देशान्तर: क्या कोरोना-काल के बाद वामपंथ और ग्रीन पॉलिटिक्स का उदय तय है? फ्रांस से संकेत…

राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक उथल पुथल होगा यह तो तय था, लेकिन फ़्रान्स के लोकप्रिय राष्ट्रपति इमनुएल मैक्रोन क्या इतनी जल्दी मुश्किलों में पड़ जाएंगे? ताज़ा संपन्न हुए लोकल स्तर के चुनावों के नतीजों में फ़्रांस के हरित, समाजवादी और साम्यवादी दलों की भारी जीत किस नयी राजनीति का आग़ाज़ कर रही है?

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छान घोंट के: चितरंजन सिंह का अर्थ है मानवाधिकार में सबसे आखिरी व्यक्ति के साथ खड़े होना

इस संवाद के अंत में उन्होंने दो बातें कहीं थीं. एक, अंतिम आदमी के लिए लड़ने वाले लोगों के अधिकार के लिए लड़ना और उसे किसी भी हालत में अकेला नहीं छोड़ना ही आन्दोलन की मज़बूत बुनियाद को कायम करेगा. दूसरी बात यह थी कि अपनों को मुसीबत में छोड़ना आन्दोलन के साथ गद्दारी है.

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पंचतत्व: मांगुर समझकर कैटफिश खाना वैसे ही है जैसे बाघ को बिल्ली समझना!

भारत में तकरीबन 18,000 वनस्पतियों, 30 स्तनधारियों, चार परिंदों, 300 मीठे पानी की मछलियों और 1100 ऑर्थोपॉड की नस्लें बाहरी हैं. इनमें से ज्यादातर स्थानीय जैव-विविधता को तेजी से खत्म करती हैं. इनसे देश की अर्थव्यवस्था पर भी भारी असर पड़ रहा है.

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दक्षिणावर्त: जेपी के चेलों से पुष्पम प्रिया चौधरी तक बिहार की यंग और डार्क कॉमेडी

एक बूढ़ा निजाम को हिलाता है और उसके फल से तीन ज़हरीले फल पैदा कर जाता है। आज जब बिहार अपने सवाल तलाश रहा है, तो उसके पास एक भ्रष्टाचारी बाप के पूत, एक एनजीओवादी महिला और एक देशद्रोह के आरोपित के अलावा कोई युवा विकल्प तक नहीं है।

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आर्टिकल 19: आचार्य आप कहां हैं? उ प्र में हि शि का थैंक्यू हो गया!

सरकार के हिसाब से देखें तो इसे हिंदी का अभूतपूर्व विकास भी कह सकते हैं। वह ऐसे, कि 2019 में 10वीं-12वीं में हिंदी में फेल होने वाले छात्रों की संख्या 10 लाख थी। तो हिंदी का सीधे 20 फीसद विकास हुआ है। और अगर कहीं 2018 वाला देख लें तब तो लगेगा भारतेंदु युग यही है। निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।

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डिक्टा फिक्टा: मेलज़र की चेतावनी, भुतहा फिल्में और ‘सब याद रखा जाएगा’ की फंतासी

प्रोफ़ेसर मेलज़र ने स्पष्ट लिखा है कि इतने साल तक वे जूलियन असांज के विरुद्ध चल रहे दुष्प्रचार के प्रभाव में रहे और उन्हें भी लगता रहा था कि असांज पर लगाए जा रहे आरोप सही हैं, जबकि सच यह है कि यह सब उन अपराधों से ध्यान हटाने के लिए किया गया है जिन्हें असांज ने हमारे सामने उजागर किया है.

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बात बोलेगी: किरायेदारों के ज़ाती मकान नहीं होते…

आप तो इससे भी खुश हो जाएंगे कि किसी ने गुड फ्राइडे को गुड गवर्नेंस डे बना दिया। मज़ा आ गया। जबकि न आपको गुड फ्राइडे से मतलब था न गुड गवर्नेंस से। बस आपको कुछ ऐसा मिल गया जो आपको बताया गया कि यही आपके लिए सबसे अच्छा है। ब्रोकर यूं तो बाज़ार का हिस्सा हैं लेकिन यहाँ दिये गये उदाहरण में फिलहाल वो केवल आपको मकान दिलाने के काम आ रहे हैं।

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राग दरबारी: नरसिंह राव में पटेल का अक्स तलाशती भाजपा

आखिर क्या कारण है कि जिसे कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री बनाया, उसे आज के दिन सबसे ज्यादा प्यार कांग्रेस से नहीं बल्कि बीजेपी से मिल रहा है? बीजेपी के बारे में जो बात समान्यतया कही जाती है, वह यह कि बीजेपी इकलौती ऐसी पार्टी है जिसके पास एक भी वैसा इतिहास पुरूष नहीं है जिसकी बदौलत जनता में अपनी पुरानी विरासत का दावा वह पेश कर सके. वर्तमान में जो राजनीतिक स्थिति है, उसके हिसाब से तो बीजेपी को हालांकि इसकी बहुत जरूरत अब रह नहीं गयी है फिर भी पता नहीं क्यों बीजेपी को पुराने कांग्रेसी या फिर शुद्ध कांग्रेसी की तरफ लालायित होकर देखना पड़ रहा है?

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तन मन जन: असल मामला इम्यूनिटी का है, इसलिए बाज़ार के कुचक्र से बचें और जीवनशैली पर ध्यान दें

होमियोपैथी तो अपने आरम्भिक काल से ही शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाकर ही रोग को खत्म करने का दावा करती है। होमियोपैथी पर सवाल उठाने वाले शुरू से ही होमियोपैथी को “कुछ नहीं” समझते हैं। कुछ तो इसे “प्लेसिबो” कहते हैं. हालांकि प्लेसिबो का होमियोपैथी में बड़ा आदर है।

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देशान्तर: आज़ादी के 45 साल बाद नये उपनिवेशवाद और ISIS के बीच फंसे मोज़ाम्बिया के लोग

बीते 25 जून 2020 को पुर्तगाली उपनेविशवाद से मोज़ाम्बिया की आज़ादी को पैंतालीस साल हो गए। देश आज़ाद तो हुआ लेकिन क्या सही मायने में आज़ादी मिली? वहां के मौजूदा हालात को बयां करने के लिए कुछ शब्द ही काफ़ी होंगे: राजनैतिक अस्थिरता, गृह युद्ध, हिंसा, घोर ग़रीबी और ग़ैर-बराबरी तथा अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार और वित्तीय संस्थाओं पर आधारित अर्थव्यवस्था। कुल मिलाकर संतोषजनक स्थिति नहीं है।

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