बात बोलेगी: फिर आया लोकतंत्र के कर्मकांड का मौसम…


लीजिए, देश का लोकतंत्र अब अपनी असलियत पर उतर आया है। चुनाव पर। चुनाव हमारे देश में लोकतंत्र की असलियत है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है, बल्कि ऐसा ही है। आम तौर पर चुनाव इसलिए होते हैं कि जनता के मुद्दे (उस जनता के जिसकी मिल्कियत में यह देश, यह लोकतंत्र, यह समूची व्यवस्था है) सामने आते हैं। अपने देश में चुनाव हालांकि खुद में सबसे बड़ा मुद्दा है जिसकी आड़ में सबसे पहले और स्थायी तौर पर जनता के मुद्दे नदारद कर दिये जाते हैं। इसलिए शास्त्रों में इसे लोकतंत्र या जम्हूरियत की असलियत कहा जाता है।

हर चुनाव के बाद लोकतंत्र अपने होने और जिंदा होने का सबूत देता है। ठीक वैसे ही, जैसे हरिशंकर परसाई ने कहा था कि ‘दो बेटियों के बाद बेटा पैदा हो जाने से ईश्वर के अस्तित्व का सबूत मिलता है’। अब चुनाव आ गए हैं। एक नहीं, दो नहीं बल्कि पांच राज्यों में और उनमें भी एक राज्य ऐसा है जो देश में सबसे बड़ा है। इतना बड़ा है कि उसे जीत भर लेने से कोई दल देश जीतने की हुंकार भर सकता है। यह हुंकार प्रदेश नाम के लिए उत्तर प्रदेश है पर उसकी वजह से पूरा देश ही निरुत्तर हुआ जाता है। इसके सहोदर पर्वतीय प्रदेश में भी चुनाव हैं जिसे दो चुनावों के बीच तीन-तीन मुख्यमंत्रियों का सान्निध्य मिला है। उस पर तुर्रा यह भी दिया जाता रहा है कि हम एक मुख्यमंत्री बदलें चाहे दस, हमारी मर्ज़ी! उत्तराखंड, जो स्वयमेव सम्पूर्ण उत्तर नहीं है बल्कि उत्तर का एक खंड है, यहां भी चुनाव की घोषणा के बाद अब सवाल नहीं हैं क्योंकि सवाल चुनावों से ध्यान भटका सकते हैं और जब देश में चुनाव ही सर्वश्रेष्ठ मुद्दा हो तब सवालों से न जूझना ही देश और लोकतंत्र की सेहत के लिए उचित है।

एक तीसरा राज्य है जो इस पंचवर्षीय अवधि में निरंतर चर्चा में बना रहा है। पांच नदियों से चौतरफा घिरे इस राज्य की खासियत यह है कि यह एक सीमावर्ती राज्य है जो ‘शत्रु देश’ से लगा हुआ है। देश में हुए लगभग हर चुनाव की तरह इस बार भी इस राज्य पर पूरे देश को खतरे में डालने का दायित्व मिला हुआ है। इसलिए इसमें अगर कुछ मुद्दे होंगे भी तो वो इस बड़ी बिसात या दायित्व के सामने फीके रह जाने वाले हैं। इस बिसात का प्लॉट 5 जनवरी को खरीदा जा चुका है, जिसका समय-समय पर इस्तेमाल होता रहेगा।

मणिपुर और गोवा दो ऐसे राज्य हैं जहां चुनावों की चर्चा 2014 के बाद से ही ज़ोर पकड़ी है वरना ये राज्य सामुदायिक भवन की तरह रहे हैं जिसमें किसी की भी आवाजाही हो सकती थी और इससे इन राज्यों की सेहत पर कोई खास फर्क भी नहीं पड़ता था। पड़ता भी होगा तो दुनिया को पता नहीं चलता था। जब से भाजपा एक सत्तासीन दल बन गया है तब से वह हर मैच को विश्व कप की तरह खेलना चाहती है और गाँव-जवार के टूर्नामेंट जीतने के लिए भी ज़ोर लगा देती है। इससे हुआ यह है कि इन राज्यों की सेहत तो बिगड़ी ही है, लेकिन पूरे देश की सेहत पर भी काफी प्रतिकूल असर हुए हैं।

चुनावों के ऐलान के बाद से सब कुछ इसी के इर्द-गिर्द हो गया है। कल को कोई कह सकता है कि उसके घर में तो मसूर की दाल बनी है, लेकिन पाँच राज्यों के चुनावों के संदर्भों में इस कथन का अर्थ कुछ और हो सकता है, जिसके बारे में उसने दाल बनाते और खाते वक़्त ज़रूर न सोचा होगा लेकिन पचाते वक़्त तक चुनाव ही उसके तन-बदन में दौड़ता रहेगा।

चुनावों का ऐसा मनोवैज्ञानिक दबाव हिंदुस्तान में नया नहीं, काफी नया है। इसकी पड़ताल सुधिजन ने ज़रूर की होगी, लेकिन इसका अंदाज़ा किसी सूक्ति में निकलकर अभी आया नहीं है। कोई बता रहा था कि ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि चुनावों के दौरान इस देश की सरकार ही स्थगित हो जाती है। पहले जब राज्यों में चुनाव हुआ करते थे तो राज्य सरकारों की ही शक्तियां चुनाव आयोग को हस्तांतरित हुआ करती थीं। इधर कुछ वर्षों में, विशेष रूप से जब से भारतीय जनता पार्टी मौज में आयी है, तब से चुनाव भले ही घाना या नाइजर या टोगो में हों लेकिन सबसे पहले स्थगित होती है केंद्र की सरकार। उसके सारे मंत्री संतरी, तमाम एजेंसियां उन राज्यों में चली जाती हैं और इससे पूरे देश को लगता है कि चुनाव हो रहे हैं और निष्कर्षत: यही एक बड़ी वजह भी है कि चुनाव देश का सबसे बड़ा मुद्दा बन जाता है।

एक पड़ताल कहती है कि मीडिया- जिसका कार्यक्षेत्र समूचा ब्रह्माण्‍ड होता है- खुद को केवल उन राज्यों में नियुक्त कर लेता है जहां चुनाव हों और बाकी देश-दुनिया से उसका कनेक्‍शन कट जाता है और हर वक्त केवल चुनावों की ही चर्चा होती रहती है जिससे देश के समस्त ‘वी द पीपुल’ को लगता है कि अब चुनाव ही मुद्दा है। चुनाव के सिवा किसी अन्य बात पर कोई बात हो नहीं सकती। आजकल मीडिया ‘ईमानदार’ शब्द से चिढ़ा हुआ है, जिसे चुनावों के सह-उत्पाद या बाय-प्रोडक्ट के तौर पर देखा जा सकता है। अभी ऐसे कई और वाकये आएंगे जहां जनता को मनोरंजन के लिए भरपूर मसाला मिल सकता है।

https://twitter.com/rishibagree/status/1480563104077344780?s=20

सामान्य लोकाचार पर हुए एक अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि सभी के ऊपर यह ज़िम्मेदारी आ जाती है कि जिन राज्यों में चुनाव हैं उनके बारे में लोग ज़्यादा से ज़्यादा जानें। कुछ नहीं तो कम से कम अलग-अलग राजनैतिक दलों के नेताओं के नाम ही जान लें। कभी इस तरह का दबाव क्रिकेट या फुटबॉल के विश्व कप टूर्नामेंट्स के दौरान युवाओं में देखा जाता था। उनका अपडेट होना सामाजिक संबंधों और सहज लोकाचार के लिए बहुत ज़रूरी हो जाता था। जो ऐसा नहीं कर पाते थे उनकी स्थिति कोरोना काल में हो रहे इन चुनावों और तत्‍संबंधी आचार संहिता के मुताबिक चुनाव प्रचार की नयी प्रविधियों में संसाधनों के अभाव में मरणासन्न हो जाती है।

अर्थव्यवस्था पर भी चुनाव के बादल पूरे तरह से छा जाते हैं। सारी की सारी योजनाएं एक वक्‍फ़े के लिए लोग किनारे रख देते हैं। चुनाव के बाद चीज़ें सस्ती महंगी होने का चलन रहा है। इसका असर शेयर मार्केट पर भी होने लगा है। शेयर मार्केट की हरकतों से भी कुछ जानकार चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी करते हैं। यहीं आकर थोड़ा लगता है कि अगर इस प्रविधि से चुनावों को देखा जाय तो ये न केवल सबसे बड़ा मुद्दा बन जाते हैं बल्कि समूचा लोकतंत्र कैसे शेयर मार्केट द्वारा नियंत्रित है इसका भी प्रामाणिक भान होने लगता है।

चुनाव का असर राजनीति पर कैसे पड़ता है? यह एक ‘घाव करे गंभीर’ जैसा सवाल है जो देखने में नाविक के तीर सा लगता है। असल बात चुनाव में राजनीति ही है। लोग अक्सर पूछते हैं- आप राजनैतिक कैसे हैं अगर आप चुनाव नहीं लड़ते? इस देश में जिन दो बातों का सबसे प्रबल घाल-मेल है- जैसे न्यूज़ में व्यूज़ का (बक़ौल मुख्य न्यायाधीश, माननीय सर्वोच्च न्यायालय), जैसे दूध में पानी का (बतौर 90 प्रतिशत हिन्दुस्तानी परिवार), जैसे फिल्मों में सेक्स का (बक़ौल युवा से प्रौढ़ होती पीढ़ी) वो राजनीति और चुनाव हैं। दोनों एक-दूसरे पर कोई फर्क नहीं डालते बल्कि एक दूसरी की ज़रूरत और अहमियत को मजबूत करते हैं। यूं ही नहीं देश में चुनाव के अलावा जो सबसे बड़ा मुद्दा हमेशा रहता है वो राजनीति है।



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