बात बोलेगी: मेरे तक आवाज़ आ रही है? आप लोग रोना बंद कीजिए…

यह बजट पीछे से चली आ रही परंपरा से अलग है। पहले तो यह बात मन में बैठा लेनी चाहिए। अगर यह बारीक लेकिन बुनियादी बात आप भूल गए तो इसका एसेंस नहीं पकड़ पाइएगा और फिर वही दो कौड़ी की चिंताओं में परेशान रहिएगा।

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बात बोलेगी: फिर आया लोकतंत्र के कर्मकांड का मौसम…

पहले जब राज्यों में चुनाव हुआ करते थे तो राज्य सरकारों की ही शक्तियां चुनाव आयोग को हस्तांतरित हुआ करती थीं। इधर कुछ वर्षों में, विशेष रूप से जब से भारतीय जनता पार्टी मौज में आयी है, तब से चुनाव भले ही घाना या नाइजर या टोगो में हों लेकिन सबसे पहले स्थगित होती है केंद्र की सरकार।

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बात बोलेगी: फिर इस मज़ाक को जम्हूरियत का नाम दिया…

जनता अब जम्हूरियत की चाभी नहीं, उसकी चेरी है। और हम जनता की तरफ से जनता के लिए जनता द्वारा चुनी गयी इस भूमिका को जम्हूरियत बतलाते हुए इसे इसके पुराने वैभव में लौटाने के लिए इसे बचाने पर आमादा हैं।

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बात बोलेगी: क्योंकि आवाज़ भी एक जगह है…

बीता साल कुछ ऐसा बीता जिसके बारे में सब कहते हुए पाये जाते हैं कि इसे बीत ही जाना चाहिए। लोगों को 2021 का कैलेंडर बेरहमी से फेंकते हुए देखा है क्योंकि इस गुजरे हुए साल ने कुछ भी ऐसा नहीं दिया जिसे सँजो कर रखा जाय।

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बात बोलेगी: ‘प्रथम दृष्ट्या’ की कानूनी पुष्टि के इंतज़ार में…

एसआइटी (विशेष जांच दल) ने अब जाकर बताया है कि यह सब पूर्वनियोजित था- ठंडे दिमाग से रची गयी एक साजिश का अंजाम था। इस दल ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं की कथित लिंचिंग पर कुछ नहीं कहा क्योंकि जो कुठ भी हुआ वो इस घटना के बाद हुआ जो कि पूर्वनियोजित नहीं था।

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बात बोलेगी: विस्मृतियों के कृतघ्न कारागार में एक अंतराल के बाद

सूचनाओं ने हमारे दिल-दिमाग को इस कदर भर दिया है कि उसमें सब कुछ केवल समाया जा रहा है। किसी सूचना का कोई विशिष्ट महत्व नहीं बच रहा है। मौजूदा हिंदुस्तान एक घटना प्रधान हिंदुस्तान बन गया है। इसमें घटनाएं हैं और केवल घटनाएं हैं। जब घटनाएं हैं तो उनकी सूचनाएं हैं। सूचनाएं हैं तो उनकी मनमाफिक व्याख्याएं भी हैं। व्याख्याएं हैं तो उसमें मत-विमत हैं। मत-विमत हैं तो वाद-विवाद हैं और वाद-विवाद हैं तो जीतने-हारने की कोशिशें भी हैं। पक्ष-विपक्ष अब केवल सत्ता के प्रांगण की शब्दावली नहीं रही बल्कि अब वह कटुता का एक नया रूप लेकर उसी खम के साथ एकल परिवारों से लेकर संयुक्त परिवारों, पड़ोस से लेकर मोहल्ले और मोहल्ले से लेकर गाँव तक बसेरा करती जा रही है।

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बात बोलेगी: बिजली आ गयी है, लेकिन अर्द्ध-सत्य का अंधेरा कायम है!

सावरकर ने माफी मांगी यह सच है और गांधी ने ऐसा करने को कहा यह झूठ है। जब ये दोनों एकमेक हो गए तब जो परिणाम आए वो ये कि या तो दोनों बातें झूठी हैं या दोनों ही बातें सच हैं या दोनों ही आधा सच और आधा झूठ है। इस तरह से एक अर्द्ध-सत्य पैदा हो गया।

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बात बोलेगी: मुखिया ‘मुख’ सों चाहिए…

अगर यह तोहमत है तब ‘किसने किस पर’ लगायी का सवाल खड़ा हो जाता। और कह भी कौन रहा है? जिसमें छप्पन छेद हैं? मतलब कोई ऐसा व्यक्ति जो हमेशा से सेलेक्टिव रहा हो वह किसी और पर यह तोहमत कैसे लगा सकता है कि कोई सेलेक्टिव क्यों है? इसलिए यह मुखिया होने की चुनौती है।

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बात बोलेगी: एक सौ चालीस करोड़ की सामूहिक नियति के आर-पार एक ‘थार’

क्या लगता है कि थार में केवल देश के गृह राज्यमंत्री का बेटा बैठा था जो उसे चला रहा था? या यह महज एक आकस्मिक घटना थी? या यह एक एक्सीडेंट था? या इस घटना को अंजाम देते वक़्त और उसके बाद के कार्य-कारणों का आकलन नहीं किया गया था? सब कुछ किया गया था। ध्यान से देखें तो थार उस जन्मकुंडली के रूप में बदलती हुई दिखलायी देगी जो हमारी नियति को गढ़ने के लिए बनायी गयी है।

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बात बोलेगी: खतरे में पड़ा देश, खतरों के खिलाड़ी और बचे हुए हम!

देश निरंतर खतरे की तरफ तेज़ कदमों से बढ़ा जा रहा है। लगता है देश जो है वो सुसाइडल यानी आत्महंता हो चुका है जो किसी भी तरह मरने पर आमादा है। जैसे कुएं के पाट पर खड़ा हो- अब कूदा कि तब कूदा। और तैरना उसे आता नहीं है, जिसका ज्ञान उसे छोड़कर बाकी सबको है। इसलिए सब उसे कूदने से रोक रहे हैं। डर लग रहा है देखकर कि कहीं कुछ लापरवाही न हो जाए। हाथों से छिटककर देश कहीं सचमुच कुएं में समाधि न लगा ले।

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