“Worst hit countries due to COVID-19 is currently governed by far right, anti semitic, xenophobic, chauvinist, jingoist politicians. Be it the U.S, the UK, Brazil, Turkey or India”.
“कोविड-19 की वजह से जो देश सबसे बुरी तरह प्रभावित हैं, जैसे अमेरिका, ब्राजील, तुर्की या भारत, उन सभी पर अतिवादी दक्षिणपंथी, सामी-विरोधी, काल्पनिक डर पैदा करनेवाले, अंध-राष्ट्रवादी और श्रेष्ठता-ग्रंथि से ग्रस्त राजनीतिज्ञ सत्ता पर काबिज़ हैं।”
यह हाल ही में कॉलेज की पढ़ाई कर छूटे एक नौजवान की फेसबुक वॉल पर चस्पां किया हुआ डायलॉग है। ज़ाहिर तौर पर, इस डायलॉग में कई तरह के पेंच हैं। जैसे, इसमें इटली और रूस का ज़िक्र नहीं है (वैसे, वहां के शासकों को भी बाल-बुद्धि चाहे तो इसी तरह के विशेषण से नवाज़ सकती है)। दूसरे, भारत में अतिवादी दक्षिणपंथ तो छोड़िए, सामान्य सा दक्षिणपंथ का चूज़ा भी शासन नहीं कर रहा है। तीसरे, सामी-विरोधी शासन? चौथे, श्रेष्ठता-ग्रंथि का मतलब कहीं हाल की नेपाल वाली घटना तो नहीं, जिसमें नेपाल ने भारत को हड़काया है?
बात को आगे बढ़ाने से पहले एक फिल्म ‘मैनहटन नाइट्स’ का मुख्य पात्र याद आता है। वह एक स्तंभकार है और एक दृश्य में बोलता है, “मैं शब्दों से यातना को बेचता हूं। वैसे, सच पूछो तो हम लोग ख़तरे में आयी प्रजाति हैं, जिस देश में 80 लाख युवाओं के हाथ में आइफोन है, वे वीडियो बना रहे हैं और सोच रहे हैं, सॉरी, वे मान रहे हैं कि दरअसल वे ही रीयल-टाइम पत्रकारिता कर रहे हैं।”
भारतीय संस्कृति में ‘अक्षर’ को ‘ब्रह्म’ माना गया है। अक्षर- जिसका कभी क्षरण या नाश नहीं हो, और ब्रह्म यानी जो लगातार वर्द्धमान हो, सतत् बढ़ता रहे। दिक्कत यह हुई है कि हम सभी लोगों ने अपने प्रमाद में शब्दों का जितना अवमूल्यन किया है, हमारा समाज भी उतना ही पतित और गर्हित होता चला गया है। समस्या यह है ही नहीं कि कॉलेज से छूटे एक युवा ने इतने भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल किया। मैं प्रसन्न होता यदि वह इनके असली मायने जानकर इनका प्रयोग करता।
दुखद, कि ऐसा है नहीं। रीयल-टाइम में अपनी बात कह देने या लिख देने की सनक में हम शब्दों के अर्थ बदल दे रहे हैं। उनमें अपने अर्थ भर दे रहे हैं। इसके लिए बिहार की बदहाल शिक्षा-व्यवस्था से लेकर जेएनयू की उच्च-भ्रू, इंडिया इंटरनेशल सेंटर में शैंपेन सी खनकती इंग्लिश बोलने वाले, सब बराबर जिम्मेदार हैं। रटे-रटाये कुछ तय शब्द हैं जिनमें पूरी दुनिया की प्रक्रियाओं को ये लोग परिभाषित करने की सलाहियत रखते हैं। ये इन्हें वैसे ही बोल जाते हैं, क्योंकि कुछ बोलना है। इस बोलने में हालांकि अक्षर का अवमूल्यन होता है, अर्थ की हत्या हो जाती है। सामाजिक त्रासदियों पर सामाजिक संवेदना का घटता स्तर यूं ही नहीं देखा जा रहा है। हर साम्प्रदायिक झड़प को pogrom और genocide कह देना, हर पलायन को exodus कह देना, किसी भी औसत नागरिक को right-wing या fascist कह देना, इन शब्दों के वास्तविक अर्थ को छीन रहा है। क्रिया को अतिरंजित कर रहा है। अक्षर, यानी ब्रह्म की हत्या कर रहा है।
यह नया नहीं है। शब्दों के अविवेकी प्रयोग को कुछ दशक होने को आये। सिख-विरोधी 1984 के दंगे को “एक बड़े पेड़ के गिरने पर हिली धरती” का उदाहरण मान लेने की असंभव कला भी इस देश में शब्दों के इसी अवमूल्यन से सीखी और सिखायी गयी है, जिसकी जड़ों को देवकांत बरुआ का भाषाविज्ञान सिंचित करता है जब इमरजेंसी से पहले वे नारा देते हैं, “Indira is India, India is Indira”। उसी नारे के मुरीद आज की तारीख में Idea Of India की खोज में लगे हुए हैं। ये बात अलग है कि आइडिया का न पहले पता था, न अब है। पूछने पर एक और शब्द-भ्रम मुंह पर फेंक दिया जाता है- “गंगा-जमुनी”। पलट कर पूछिए कि गंगा कौन है और जमुना कौन, फिर आइडिया आफ इंडिया की उड़ती धज्जियां देखिए।
हमारी पीढ़ी पत्रकारिता के पुराने स्कूल की है, जहां हमें सिखाया जाता था कि शब्दों के प्रयोग में कंजूसी कैसे बरतनी है। जब एक हेडलाइन के लिए आधे घंटे तक सिर-फुटव्वल हो जाती थी और सटीक व तेज एडिटिंग करने वाले को लोग सम्मान की नज़र से देखते थे। आज हालांकि, ऐसे वीर-वीरांगनाएं आ गये हैं जो अपने ‘मैक’ पर एक नजर फेरते ही अच्छी से अच्छी ख़बर का तिया-पांचा कर डालते हैं।
दरअसल, हमारा पूरा समाज ही अर्द्ध या पूरी बेहोशी में लिख, पढ़ और सोच रहा है। नकलची तो खैर हम अपने आदिम पूर्वजों से अधिक ही होंगे, कम नहीं। अमेरिका में अभी दंगे भड़क रहे हैं, एक अश्वेत जॉर्ज फ्लॉएड की श्वेत पुलिसकर्मियों द्वारा हिरासत में लेते वक्त हुई मौत के बाद से पूरा देश उबल रहा है। वहां एक राज्य के पुलिसकर्मी अपने घुटनों पर बैठकर माफी मांगते हैं। इसको देखते ही एक स्वनामधन्य फिल्मकर्मी अनुभव सिन्हा के अंदर का आंदोलनकारी उबाल मारते बाहर आ गया और उन्होंने सभी हिंदुस्तानियों को चुनौती दे दी- माइनॉरिटीज़ से माफी मांगने की।
यह मांग किस हद तक अतार्किक और नाजायज़ है, या फिर पूरे हिंदुस्तान को चुनौती देना कितनी वाहियात बात है, इसको तो देखने के कई आयाम हो सकते हैं, लेकिन अनुभव सिन्हा को भी शायद ही यह बात पता होगी कि दरअसल घुटने पर झुकने की यह अदा अमेरिकी फुटबॉल की एक शैली है। आक्रामक फुटबॉल खेलने वाला क्वार्टरबैक कहलाता है और आखिरी क्षणों में जब खेल को रक्षात्मक शैली से बचाना होता है, तो वह एक घुटने पर झुक कर खेल रोकता है। इसे ‘टेकिंग अ नी’ कहते हैं। 2016 में कॉलिन केपरनिक नामक अश्वेत क्वार्टरबैक ने अमेरिकी राष्ट्रगान के समय ‘अश्वेतों पर हो रही पुलिस ज्यादती’ (ध्यान दीजिएगा) के विरोध में अपने घुटने पर झुकना शुरू किया।
उसका करियर उस मैच के बाद खत्म हो गया, उसे राष्ट्रद्रोही माना गया। अनुभव सिन्हा जी को कॉलिन के हालचाल लेने चाहिए और यह समझना चाहिए कि ‘जिसका काम उसी को साजै, और करे तो डंडा बाजै’। हां, 2016 में ट्रंप ही अमेरिका के राष्ट्रपति थे क्या?
मेरे एक मित्र ने कभी चर्चा के दौरान कहा था कि हम दरअसल प्रतिक्रियावादी समाज मात्र बन कर रह गये हैं। जल्दबाजी में, हड़बोंग में, बस अपनी बात कह देनी है। हालांकि, 10 सेकंड भी हम रुक जाएं तो शायद कई सारी ‘दुर्घटनाएं’ होने से बच जाएं, लेकिन नहीं।
इस क्षणजीवी समय में हरेक विषय और हर मामले में टांग अड़ाने की हमें ऐसी अजीब हड़बड़ी है कि थक कर एक फेसबुकिया भले आदमी को यह तक लिखना पड़ जाता है, “भाइयों। यदि आप सभी की हाथी पर की सारी पोस्ट्स खत्म हो गयी हों, तो मैं फेसबुक पर लॉग-इन कर लूं?”
लेखक स्वतंत्र पत्रकार और सोशल मीडिया कंसल्टेन्ट हैं
Very good analysis of nonsense intelectuals
चूस लइए गए अर्थ वाले सब्दों के ढेर पर प्रतिक्रिया स्वरूप सब्दो का एक और घटाटोप बैंब्दंबर! फरखते प्रजातंत्र के सुलभ मंचो पर आम आदमी की मूर्खतापूर्ण(पंडित्याबिहिन्न) अभिंब्यक्ती पर परंपरावादी सुधतावादी पंडित का बिलाप!
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दक्षिणावर्त: रीयल-टाइम में ‘ब्रह्म-हत्या’ के भागी शब्दवीर – Junputh
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