आर्टिकल 19: सामाजिक न्याय की पुकार 5 अगस्त को धर्म की मिट्टी के नीचे दफन कर दी गयी है!


7 अगस्त की तारीख भारत के राजनैतिक इतिहास का बहुत बड़ा दिन है। स्वतंत्रता के बाद तो सबसे बड़ा। साल था 1990, विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अचानक केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी के लिए रिजर्वेशन का एलान कर दिया था। उस तारीख के बाद हिंदुस्तान की राजनीति को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया था। और केवल राजनीति को ही नहीं, समाज को भी, व्यवस्था को भी।

अब एक बार फिर से उस तारीख को याद करने की जरूरत है। एक तरफ मंडल की राजनीति थी, जिसके पीछे सामाजिक न्याय की सोच थी। जातिगत आधार पर दबाकर रखी गयी इस देश की लगभग 52 फीसद आबादी को बराबरी के दर्जे पर लाने की सोच थी। संविधान के साथ मिले समानता के अधिकार को कुछ हद तक जमीन पर उतारने की सोच थी। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी की कमंडल की राजनीति थी। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की राजनीति थी। संविधान की मूल भावना से खिलवाड़ की राजनीति थी। और इन सबसे ज्यादा, सामाजिक न्याय की मुखालफ़त की राजनीति थी।

मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने की संभावना से घबराकर आडवाणी ने कमंडल को आगे कर दिया था। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसा ओबीसी रिजर्वेशन के खिलाफ पिछड़ों को पढ़ाई-लिखाई-नौकरी के मुद्दे से अलग हटाकर हिंदू बनाने के लिए किया गया था। मंडल कमीशन की सिफारिशों के विरोध में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने अपनी शाखाओं को सड़कों पर उतार दिया था। यह दो धाराओं की जंग थी। 7 अगस्त 1990 से 7 अगस्त 2020 के बीच के तीस साल में कमंडल की राजनीति अपने मुकाम पर पहुंच चुकी है। पढ़ाई-लिखाई, नौकरी रोजगार के सवाल कमंडल में समाहित हो चुके हैं।

5 अगस्त को अयोध्या में शिलापूजन के साथ ही इस देश ने अपनी पूरी लोकतांत्रिक चेतना के साथ यह स्वीकार कर लिया कि उसके लिए आस्था और आडंबर से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। उसके हाथ में पूजा की थाली पकड़ाकर सरकार ने इस बात की सहमति ले ली है कि वो श्रीराम के सामने जलते दीपों से उठते धुएं में अपने स्वत्व को उड़ाने को तैयार है। मंडल और कमंडल के दो पाटों के बीच इस देश का बौद्धिक, राजनैतिक और सामाजिक चयन यही है।

सुनने में यह थोड़ा अजीब लगता है और कहना इससे कहीं ज्यादा अजीब, लेकिन सच यही है कि जिन नेताओं ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को अंजाम तक पहुंचाया उनमें से ज्यादातर धीरे-धीरे कमंडलधारी हो चुके हैं। वो चाहे रामविलास पासवान हों, नीतीश कुमार हों, हुकुमदेव नारायण यादव हों, स्वामी प्रसाद मौर्या हों, रामकृपाल यादव हों, अजित सिंह हों, सतपाल मलिक या अतीत में स्वर्गीय जॉर्ज फर्नांडिज।

इन तस्वीरों के बरअक्स 30 अगस्त, 2015 को पटना के गांधी मैदान में महागठबंधन की रैली याद कीजिए। उस रैली में एक असंभव सा जमावड़ा था। सोनिया गांधी, गुलाम नबी आजाद, लालू यादव, नीतीश कुमार, मीरा कुमार, शरद यादव। नरेंद्र मोदी की हवा ताजी-ताजी थी। नीतीश कुमार उन्हें लेकर बहुत सहज नहीं थे। उन्होंने बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़कर लालू यादव का हाथ थाम लिया था। लालू यादव इसे लेकर बहुत उत्साहित थे। उस रैली में उन्होंने एक बात कही थी। ये लड़ाई कमंडल पार्ट टू को रोकने के लिए है। लालू यादव ने भरोसा किया था कि नीतीश मंडल का साथ देंगे, लेकिन वो कमंडल में डूबने को मचल रहे थे। रामविलास पासवान पहले से कमंडल उठा चुके थे।

5 अगस्त को अयोध्या में जो तमाशा हुआ है वो एक दिन की बात नहीं है। ये मानने में कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि इस दिन के लिए संघ ने जिसका भी इस्तेमाल किया जा सकता था, किया। वो चाहे 22 दिसंबर, 1949 की रात शातिराना तरीके से राम की मूर्ति रखवानी हो, चाहे 1 फरवरी 1986 को ताला खुलवाना हो या 6 दिसंबर 1992 को ढांचा गिराना। या फिर 5 अगस्त को शिलापूजन। ये सब तारीखें केवल एक मंदिर के लिए नहीं थीं। इन तारीखों को सामाजिक न्याय के पूरे विमर्श को ध्वस्त करने के लिए ऐतिहासिक बनाया गया। और बार-बार बताया गया।

आप इस बात को समझिए। लक्ष्य अयोध्या नहीं है। राम का मंदिर नहीं है। रामराज तो कतई नहीं है। रामराज सामाजिक न्याय के खिलाफ उछाला गया ऐसा जुमला है जिसके झांसे में आकर ओबीसी ने माथे से रामनामी बांध ली है। लक्ष्य है सामाजिक न्याय की पुकार को धर्म की मिट्टी के नीचे दफन कर देना। संघ ने इस यज्ञोपवीत में सबसे पहले जाट नेताओं को शामिल किया था। याद कीजिए, चौधरी देवीलाल ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इससे नाराज वीपी सिंह ने उन्हें उप-प्रधानमंत्री के पद से बर्खास्त कर दिया था। चंद्रशेखर जैसे बड़े नेता ने भी कभी मंडल कमीशन की सिफारिशों का समर्थन नहीं किया। महेंद्र सिंह टिकैत ने तो दिल्ली में डेरा डाल दिया था। बीजू पटनायक मंडल कमीशन के खिलाफ खड़े थे। आज के दौर में उन घटनाओं को याद करना इसलिए जरूरी है कि आप समझ सकें कि अयोध्या में शिलापूजन के साथ आपने क्या-क्या दफन कर दिया है।

अयोध्या में शिलापूजन पर छाई हुई बौद्धिक खामोशी बताती है कि मंडल और कमंडल की लड़ाई में सामाजिक न्याय के समर्थक हथियार डाल चुके हैं। प्रियंका गांधी तक को बधाई देनी पड़ती है। राहुल गांधी को ट्वीट करना पड़ता है और कमलनाथ को हनुमान चालीसा पढ़नी पड़ती है। ये सब घटनाएं नहीं हैं। आप सोचिए, दक्षिण भारत के नेताओं ने ऐसा कुछ नहीं किया। क्या आपने सुना कि बहुत धर्मभीरू होने के बाद भी के. चंद्रशेखर राव ने ऐसा कुछ किया? आपने सुना कि स्टालिन ने ऐसा कुछ किया हो? आपने सुना कि आंध्र के जगनमोहन रेड्डी या चंद्रबाबू नायडू ने ऐसा कुछ किया हो?

ऐसा इसलिए कि दक्षिण में सामाजिक न्याय का बहुत पुराना इतिहास है। वहां सामाजिक न्याय के लिए धर्म को चुनौती देने वाले नेताओं का इतिहास है। पेरियार ईश्वर को मूर्ख बताने का हौसला दिखाते हैं और कर्मकांड को चुनौती देकर सामाजिक न्याय का बाना बुनते है। आप करुणानिधि को देख लीजिए। आज भी तमिलनाडु में लगभग 60 फीसद आरक्षण है। 1920 में मद्रास में जस्टिस पार्टी की जिद पर ब्रिटिश सरकार को 63 में से 28 सीटें गैर-ब्राह्मणो के लिए रिजर्व करनी पड़ी थीं।

1902 में पहली बार कोल्हापुर के राजा शाहूजी महाराज ने अपने दलित सेवक गंगाराम कांबले की चाय की दुकान पर चाय पी थी तो भारत का सामाजिक ढांचा चरमरा उठा था। और तब उन्होंने तय किया कि 50 फीसद कर्मचारी शोषित समाज के रखे जाएंगे। 90 साल बाद 7 अगस्त 1990 को वीपी सिंह ने सौ साल पुरानी एक लड़ाई को गरिमा दी थी। उस समाज को ये बात याद रखनी चाहिए। उसी सामाजिक न्याय की ताकत थी कि पांच हफ़्ते तक देश में आग लगाते हुए आडवाणी रथ लेकर पहुंचे तो केवल 8 महीने पहले मुख्यमंत्री बने लालू यादव ने उन्हें सिंचाई विभाग के मसानजोर गेस्ट हाउस में बंद करा दिया था। इस कार्रवाई का असर ये हुआ कि बीजेपी ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

9 नवंबर, 1990 को वीपी सिंह ने इस्तीफा देते हुए जो कहा था उसे याद करने की जरूरत है। उन्होंने कहा था मैं सामाजिक न्याय के पक्ष में और सांप्रदायिकता के खिलाफ अपनी गद्दी कुर्बान कर रहा हूं। 5 अगस्त 2020 को उस कुर्बानी को शिलापूजन के साथ ही दफन कर दिया गया है। अब ऐसा कोई नेता नहीं नजर आता जो आरती की थाल लेकर खड़े हो चुके दलित-शोषित-वंचित-पिछड़े समाज के हाथ में सामाजिक न्याय की किताब थमा सके और उसे पढ़वा सके।



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