्रम का हिस्सा हैं.

यह रिपोर्ट विश्लेषण करती है कि इन हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में पुलिस तंत्र को आम लोगों और पुलिसकर्मी कैसे देखते हैं. यह रिपोर्ट इन अशांत क्षेत्रों में विभिन्न आवाजों, कई अशांत आख्यानों और पुलिस तंत्र की कई जटिलताओं पर प्रकाश डालती है. उदाहरण के लिए, हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में 46 प्रतिशत आम लोग और 43 प्रतिशत पुलिसकर्मियों का मानना है कि नक्सली/विद्रोहियों की मांग जायज है, लेकिन उनके तरीके गलत हैं. अनुसूचित जनजाति के लोगों में ऐसा विश्वास करने की संभावना अधिक है. अनुसूचित जनजाति में हर दूसरा व्यक्ति उनकी मांगों से सहमत है.

रिपोर्ट शस्त्र संघर्ष को उकसाने वाले कारणों पर गंभीरता से नजर डालती है. आम लोगों के अनुसार, गरीबी और बेरोजगारी के बाद असमानता, अन्याय, शोषण, भेदभाव नक्सली/विद्रोही गतिविधियों के पीछे सबसे बड़े कारण हैं. यहां यह भी गौरतलब है कि इन क्षेत्रों में हिंसक गतिविधियों को कोई सहानुभूति नहीं है, लेकिन इन हिंसात्मक गतिविधियों के कारणों को वास्तविक माना जाता है, हालांकि पांच आम व्यक्तियों में से एक नागरिक और पुलिसकर्मी को लगता है कि एक खतरनाक नक्सली / विद्रोही को मारना कानूनी प्रक्रिया अपनाने से बेहतर है.

रिपोर्ट विवाद, शस्त्र संघर्ष और हिंसात्मक कार्रवाइयों वाले क्षेत्रों में लोगों की भयावह कहानियों पर उनकी वंचित स्थिति को रेखांकित करते हुए गंभीरता से प्रकाश डालती है. लगभग एक-चौथाई लोग किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो पुलिस या अर्धसैनिक / सशस्त्र बलों द्वारा शारीरिक यातना का शिकार हुआ है. लगभग इसी अनुपात में लोगों (24%) ने बताया कि वे एक निर्दोष व्यक्ति के बारे में जानते थे जिसे नक्सलवाद / उग्रवाद से संबंधित आरोपों के लिए पुलिस या अर्धसैनिक / सेना द्वारा गिरफ्तार किया गया था. फिर भी, आम लोग अपनी सुरक्षा की गारंटी के लिए राज्य पुलिस को अधिक कुशल मानते हैं. आम लोगों (60%) का एक महत्वपूर्ण बहुमत मानता है कि उनकी बचाव और सुरक्षा के लिए, उन्हें अर्धसैनिक / सेना से अधिक राज्य पुलिस की आवश्यकता है; आम लोग जो उस क्षेत्र में असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, उनके ऐसा मानने की संभावना अधिक है.

हिंसाग्रस्त पारिस्थितिक तंत्र में काम कर रहे पुलिसकर्मियों का एक बड़ा हिस्सा (60%) मानता है कि नक्सली / विद्रोही गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए यूएपीए, एनएसए आदि जैसे सख्त कानून महत्वपूर्ण हैं. गौरतलब है कि हालाँकि, केवल 30 प्रतिशत आम लोग ऐसा मानते हैं.

इसके अलावा, हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में काम करने वाले पुलिस बलों में समाज के संरचनात्मक पक्षपात और वर्ग पूर्वाग्रह व्याप्त हैं. आम लोगों के साक्षात्कार में यह तेजी से सामने आया है. 36 प्रतिशत आम लोगों का मानना है कि पुलिस नक्सलियों / विद्रोहियों के खिलाफ अपने अभियान में गरीबों के साथ भेदभाव करती है. वामपंथी अतिवाद से प्रभावित क्षेत्रों के आम लोगों में, 40 प्रतिशत लोग मानते हैं कि आपराधिक जांच के दौरान पुलिस एक गरीब व्यक्ति के उलट एक अमीर व्यक्ति का साथ देगी, 32 प्रतिशत को लगता है कि पुलिस एक दलित के उलट एक उच्च जाति का साथ देगी; 22 प्रतिशत को लगता है कि पुलिस एक आदिवासी के उलट एक गैर-आदिवासी का साथ देगी; और 20 प्रतिशत महसूस करते हैं कि पुलिस एक मुस्लिम के उलट एक हिंदू का पक्ष लेगी.

हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में अधिकांश पुलिसकर्मियों (75%) और आम लोगों (63%) ने महसूस किया कि विकास के मुद्दे को गंभीरता से लेना और क्षेत्र में बेहतर सुविधाएं प्रदान करना संघर्ष को कम करने के लिए बहुत उपयोगी होगा. पुलिस कर्मी अपनी अपर्याप्तता का समाधान खोजने के लिए भी उत्सुक हैं. तीन में से एक से अधिक पुलिसकर्मियों (35%) को लगता है कि सरकार को पुलिस की कार्य स्थितियों में सुधार करना चाहिए. लगभग एक चौथाई ने यह भी कहा कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें हिसंक स्थितियों को संभालने में सक्षम होने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण और सुविधाएं मिलनी चाहिए.

इस महामारी के दौरान काम करना हमारी टीम के लिए आसान नहीं रहा है. वर्तमान अध्ययन विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण रहा क्योंकि सर्वेक्षण कोविड -19 महामारी के बाद दुनिया के सबसे सख्त लॉकडाउन के दौरान पूरा किया गया. इन सब चुनौतियों के बावजूद, नागरिकों के कुल 4784 साक्षात्कार और पुलिस कर्मियों के 2600 साक्षात्कार आयोजित किए गए.

इसके अलावा, आधिकारिक आंकड़ों का विश्लेषण हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में पुलिसिंग पर बारीक समझ प्रदान करने के लिए किया गया है. इसके अलावा लैंगिक समानता के हिसाब से महिला व पुरूष प्रतिनिधित्व और सिपाही व अफसर रैंक के सदस्यों को पुलिसकर्मियों के सर्वेक्षण में शामिल किया गया. इसी तरह, रिपोर्ट में नागरिकों के सर्वे में समान पुरुष-महिला अनुपात और 18 वर्ष से ऊपर के सभी आयु वर्गों के उत्तरदाताओं के समान अनुपात का ख्याल रखा गया है.

लोकनीति-सीएसडीएस के सहयोग से कॉमन कॉज़, जमीनी दस्तावेज़ों की एक सीरिज तैयार कर रहा है जिसका शीर्षक है ‘स्टेटस ऑफ़ पोलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट’ (SPIR) है. इन रिपोर्टों का मुख्य उद्देश्य शैक्षिक संस्थानों, नागरिक समाज और सरकारी एजेंसियों के सहयोग से आधिकारिक आंकड़ों, जमीनी सर्वेक्षण और व्यापक शोध के अध्ययन के माध्यम से पुलिसिंग में सुधार करना है. रिपोर्ट के दो संस्करण पहले ही प्रकाशित हो चुके हैं. पहली रिपोर्ट – SPIR 2018, नागरिकों के सर्वेक्षण के माध्यम से होने वाले पुलिसिंग की आम धारणा और आधिकारिक डेटा का उपयोग करके पुलिसिंग के प्रदर्शन मूल्यांकन पर आधारित थी. इस सीरिज की दूसरी रिपोर्ट, SPIR-2019, एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के माध्यम से इकट्ठा किए गए पुलिस कर्मियों की कामकाजी परिस्थितियों और आधिकारिक डेटा का उपयोग करके पुलिस की पर्याप्तता और उनके अनुभवों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है.

SPIR 2020-2021 (वॉल्यूम-1), भारत में पुलिसिंग पर एक व्यापक डेटाबेस बनाने के लिए हमारे उद्देश्य का हिस्सा है और परिवर्तन को प्रभावित करने के लिए नीति निर्माताओं और गंभीर शोधकर्ताओं के लिए एक अमूल्य उपकरण है.


(प्रेस नोट)


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