दो महीने से चल रहे किसान आंदोलन को समझने के लिए कुछ ज़रूरी बिन्दु


इसे जरूर पढ़ें और फिर मौजूदा किसान आंदोलन के बारे में अपनी राय बनायें। इस समय इस आंदोलन पर बहुत सारे विश्लेषण आ रहे हैं लेकिन उन्हीं विद्वानों के विश्लेषणों पर ध्यान दें जो पिछले कई दशकों से किसानों के हित की बात कर रहे हैं। कॉरपोरेट घरानों के शुभचिंतक विद्वानों के नजरिये को पढ़ते समय भी इन विश्लेषणों की रोशनी में ही उनकी परख करें। मैं लंबे समय से किसानों की समस्या पर लिखने वाले प्रमुख कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा के एक इंटरव्यू की खास बातों को संक्षेप में पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहा हूं। यह लंबा इंटरव्यू ‘दि वायर’ के लिए रोहित कुमार ने लिया था जिसके मुख्य मुद्दों को मैं नीचे दे रहा हूं:

1. किसानों का यह गुस्सा कई दशकों से उनके भीतर पनप रहा था जिसे अब बाहर आने का मौका मिला है। पिछले 30-40 वर्षों के दौरान उन्हें अपने अधिकारों से कैसे वंचित रखा गया और उनके साथ किस तरह का अन्याय हुआ इसे देखने के लिए तीन अध्ययनों से गुजरना काफी होगाः (क) यूनाइटेड नेशंस कांफ्रेंस ऑन ट्रेड ऐंड डवलपमेंट (यूएनसीटीएडी) के एक अध्ययन से पता चलता हे कि 1980 के दशक के मध्य से लेकर 2000 के दशक के मध्य तक सारी दुनिया में कृषि उपज के विक्रय मूल्य में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। दूसरे शब्दों में कहें तो 2000 के दशक में किसानों की आय वही रही (मुद्रास्फीति को समायोजित करने के बाद) जो 1980 के दशक में थी। धनी देशों ने तो कृषक समुदाय को प्रत्यक्ष तौर पर आय को सहारा देने वाली सुविधाओं तथा अन्य सुविधाओं के जरिए इस समस्या को संबोधित किया लेकिन विकाशील देश ऐसा नहीं कर सके जिसका नतीजा यह हुआ कि इन देशों में किसानों ने खामोशी के साथ इसके दुष्परिणामों को झेला। (ख) ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोआपरेशन ऐंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने 2008 में एक अध्ययन प्रस्तुत किया जिसमें उसका आकलन था कि 2010 और 2016-17 के बीच भारतीय किसानों को कृषि से होने वाली आय में 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यह आकलन भी कुछ गिनी चुनी फसलों के संदर्भ में है इसलिए अनुमान लगाया जा सकता है कि कुल नुकसान कितना भारी रहा होगा। इसका अर्थ यह हुआ कि वाजिब आय से वंचित होने की वजह से प्रति वर्ष उन्हें लगभग 2.64 लाख करोड़ रुपये गंवाने पड़े। (ग) ‘इकोनॉमिक सर्वे’ की 2016 की रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत के 17 राज्यों में, जो देश का लगभग आधा हिस्सा होता है, एक किसान परिवार की औसत आय 20 हजार रुपया सालाना अर्थात 1700 रुपए से भी कम प्रति माह रही है।

2. किसानों ने जब देखा कि पिछले तमाम दशकों से भीषण संकट से गुजरने के बावजूद जब देश के विद्वानों, अभिजनों और अर्थशास्त्रियों ने उन्हें उनका वाजिब हक दिलाने के लिए कुछ नहीं किया तो उन्होंने अपने अस्तित्व की लड़ाई खुद लड़ने की ठान ली। सरकार द्वारा इन तीन कानूनों के लाये जाने के बाद उन्हें अपने ऊपर यह खतरा मंडराता दिखायी दिया कि उनके पास जो कुछ भी बचा हुआ है उसे भी छीनने की तैयारी चल रही है। यही वजह है कि उन्होंने एक ऐतिहासिक संग्राम छेड़ दिया।

3. यह पूछे जाने पर कि क्या यह पंजाब के धनी किसानों का आंदोलन नहीं है, डॉक्टर देवेंद्र शर्मा ने कहा कि अगर पंजाब के किसान इतने धनी थे तो देश के अन्य किसानों द्वारा अनुसरण करने के लिए उन्हें एक मॉडल बनना चाहिए था। लेकिन लुधियाना स्थित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, पटियाला स्थित पंजाबी विश्वविद्यालय और अमृतसर स्थित गुरुनानकदेव विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि 2000 से 2015 के बीच 16,600 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की। प्रसंगवश, पंजाब के खेतिहर परिवारों पर कुल कर्ज लगभग एक लाख करोड़ रुपये का है। अगर पंजाब के किसान धनी होते तो इतने बड़े पैमाने पर आत्महत्या नहीं होतीं। इसके अलावा पंजाब का हर तीसरा किसान गरीबी रेखा से नीचे है।

4. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश में केवल चार प्रतिशत किसान ऐसे हैं जिनके पास 10 हेक्टेयर से अधिक की जोत है। देश के अंदर जब 86 प्रतिशत किसानों के पास 5 एकड़ से भी कम जमीन हो तो ऐसी हालत में हम किस तरह के धनी किसान की बात कर रहे हैं!

5. इस वजह से इसे धनी किसानों का आंदोलन कह देना, क्योंकि वे न्यूनतम समर्थन मूल्य पा रहे हैं, बहुत हास्यास्पद है। पंजाब में मोटे तौर पर 70 प्रतिशत छोटे किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ पाते हैं। छोटे किसान वे हैं जिनके पास 5 एकड़ से कम की जोत है। इन्हीं को मुख्य तौर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ मिलता है।

6. क्या यह विपक्षी दलों द्वारा उकसाया गया विरोध है, इसके जवाब में डॉक्टर शर्मा का कहना है कि इस भीषण ठंड में कृपया एक रात के लिए बाहर जाकर रहें तो पता चलेगा। मैं नहीं समझता हूं कि कोई पैसे लेकर भी ऐसा करना चाहेगा। दिल्ली के बाहर सड़क के किनारे किसी ट्रॉली अथवा टेन्ट में आप एक रात बिताइए और फिर बताइए कि क्या पैसे लेकर भी आप एक महीने से ज्यादा इस तरह गुजार सकते हैं? मैं समझता हूं कि ऐसा कहना किसान समुदाय के प्रति अत्यंत अपमानजनक रवैये का प्रदर्शन है।

7. जो लोग यह कहते हैं कि अधिकांश किसान यूनियन इन कानूनों के पक्ष में हैं उनसे मैं जानना चाहता हूं कि अगर ऐसा है तो विरोध करने वालों की संख्या इतनी बड़ी कैसे है? दरअसल इतने सारे किसान संगठनों का एक मंच पर आ जाना बहुत बड़ी घटना है। पिछले दो दशकों के अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि विभिन्न किसान यूनियनों का एक साथ खड़ा होना कितना कठिन है और फिर भी हम देख रहे हैं कि पंजाब की 32 किसान यूनियनें एक मंच पर इकट्ठा हो गयी हैं और इनके साथ हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों के किसान संगठन भी आ गये हैं। इससे स्थिति की गंभीरता का अनुमान लगाया जा सकता है… जहां तक कानून का समर्थन करने वाले ‘ग्रुपों’ की बात है, विजिटिंग कार्ड छपा कर संगठन होने का दावा करने वालों के उदाहरण हम देख चुके हैं। तो भी, अगर किसानों का एक हिस्सा भी असंतुष्ट है तो क्या यह जरूरी नहीं है कि इसका कारण समझा जाय और उन्हें मदद की जाय?

8. डॉक्टर शर्मा से जब यह पूछा गया कि अगर बड़े निगम कृषि के क्षेत्र में आते हैं तो नुकसान क्या है? इसके जवाब में उन्होंने बताया कि सारी दुनिया कॉरपोरेट खेती की दिशा में बढ़ रही है लेकिन ये बड़े बड़े निगम आपको यह नहीं जानने देते कि उनके इन कदमों से किसानों की आय में वृद्धि नहीं हुई है। मिसाल के तौर पर अमेरिका को देखें जहां से हमने इन कानूनों को लिया है। अमेरिका में कृषि क्षेत्र में 6-7 दशक से भी अधिक समय से खुले बाजार और मुक्त व्यापार की नीति अपनायी जाती रही है और फिर भी कृषि से होने वाली आय में गिरावट आती गयी है। सच्चाई यह है कि 2020 में अमेरिकी किसानों पर 425 बिलियन डॉलर से भी अधिक के दिवालियेपन का बोझ पड़ गया। अगर सुधार इतने ही अच्छे थे तो उन्हें दिवालिया क्यों होना पड़ा। अधिकांश भारतीयों को इस बात की जानकारी नहीं है कि अमेरिका भी गंभीर कृषि संकट के दौर से गुजर रहा है। वहां शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में आत्महत्या की दर तकरीबन 45 प्रतिशत ज्यादा है। जब हम अमेरिका में कृषि की बात करते हैं तो बड़ी मशीनों, बड़े निगमों, बड़े व्यापार और बड़े कृषि की बात करते हैं। लेकिन जब हम भारत में कृषि की बात करते हैं तो हम करोड़ों छोटे और सीमांत किसानों की बात करते हैं।

9. अमेरिका में एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) या एपीएमसी (कृषि उपज विपणन समिति) जैसी चीजें नहीं हैं। वहां वॉल मॉर्ट जैसे बड़े रिटेलर हैं। उनके पास ठेके पर खेती की व्यवस्था है, वे उपज का कारोबार करते हैं और इन सबके बावजूद अमेरिकी किसानों को प्रतिवर्ष 62 हजार डॉलर की सब्सिडी दी जाती है। यहां सवाल पैदा होता है कि अगर खुले बाजार इतने सक्षम हैं तो सरकार को कृषि क्षेत्र में इतना पैसा डालने की जरूरत क्या है।

10. ओईसीडी (आर्थिक सहयोग और विकास संगठन) से संबद्ध देश भी सब्सिडी अथवा आय में प्रत्यक्ष मदद के जरिए प्रतिवर्ष कृषि क्षेत्र को अरबों डॉलर देते हैं। यूरोप आज प्रतिवर्ष लगभग 100 बिलियन डॉलर सब्सिडी के रूप में दे रहा है और मोटे तौर पर इसका आधा हिस्सा सीधे किसानों के खाते में जाता है। इसलिए जिसे हम कृषि के क्षेत्र में ‘बाजार की कार्यकुशलता’ समझते हैं वह वस्तुतः संघीय समर्थन है जो सरकारें कृषि क्षेत्र को देती हैं।

11. प्रसंगवश बता दें कि अभी कृषि के क्षेत्र में दुनिया में सबसे ज्यादा सब्सिडी देने वाला देश चीन हो गया है जिसने अमेरिका और यूरोपियन यूनियन को भी पीछे छोड़ दिया है। 2016 में चीन सरकार ने अपने कृषि क्षेत्र को 212 बिलियन डॉलर के बराबर सब्सिडी दी। वहां गेहूं पैदा करने वाले और धान की खेती करने वाले किसानों की क्रमशः 38 प्रतिशत और 32 प्रतिशत आय इस सब्सिडी से ही होती है।

12. कहा जाता है कि टेक्नॉलॉजी के आने से उत्पादकता बढ़ती है और आय में वृद्धि होती है। अब जरा इस कथन की सत्यता को भी देखिए। 1970 के दशक से ही अमेरिका में बहुत सारे छोटे डेयरी फार्म थे। ये टेक्नॉलॉजी की दृष्टि से काफी समृद्ध थे और यहां के मवेशी भी काफी दूध देते थे। लेकिन 10 वर्ष पूर्व मुझे न्यूयार्क टाइम्स में एक दहला देने वाली रिपोर्ट देखने को मिली। दूध की कीमतों में आयी भारी गिरावट से त्रस्त होकर एक किसान ने बंदूक उठाकर पहले अपनी 51 गायों को मारा और फिर खुद को गोली मार ली। छानबीन करने पर पता चलता है कि वहां 93 प्रतिशत डेयरी फार्म बंद हो चुके हैं लेकिन दूध के उत्पादन में वृद्धि हुई है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बड़े कारपोरेट घरानों ने कृषि क्षेत्र में प्रवेश किया और विशालकाय डेयरी फार्मों की स्थापना की जिसकी वजह से दूध की कीमतों में गिरावट आयी और 93 प्रतिशत डेयरी फार्म बंद हो गये। बाजार के मूल्य में गिरावट आने से ऐसी स्थिति पैदा हुई कि वे अपनी उत्पादन लागत भी नहीं निकाल सके और उन्हें यह धंधा ही छोड़ना पड़ा। यह हमारे लिए एक चेतावनी है और ऐसा उदाहरण भी है जो बताता है कि जिन्हें हम किसानों की आय में वृद्धि समझते हैं वह एक धोखा है। दरअसल किसानों को आय में प्रत्यक्ष मदद चाहिए। यूरोप में 50 प्रतिशत सब्सिडी डायरेक्ट इनकम सपोर्ट के मद में है। इसी प्रकार अमेरिका सब्सिडी समर्थन के रूप में औसतन हर किसान को सालाना 62 हजार डॉलर देता है। इससे पता चलता है कि बाजार नहीं बल्कि सब्सिडी से ही कृषि को बचाया जा सकता है।

13. खेती को कैसे बचाया जाय और पटरी पर लाया जाय? डॉक्टर शर्मा का कहना है कि आपकी और हमारी तरह हर किसान को भी अपनी उपज की एक सुनिश्चित कीमत पाने की जरूरत है। यह सुनिश्चित होना चाहिए कि जब वह मंडी में जाय तो उसे न्यूनतम मूल्य मिले। मजदूरों के लिए अगर न्यूनतम वेतन हो सकता है तो किसानों के लिए न्यूनतम मूल्य क्यों नहीं। इसके लिए एमएसपी से ही गारंटी दी जा सकती है। यही भारत की ताकत है क्योंकि हरित क्रांति के समय हमारे नीति नियामकों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की शुरुआत के जारिए अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया। मैं मानता हूं कि मंडियों के मामले में कुछ समस्याएं हैं लेकिन उन्हें बंद करने की बजाय उनके ढांचे में सुधार करने की जरूरत है। उन्हें बंद करने का मतलब कूड़े के साथ काम की चीज को भी फेंक देना है।

14. मेरा सुझाव है कि 23 फसलों के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को पूरी तरह वैधानिक बना दे। हर वर्ष सरकार 23 फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा करती है लेकिन व्यवहार में गेहूं और धान ही खरीदती है- कभी कभी जरूरत पड़ने पर कपास और दाल भी खरीद लेती है। यह सुविधा सभी फसलों के लिए होनी चाहिए। इसकी वजह यह है कि देश के अंदर ये 23 फसलें कुल फसल क्षेत्र का 80 प्रतिशत इलाका लेती हैं। इसलिए अगर एमएसपी को कानून बना दिया गया और इसे कारगर ढंग से लागू किया गया तो इसकी जद में खेतिहर आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा आ जाएगा। वैसी हालत में उसे पता होगा कि वह अपना उत्पाद पंजाब में बेचे या बिहार में, उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य के अंतर्गत एक ही कीमत मिलेगी।

15. बड़े बड़े निगमों का कहना है कि वे किसानों को उनकी उपज की और भी बढ़ी कीमत देंगे। लेकिन किसके मुकाबले बढ़ी कीमत? इसका पैमाना तो एमएसपी ही होगा। इसलिए अगर ये लोग ‘और भी बढ़ी कीमत’ देने को तैयार हैं तो एमएसपी को कानून बनाने से घबराहट कैसी! उन्हें  तो किसानों के साथ आगे बढ़कर इसकी मांग उठानी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है और इसका साफ अर्थ है कि ये कारपोरेट ईमानदार नहीं हैं। वे जानते हैं कि वे ज्यादा कीमत नहीं देंगे।

16. कारपोरेट समर्थकों का कहना है कि पूरे देश में अगर एमएसपी को कानूनी रूप दे दिया जाएगा तो कृषि क्षेत्र में सुधार का कार्यक्रम ध्वस्त हो जाएगा। इसका अर्थ साफ है कि आप खुद यह स्वीकार कर रहे हो कि किसानों को बढ़ी कीमत नहीं देने वाले हो।

17. एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य देने के साथ कई चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। हमारे देश में एपीएमसी द्वारा संचालित सात हजार मंडियां हैं। जरूरत है 42 हजार मंडियों की ताकि पांच किलोमीटर के दायरे में एक मंडी हो। अगर मंडियों का सही नेटवर्क होगा तभी न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाना आसान होगा।

18. मुक्त बाजार के इतने सारे दशक बीत जाने के बाद भी अमेरिका का कृषि विभाग बताता है कि खाद्य से संबंधित एक डॉलर में किसान का हिस्सा महज आठ सेंट होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि कोई खाद्य सामग्री खरीदने पर अगर उपभोक्ता एक डॉलर खर्च करता है तो उसमें से महज 8 प्रतिशत किसान की जेब में जाता है। अब जरा इसकी तुलना अपने देश की अमूल डेयरी कोआपरेटिव से करें। इसके मैनेजिंग डायरेक्टर बता चुके हैं कि अगर कोई 100 रुपए का अमूल उत्पाद खरीदता है तो 70 रुपये किसान की जेब में जाता है। यानी किसान का हिस्सा 70 प्रतिशत! क्यों न हम अमूल से सबक लें और इस मॉडल को सब्जियों, दालों, फलों इत्यादि पर लागू करें ताकि किसानों को मुनाफे का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा मिले। हमें अपने ही मॉडल की नकल करने में क्यों झिझक पैदा होती है? कारपोरेट के हवाले कृषि को करने की बजाय हम क्यों न कोआपरेटिव नेटवर्क का विस्तार करें।

19. एक आखिरी बात। हमारा जो आर्थिक बनावट है उसमें हमने कृषि को समाज पर एक बोझ मान लिया है। दलील यह दी जाती है कि जब तक खेती छोड़कर लोग शहर की तरफ नहीं जायेंगे, आर्थिक विकास नहीं होगा। इस अवधारणा को बदलने की जरूरत है। लॉक डाउन के महज दो दिनों के अंदर हमने देखा कि किस तरह आठ करोड़ लोग गांवों की ओर वापस लौट रहे थे। इससे हमें समझना चाहिए कि गांव से शहर की ओर लोगों को धकेलने की नीति कितनी गलत रही है। जरूरत है कि कृषि को हम आर्थिक विकास का पॉवर हाउस बनाएं।


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About आनंद स्वरूप वर्मा

समकालीन तीसरी दुनिया के संस्थापक, संपादक और वरिष्ठ पत्रकार

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