दक्षिणावर्त: त्र्यंबक का संज्ञाहरण


यह कहानी है त्र्यंबक की। न न, यह उसके अपने नाम से परेशान होने की कहानी नहीं है। कई बार वह सोचता ज़रूर है कि आखिर क्या सोचकर उसके बाप ने ऐसा कठिन नाम रख दिया, जो उसे अपने ऑफिस से लेकर हरेक जगह कम से कम दो बार तो अपना नाम बताना ही होता है। सामने वाले जब उसका नाम सुनकर हल्की सी मुस्कान देते हैं, तो उसका जी जल जाता है। यूनिवर्सिटी में तो लड़कों ने उसका नाम ही त्र्यंबक के बजाय बुड़बक रख दिया था। हालांकि, यह अभी उसकी समस्या नहीं थी।

मामला नाम से दिमाग तक आ चुका था। वह अपने दुःस्वप्न को साकार होते देख रहा था। कॉलेज में पढ़े ‘1984’ के दृश्य जैसे बिल्कुल उसके सामने उपन्यास के पन्नों से निकलकर साकार होने लगे थे। उसके दिमाग को पढ़ा जा रहा था। यह बात वह अपनी पत्नी और एकमात्र दोस्त से कई बार बता चुका था, लेकिन दोनों ने ही उसकी बात को हवा में उड़ा दिया था।

वह माइंडरीडिंग को अपने स्मार्टफोन की करतूत मानकर कई बार उसे फेंकने पर आमादा हो गया था, लेकिन रोजगार की मजबूरी और घरवालों की जिद जो न कराए। कई बार ऐसा होता था, हो चुका था, कि वह बस मैक्डॉनल्ड के बारे में सोचता, उसके बर्गर की बस याद आती थी औऱ फोन पर बर्गर के ऐड या उससे संबंधित मेल्स आने लगते थे।

पत्नी से कुछ कहने का फायदा नहीं था। उसको अपने चौका-बरतन और डब्बों से ही फुरसत नहीं थी। उसकी शिकायत बेशक रहती थी कि उन दोनों में ‘बातचीत’ नहीं होती थी, लेकिन जब भी वह अपनी परेशानियां साझा करने की कोशिश करता तो उसका जवाब ‘सिर में तेल लगा दूं…’ से लेकर ‘थोड़ी देर फोन क्यों नहीं छोड़ कर देखते..’ तक का होता है।

कभी-कभी उसे लगता है कि वह दोनों एक छत के नीचे तो रहते हैं, लेकिन उनके बीच कोई कनेक्ट नहीं रहा है। ऐसा उसके अधिकतर दोस्तों के साथ हो रहा है। शादी चाहे हुई किसी भी वजह से हो- मां-बाप को खुश करने से लेकर प्रेम तक कुछ भी कारण रहा हो- अब वे सभी चालीस की अवस्था में ही मानो संन्यस्त हो चुके हैं। हालांकि, यह संन्यास वह नहीं जो अध्यात्म की ऊंचाई पर लिया जाए। यह ऊब और चटान से पैदा हुआ संन्यास था।

बहरहाल, आज उसके डर की वजह कुछ और ही है। वह यूं ही अपना फेसबुक स्क्रॉल कर रहा था, तो उसे अपने एक दोस्त की ख़बर दिखाई दे गयी। दोस्त कहना भी गलत ही होगा, हां यूनिवर्सिटी में वह दोनों साथ ज़रूर पढ़े थे। उसने तो पत्रकारिता को अलविदा कह दिया था, लेकिन उसका साथी लगा रहा। फिलहाल एक न्यूज चैनल में वह संपादक टाइप का आइटम बन गया था। संपादक टाइप का इसलिए, क्योंकि अब उसके ज़माने वाले संपादक तो होते नहीं हैं। वह साथी पहले एक्टिविस्ट टाइप का था, लेकिन जब से नयी सरकार आयी थी, वह केवल ‘नौकरी करनेवाला’ हो गया था। हां, उसके अंदर एक सेलिब्रिटी बनने की इच्छा ज़रूर थी, तो संपादक बनने के बाद वह क्रिसमस पर लंबी और विलासी पार्टी देने वाले संपादक के तौर पर मशहूर हो गया था।

उसकी क्रिसमस पार्टी में न्योते जाने के लिए नये रंगरूट लार टपकाते पाये जाते थे। चार पेग भीतर जाते ही संपादक में नेरूदा और मुक्तिबोध की आत्मा एक साथ समा जाती थी। उसके बाद वह एक के बाद एक बीस कविताएं सुनाता था। नये रंगरूट अपने संपादक की ‘कविता सुनाने की आदत’ से परेशान थे, लेकिन उन्हें हरेक कविता के बाद वाह-वाह भी करना होता था। लजीज़ मटन-कोरमा और शानदार शराब के बदले यह कीमत वैसे तो कुछ खास नहीं थी।

आज त्र्यंबक के इसी सहपाठी के खिलाफ उसके मातहत काम करने वाले एक रंगरूट ने ‘किरांति’ कर दी थी। उसने साथी के एक्टिविस्ट-इतिहास को खोद कर सीधा चैनल के एमडी को ही चिट्ठी लिख दी थी और जानमाल की धमकी का आरोप लगा दिया था। त्र्यंबक जानता था कि उसका साथी कम्युनिस्ट है, एक्टिविस्ट है, कॉमरेड है और अभी की सरकार के सख्त खिलाफ भी खुद को पोज़ करता है, लेकिन हकीकत ये भी है कि वर्तमान नौकरी उसे सरकार में एक ताकतवर मंत्री की सिफारिश से मिली थी।

वह जानता था कि पीने के बाद साथी थोड़ा बहकता है। और कौन नहीं बहकता? शराब फिर पी ही क्यों जाय, अगर वह बहकाये नहीं। पीने के बाद थोड़ी गाली-गलौज भी हो ही जाती है, पर वह तो दोस्ती में, कॉमरेडशिप में, कोई भी दे देता है। हां, विचारधारा को लेकर धमकी वाली बात थोड़ी ज्‍यादा हो जाती है। यह ठीक है कि वह थोड़ा कुंठित है, दलाल टाइप का भी है, जी-हुजूरी के दम पर टिका हुआ है, लेकिन जान लेने की धमकी देना? यह थोड़ा ज्‍यादा हो गया था।

सोचते-सोचते त्र्यंबक ने यह सोचा कि मिस्टर एस को फोन कर लिया जाए। मिस्टर एस पूर्व कॉमरेड थे, फिलहाल किसी कॉलेज में पढ़ाते थे और आध्यात्मिक हो गये थे। वह वैसे तो त्र्यंबक और संपादक के क्लासमेट थे, लेकिन उम्र में उन दोनों से खासे बड़े थे। इसलिए उनको सभी साथी मिस्टर एस ही कहकर बुलाते थे। अब तो शायद उनको भी अपना नाम याद नहीं होगा। मिस्‍टर एस नक्सल बीट के जानकार थे। त्र्यंबक कई बार उनको चेता चुका था कि वह थोड़ी सावधानी बरतें, वरना किसी सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकलेंगे और गायब हो जाएंगे।

अकसर शाम की मदिरा-गोष्ठी में इस बात को लेकर दोनों झगड़ा भी कर चुके थे। मिस्टर एस त्र्यंबक को वर्तमान सरकार का कारकुन बताते थे, जबकि उनको यह पता था कि नये राज में अगर कोई सबसे हाशिये पर था, तो वह त्र्यंबक ही था। पिछली सरकारों से भी अधिक। बहरहाल, त्र्यंबक ने फेसबुक पर साथी की खबर देखते ही मिस्‍टर एस को फोन लगा कर पूरा वाकया बता दिया।  

मिस्टर एस ने ध्‍यान से पूरा मामला सुना। फिर अपनी खास पंजाबी स्टाइल में सब सुनने के बाद बोले, ‘सानू की?’ जवाब सुनकर त्र्यंबक ने सोचा, ‘क्या सचमुच सरकार इतनी निठल्ली है कि एक मैनेजरनुमा संपादक को फांसने के लिए उसने यह कांड करवाया है? तो फिर, उसने इस सरकार से जो भी उम्मीदें लगायी थीं, सांस्कृतिक पुनरुत्थान की, क्‍या वह सब बेमानी हैं? क्या यह सरकार मूर्खों मात्र से भरी हुई है? क्या 20 वर्षों से वह वाकई किसी दु:स्‍वप्‍न में जी रहा था?’

त्र्यंबक ने यह सोचा और सोचना ही गुनाह हो गया। एक पल को वह भूल गया था कि आजकल उसका दिमाग पढ़ा जा रहा है। आखिरी प्रश्‍नवाचक वाक्‍य खत्‍म होते ही उसका मोबाइल बजा। उधर से जो कुछ कहा गया, उसे सुनकर त्र्यंबक को विश्वास ही नहीं हुआ। संज्ञाहरण मंत्रालय से बुलावा आया था। मंत्रीजी ने उसे मिलने को बुलाया था।

उसने फिर से मिस्टर एस को फोन लगाया। उन्हें सारी जानकारी दी। मिस्टर एस ने पहले तो अपने अंदाज में ‘सानू की’ कहा, फिर अचानक से गंभीर हो गये, ‘देखो कॉमरेड। बीस वर्षों बाद इन वानरों ने तुमको एक्नॉलेज किया है, इसलिए पता नहीं क्यों मुझे किसी अनिष्ट की आशंका हो रही है।’

त्र्यंबक मंत्रालय पहुंचा। रिसेप्शन पर वह पहुंचता, उससे पहले ही एक सूटेड-बूटेड आदमी ने उसे पकड़ लिया। इधर से आइए, सर- उसने कहा। त्र्यंबक हैरान-परेशान। उसको आखिर इतना भाव क्यों मिल रहा है? सूट वाले ने उसे जिस दरवाजे के सामने ले जाकर खड़ा किया, उस पर मिनिस्टर के नाम का बोर्ड था। वह अंदर घुसा, तो बरसों पहले भूल चुकी वही महक आयी जो मंत्रालयों में होती थी जब वह रिपोर्टिंग के दौरान मंत्रियों या सचिवों के कमरे में पाया जाता था। बिल्कुल ठंडी करने वाली एसी और वैसे ही गद्देदार कुर्सी पर मंत्रीजी।

मंत्रीजी ने उसे एक नजर देखा और दांत निपोरते हुए बोले, ‘आइए, आइए, मिश्र जी। आपको शायद याद नहीं होगा, लेकिन हमारी स्टूडेंट विंग से जब आप जुड़े थे, तो एक बार मैं भी कॉलेज में आया था। आप लोगों के चुनाव प्रचार में। मेरे कार्यक्रम का संचालन आपने ही किया था।’

त्र्यंबक कैसे भूल सकता था। उन्हीं यादों के सहारे, उसी नॉस्टैल्जिया के दम पर तो वह जी रहा था। सत्ताधारी दल के स्टूडेंट विंग का वह सेक्रेटरी था, अपने कॉलेज में। वहां चुनाव के समय उसने बहुत से कार्यक्रमों का संचालन किया था। यहां तक कि देश के वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री तक उसके यहां छात्रों को उद्बोधित करने आ चुके थे। उसे आश्चर्य हुआ कि यह बीस साल पुरानी बात संज्ञाहरण मंत्री को कैसे याद है?

हा हा… यू रिमेंबर्ड! मैं तो तब भी आपकी उत्कृष्ट हिंदी का फैन था, अब भी हूं। मैंने रामदयाल (त्र्यंबक के पूर्व संपादक) को कहा था, आपका ख्याल रखने को! लेकिन आप तो जानते ही हैं, ये सब साले दोगले होते हैं।

त्र्यंबक चुपचाप खड़ा था।

अरे, बैठिए न आप। खड़े क्यों हैं? दरअसल, हमारी पार्टी को आप जैसे ओजस्वी लोगों की जरूरत है, जो ग्राउंड पर जाकर काम कर सकें। क्या है कि आपका जो शक है पार्टी के ऊपर, वह निराधार है। हमारे सुप्रीमो को इतनी फुरसत नहीं है कि वे कीड़े-मकोड़ों को हटाने के ऊपर ध्यान भी दें, सोचें भी। हमारा लक्ष्य बहुत बडा है। पर क्या है कि ये जो पुरानी पार्टी ने सौ वर्षों में पूरी गंदगी फैलायी है न, उसे साफ करने में थोड़ी देर भी होगी औऱ कई लोगों का बलिदान भी देश मांगेगा।

– तो, आप भी मेरे विचार पढ़वाते हैं? त्र्यंबक की आवाज और प्रश्न में सिहरन थी।  

– हा हा हा, तकनीक का और काम क्या है, फिर आप तो हमारे एसेट हैं। उस वक्त से आप हमारे लिए वोकल हैं, जब इसकी सज़ा मिलती थी। आप तो हमारे थिंक टैंक में से एक बनने लायक हैं।

– तो फिर, इतने दिनों तक मेरी दुर्दशा हुई, तब आपने क्यों नहीं याद किया? मूर्खों और बेवकूफों को क्यों बिठाते रहे माथे पर?

– यही, यही गुस्सा जो है न आपका, यही दिक्कत करता है। हरेक राजनीतिक पार्टी को मूर्ख ही चाहिए, मिश्र जी। सोचने के लिए हमारे सुप्रीमो हैं न। मैंने भी सोचने का काम छोड़ दिया है। आप देख लीजिए, मैं रीट्वीट अधिक करता हूं, ट्वीट तो छठे-छमासे, अगर सुप्रीमो की बड़ाई न करनी हो तो। दूसरी वजह ये है कि आज से पहले आपने पार्टी के खिलाफ कभी सोचा भी तो नहीं था! हें हें हे।

– तो क्या मुझे सज़ा देने के लिए बुलाया गया है? त्र्यंबक ने पूछा।

– नहीं, ईनाम देने के लिए। आप प्रकृति के पास रहना चाहते हैं, समंदर में या पहाड़ों पर, है न?

– जब आप मेरे दिमाग को पढ़ ही चुके हैं, तो फिर बचा ही क्या है?

– आप गुस्साइए मत। हमारे उत्तर-पूर्व में एक गांव है। वह विकास की रोशनी से अछूता है। वहां विदेशी ताकतों का बहुत ज़ोर है। हमारे अधिकांश को उन्होंने धर्मांतरित कर लिया है। आपकी जरूरत वहीं है।

– और, मेरा परिवार?

– हम सबकी चिंता कर लेंगे। हमें आपके व्यक्तिगत जीवन के बारे में भी पता चला है। आप कोई मोहांध व्यक्ति नहीं हैं, देश से प्यार करते हैं। आपको अधिक दिक्कत नहीं होगी।

– ठीक है, पर एक बार मैं मिल तो लूं उनसे। चार दिन बाद चला जाऊंगा। मुझे सोचने का मौका दीजिए।

– आप समझे नहीं मिश्र जी, यह आपके लिए सुनहरा मौका है। पार्टी ने तय किया है कि यह आपको दिया जाए। यह प्रार्थना नहीं है, आदेश है। शुभस्य शीघ्रम्। गाड़ी पोर्टिको में खड़ी है, आपको हवाई अड्डे ले जाने के लिए।

त्र्यंबक ने पाया कि उसके आसपास अचानक आठ-दस मार्शल इकट्ठा हो गये हैं।

उस दिन के बाद से त्र्यंबक को शहर में किसी ने नहीं देखा। त्र्यंबक गायब हो चुका था।


(सभी तस्वीरें Simon Stålenhag की वेबसाइट से साभार प्रकाशित)


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