तिर्यक आसान: आपका गौरव तो आर्थिक उदारीकरण के समय से ही ठंडा हो चुका है!


शुरू में ही स्पष्ट कर दूं कि आगे जो भी लिखा मिलेगा, वो फिक्शन है। अपनी फिक्शन शक्ति के बारे में भी स्पष्ट करता चलूं। मेरी फिक्शन शक्ति का हाल ये है कि मैं आज तक इस बात की कल्पना नहीं कर पाया कि मेरे पास ऐसी कार होती, जो बिना पेट्रोल के चलती। दूसरे सपनों के बारे में बताते हैं- सपने में हम उड़ रहे थे। उसके आगे नहीं बताते। मैं बताये दे रहा हूँ- उड़कर अपनी वाली की मुंडेर पर गुटूर गूं गुटूर गूं कर रहे थे। वो आई। दाना चुगाई। इसके आगे का नहीं बताऊंगा। ‘इंटीमेट’ है। फिल्म तो लिख नहीं रहा हूं, जो कहानी की मांग पर…। 

अब मुझे सपने भी नहीं आते। पाश के अनुसार- सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना। तो इस समय मैं अपने जीवन की सबसे खतरनाक अवस्था में हूं। मेरे आजू-बाजू वाले संभलकर कर रहें। हम पहिलंय बताय देत हई- हमरे काने हरदी चुन्ना। 

ये स्पष्टीकरण शुरुआत में ही दे दे रहा हूं। अंत में नहीं। अंत में इसलिए नहीं क्योंकि शुरू से फिक्शन को सच मानकर पढ़ना, फिर स्पष्टीकरण से पिनक जाने का खतरा हो सकता है- हम तो सच मानकर, पूरी गंभीरता से पढ़ गए। अंत में ये साला कह रहा है कि ये जुमला है। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें रोज जुमले की गोली खाने को न मिले, तो उनके पेट में मरोड़ उठने लगता है। मैं उनकी भावनाओं की कद्र नहीं करता। इसलिए शुरू में ही स्पष्टीकरण दे दिया। किसी दिन जुमला सप्लायर ने सप्लाई रोक दी, तो मेरा लिखा पढ़कर अपना पेट ठीक कर लेंगे। अगर स्पष्टीकरण अंत में देता, तब भी मेरे गांव वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता। वे तब भी कहते- आप हमारे गांव के गौरव हैं। 

तो, आज का विषय है- गौरव। घर का गौरव। क्षेत्र का गौरव। जिले का गौरव। प्रदेश का गौरव। देश का गौरव। गॉडफादर बनने का गौरव। गॉडमदर बनने का गौरव। सबसे बड़ा-  पांडुलिपि की तकिया का गौरव। 

एक रोज एक साहित्यकार की प्रशंसा पढ़़ी। अपनी नहीं कर रहे थे। जिस पत्रिका में प्रकाशित हुए थे, उसकी कर रहे थे। उन्होंने बताया कि अमुक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित होना मेरे लिए गौरव की बात है। जिस पत्रिका में वे प्रकाशित होते हैं, वो प्रतिष्ठित हो जाती है। पत्रिका की प्रतियों की संख्या उसमें प्रकाशित रचनाओं की संख्या के बराबर है। संपादक प्रकाशित सभी रचनाकारों को एक-एक प्रति मुफ्त भेजते हैं। अपने ‘आर्काइव’ के लिए एक भी प्रति नहीं रखते। उनकी पत्रिका को प्रतिष्ठित बनाने वाले रचनाकार ही उनके आर्काइव हैं। संपादक अपनी पत्रिका की पाठक संख्या के विस्तार के बारे में नहीं सोचते। आर्काइव विस्तार के बारे में सोचते हैं। हर अंक में नए रचनाकार। पत्रिका को प्रतिष्ठित बनाने और आर्काइव बनने वाले। 

मैं सोच रहा हूं, जिन पत्रिकाओं में वे अब तक प्रकाशित नहीं हुए हैं, उनकी प्रतिष्ठा का क्या? हे देश की समस्त पत्रिकाओं के संपादकों! अपनी पत्रिका को प्रतिष्ठित बनाना है, तो उनकी रचना प्रकाशित करें। इसका इंतजार न करें कि वे रचना भेजें, तो हम प्रकाशित करें। उनसे विनती कर रचना मांग लीजिए। क्या, नहीं मांगेंगे? मांगते तो हैं। उनसे, जिनके नाम की प्रतिष्ठा है। जिनको प्रकाशित कर आप गौरव का अनुभव करते हैं। 

एक साहित्यकार की पुस्तक प्रकाशित हुई। प्रतिष्ठित प्रकाशन से। पुस्तक विमोचन के दौरान वक्ताओं ने कहा- किताब प्रकाशित होने से क्षेत्र का गौरव बढ़ा है। यहां भी गौरव की बात सुन मैं सोचने लगा- क्या सभी वक्ता दक्षिणपंथी विदूषक थे, जिनके गौरव के ‘इवेंट्स’ की लेजर लाइट की चकाचौंध से देश दिशाहीन हो गया है। 

भाजपा सरकार की तरह सब कुछ इवेंट हो चला है। सैनिक शहीद हुए? हां। तो वोट का इवेंट मनाओ। अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे? हां। तो लोटा घुमाओ इवेंट मनाओ। दवाई दे रहे हैं ना? हां। तो इवेंट मनाओ। सांस लेने पर कोई रोक लगाई? नहीं। तो इवेंट मनाओ। तो ऐसे ही तीनों कृषि बिल वापस लेकर भी इवेंट मना लो। क्या, अभी तक बिल वापसी के इवेंट का ‘ब्लू प्रिंट’ कॉर्पोरेट ने नहीं दिया? 

बताता चलूं कि शुद्धताप्रेमी संगठनों के प्यादों की बदौलत, माबदौलत हुए नरेंद्र मोदी की दोस्ती के कारण वे गौरव की जगह इवेंट का प्रयोग करने लगे। दोस्त डोनाल्ड ट्रंप का हिंदी उच्चारण ठीक नहीं है। दोस्त डोनाल्ड, गौरव के अर्थ का अनर्थ कर सकता है। अनर्थ से बचने के लिए गौरव के ऊपर इवेंट को लाद दिया। 

ओह्ह, इवेंट के चक्कर में गौरव को भूल गया। आओ गौरव आओ। 

सलमान खान को ईद का इंतजार रहता है। सलमान खान की तरह स्टार प्रकाशकों को गांधी जयंती का इंतजार रहता है। बम्पर कमाई, ईद पर आई। अबे सलमान, इधर भी बम्पर कमाई, गांधी के नाम पर आई। वैसे इसमें अनैतिक कुछ भी नहीं है। अगर इस दौर में भी गांधी सबसे अधिक बिक रहे हैं, तो ये देश के लिए गौरव की बात है। हालांकि सत्तर साल बाद दिल्ली के तख्त पर नशीं हुए पोंगापंथ के हृदय सम्राट के लिए कालीन बिछाने वालों का गौरव गांधी गौरव से अलग है। उनका गौरव नाथूराम गोडसे है। वे नाथूराम गोडसे को बेच रहे हैं। 

अब जैसा कि सरकार माने कॉर्पोरेट की सीईओ है, तो प्रकाशकों को संपादक नियुक्त करते समय एमबीए डिग्रीधारी को वरीयता देनी चाहिए। बेचने की कला आने का गौरव सबके पास नहीं है। 

(मैं संसदीय राजनीति के नेताओं का नाम लेकर लिखता हूं। इनसे डर नहीं लगता। वे या तो जेल भेज देंगे, या अपने लुक्खों को भेज देंगे। उपर्युक्त पैराग्राफ में कॉर्पोरेट लिखा। उन दोनों का नाम नहीं लिखा, जिनकी सीईओ सरकार है। मुझे उन दोनों से डर लगता है। वे मानहानि का दावा कर देंगे। सौ करोड़ की मानहानि। वकील करने की फीस है नहीं। मुकदमा हार जाऊंगा। वकील कर भी लूं, तब भी केस हार जाऊंगा। वे फैसला अपने पक्ष में करवा लेंगे- लार्ड ऑफ अदर्स! राज्यसभा जाना है कि नहीं? क्या कहा, नहीं जाना है!! मॉर्निंग वॉक तो करते ही होंगे।)

प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन के अपने संबोधन में कहा था कि साहित्य, देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है। कथा सम्राट आज होते, तो उन्हें प्रकाशन की राजनीति पता चलती। प्रकाशकों ने मशाल की अदला-बदली कर ली- ट्रांसफर ऑफ मशाल।  साहित्यकार अभी तक साहित्य को देशभक्ति और राजनीति के आगे चलने वाली मशाल मान रहे हैं। साहित्य के गॉडफादर और गॉडमदर होने का गौरव प्राप्त कर चुके नाम ट्रांसफर ऑफ मशाल से परिचित हैं। मैं उन गॉडफादर और गॉडमदर का भी नाम लिखता, पर मुझे इनसे भी डर लगता है। वे अपने गिरोह से मुझे खारिज करवा देंगे- ये जो लिखता है, उसे कौन सी विधा में रखा जाए? जो भी लिखता है, साहित्य तो नहीं लिखता है। 

गौरव, स्थान का भी होता है। पहले लेखक/कवि होने का ‘अप्रूवल’ कम्युनिस्‍ट कलकत्ता से मिलता था। जब कम्युनिस्‍ट कलकत्ता पर काली सवार हुई, तो अप्रूवल का ट्रांसफर हो गया। वो जगराता दिल्ली चला आया। अभी तक वहीं दरियाई घोड़े की तरह साहित्य को चर रहा है। 

जगराता दिल्ली नेताओं की तरह साहित्यकारों को भी खींचता है। वर्ष में जितनी बार दो-चार दिन की छुट्टियां होती हैं, साल भर की रॉयल्टी के बराबर महीने का वेतन पाने वाले साहित्यकार दिल्ली के दरबार में जगराता सुनने चले जाते हैं। साल भर की रॉयल्टी के बराबर महीने की पेंशन पाने वाले, चार धाम की यात्रा समझकर वीकेंड मनाने पहुंच जाते हैं। अब दिल्ली ही चारों धाम है। बनारस, इलाहाबाद और कलकत्ता का पत्ता दिल्ली की बहार में पतझड़ का शिकार हो गया। 

बनारस, मंदिरों का शहर। जितनी गलियां, उतने मंदिर। पोंगापंथियों के अनुसार बनारस में मरने से मोक्ष मिलता है। दिल्ली, प्रकाशकों का शहर। जितनी गलियां, उतने प्रकाशक। साहित्यकार कहीं भी मरे, उसे मोक्ष मिलना, न मिलना दिल्ली में तय होता है। साहित्य की संसद में। 

नवांकुर, यात्रा करने वाले साहित्यकारों से प्रेरणा न लें। दिल्ली में ‘बम’ टिकाने की भी जगह नहीं मिलेगी। यात्रा वाले साहित्यकारों के बम का प्रिंट जब तक नहीं मिटेगा, तब तक जगराता दिल्ली में बैठने की स्वीकृति नहीं मिलेगी। वे अपना बम प्रिंट मिटने ही नहीं देते। बम प्रिंट बचाए रखने के लिए ही वे अक्सर बवंडर में उड़ते तिनके की तरह चारों धाम की यात्रा करते रहते हैं। 

किसी नवांकुर को बम टिकाना है, तो किसी बम प्रिंट वाले से विनती करनी होगी- थोड़ा खिसकिए। मुझे भी ‘एडजस्ट’ कीजिए। अजी, ऐसे कैसे कर लें! पहले मेरे बम पर बाम मलो। नहीं तो दिल्ली में टिक नहीं पाओगे। बम पर बाम मलवाना उनका गौरव है। 

जो दिवंगत साहित्यकार दिल्ली में नहीं टिक पाए, उनकी आत्माएं भटक रही हैं। दिल्ली उन भटकती आत्माओं की शांति के लिए पाठ करवाती है। उनके नाम पर फेलोशिप शुरू कर देती है। फेलोशिप उसी को मिलेगी, जो बम पर बाम मलने को गौरव मानता हो। बाम उन भटक रही आत्माओं के बम पर नहीं मलना है। सदेह भटक रही आत्माओं के बम पर मलना है। शांति पाठ करवाने वाले एक व्यक्तित्व का ‘फाउंडेशन’ इतना मजबूत है कि उसने एक दिवंगत साहित्यकार की आत्मा को बंधुआ बना लिया है। मोक्ष ही नहीं दे रहा। मोक्ष की आड़ में अपने बम पर बाम मलवाए जा रहा।

बिना बम मालिश वाला एक नवांकुर दिल्ली से लौटा। क्या करने गए थे? पांडुलिपि के संबंध में जानकारी लेने गया था। नवांकुर में धैर्य की कमी थी। रोज इतनी संख्या में पांडुलिपियां अखिल भारतीय यात्रा कर रही हैं कि संपादक तय नहीं कर पाता- क्या भूलूं क्या याद करूं?  एक संपादक, जिसके पास प्रतिदिन औसतन पच्चीस पांडुलिपियां पहुंचती हैं, उसके बारे में सोचना चाहिए। एक दिन में वो अकेला क्या सभी पांडुलिपियां पढ़ लेगा? उसी दिन वो किसे प्रकाशित करना है, किसे प्रकाशित नहीं करना है, का निर्णय ले लेगा? नवांकुर को धैर्य रखना चाहिए। उसका भी नंबर आएगा। जिनके नाम की प्रतिष्ठा है, उनके बाद। बम मालिश वालों के बाद। भले ही तब तक उसका लिखा समीचीन, अर्वाचीन में बदल जाए। नवांकुर! तुम्हारे नाम की प्रतिष्ठा है? नहीं। क्या किसी ने तुम्हें बम पर बाम लगाने का अवसर दिया? नहीं। अगर अवसर मिलता तो लपक लेते? ही ही ही ही। क्या तुम्हारे गांव वाले कहते हैं कि तुम उनके गांव के गौरव हो? नहीं। नवांकुर! तुम्हारा कल्याण हो।

नवांकुर को उपर्युक्त तरीके से समझाया, तो उसने कहा- प्रवचन दे रहे हो! उसका कहना सही था। जगराता दिल्ली की हवा का असर था। नवांकुर का तीर खाकर हवा की खुमारी उतरी। उसे बताया- प्रकाशक पांडुलिपि का तकिया लगाते हैं। ये उनका गौरव है। वे एक-दूसरे की तकिया देखते रहते हैं- उसकी तकिया मुझसे मोटी लग रही है। तुरंत संपादक को निर्देशित करते हैं- कुछ पांडुलिपि भेजो। प्रतिस्पर्धी की तकिया मेरी तकिया से मोटी हो गई है। एक की तकिया उसकी लंबाई जितनी ऊंची हो गई। तकिया लगाने के लिए वो खड़े ही सोता है। सर! इतनी तकलीफ सहकर साहित्य की सेवा क्यों कर रहे हैं? अब तकिया की पांडुलिपि का बिस्तर बना लीजिए। ये तकिये से बड़ा गौरव होगा- पांडुलिपि का बिस्तर। 

एक मालिक सह संपादक के पास गौरव नहीं है। दुखी रहते हैं- आर्थिक तंगी के कारण पत्रिका और प्रकाशन का कार्य सुचारू रूप से नहीं हो पा रहा है। एक दिन वे अपना दुखड़ा सुना रहे थे। ‘इंटरवल’ में मैं पानी पीने उठा। फ्रिज खोला। वहां दिखा गौरव। फ्रिज किसी भी उच्च मध्यम वर्गीय या यों कहें कि खाए-अघाए घर के फ्रिज से अधिक तंदुरुस्त था। ठसाठस भरा हुआ। इतना समृद्ध कि  फ्रिज में जीरे का एक दाना और रख दिया जाए, तो फ्रिज का पेट फट जाए। अगर मैं सरकार को ये बता दूं कि अमुक संपादक, जो आपके राष्ट्रवाद का विरोधी है, उसके फ्रिज ये, ये, ये, ये में ये रखा हुआ है, तो सरकार जमाखोरी को वैध बनाने वाला कानून कुछ मिनट के लिए वापस ले लेगी। संपादक को जमाखोरी के आरोप में गिरफ्तार करेगी। गिरफ्तारी के बाद जमाखोरी को वैध बनाने वाला कानून पुनः लागू कर देगी- जब आपकी गिरफ्तारी हुई, उस समय जमाखोरी अपराध थी। हो सकता है, एनआईए को जांच सौंप दे- पता करो, कोई किसान तो चंदा नहीं दे रहा। 

एक अखबार के संपादक के घर गया। उनका गौरव ‘चेक’ करने के लिए शुरुआत में ही इंटरवल कर दिया। सीधे फ्रिज को चेक करना शुरू किया। फ्रीजर में फाइल रखी हुई थी। संपादक से मैंने कहा- ये क्या है अग्नि प्रसाद ‘ज्वाला’। संपादक ने बताया- वो मेरे संपादकीय हैं। मैं- तो इन्हें फ्रीजर में क्यों रखा है? संपादक- उनमें बहुत आग है। ठंडा होने के लिए रखा है। 

आपका गौरव तो आर्थिक उदारीकरण के समय से ही ठंडा हो चुका है। अब क्या उसे आइस क्यूब बनाकर चाटेंगे; ऐसा मैंने उनसे नहीं कहा। सिर्फ सोचा। फ्रीजर से कहा- का हो गौरव! जम गइला का?



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