भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है लेकिन इसके बावजूद देश में आज भी करोड़ों लोग बेहद ग़रीब हैं। असल में हमारी आर्थिक प्रगति और लोगों की वास्तविक आमदनी के बीच एक गहरी खाई है।
साल दर साल शहर फैल रहे हैं, बड़े-बड़े मॉल्स खुल रहे हैं और देश की GDP लगातार बढ़ रही है लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि आज भी करोड़ों लोग दो वक्त के खाने, बुनियादी शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए रोज़ संघर्ष कर रहे हैं। ऐसा क्यों है? क्योंकि आर्थिक विकास का लाभ समाज के हर तबके तक बराबर नहीं पहुँच पा रहा है। हालांकि कि डेटा कहता है कि जीडीपी में 60 प्रतिशत हिस्सा कर्ज का है।
आम तौर पर हमें लगता है कि ग़रीबी पैसे का अभाव है तो बिल्कुल नहीं! यह दरअसल अवसरों, अच्छी शिक्षा, हेल्थ सर्विसेज़ और सोशल सिक्योरिटी की कमी है इसीलिए इसे मल्टी डायमेंशनल यानी बहुआयामी कहा जाता है।
अगर इसके रूट कॉज़ को तलाशिये तो इसके पीछे बेरोज़गारी, घटती प्रोडक्टिविटी, बेकार शिक्षा व्यवस्था और रूरल डिस्ट्रेस है। यहाँ यह समझना बेहद ज़रूरी है कि ग़रीबी में जीना किसी व्यक्ति का फेल्योर नहीं है! यह एक स्ट्रक्चरल फेलियर है।
ग़रीबी का सर्कल ठीक वैसे ही काम करता है जैसे शरीर के इम्यून सिस्टम का गड़बड़ा जाना। जब इम्यून सिस्टम कमज़ोर होता है तो बीमारियाँ घेर लेती हैं। इसी तरह, ग़रीबी के कारण कुपोषण, कमज़ोर शिक्षा और स्किल की कमी होती है, जिससे आगे चलकर कमाई भी कम होती है।
जैसे मान लीजिए, गाँव के किसी ग़रीब किसान का बच्चा कुपोषण या सही इलाज न मिलने से बार-बार बीमार पड़ता है और इस कारण वह स्कूल नहीं जा पाता। बड़ा होकर वह कोई हुनर नहीं सीख पाता और मजबूरन उसे भी अपने पिता की तरह कम पैसों में मज़दूरी करनी पड़ती है।
अगर सीधे कहा जाए तो यही कि ग़रीबी एक ऐसा जाल है जो खुद को ही दोबारा रिप्रोड्यूस करता रहता है। कहना बस यही है कि इकोनॉमिक डेवलपमेंट या GDP का बढ़ना ही ग़रीबी को ख़त्म नहीं कर सकता।
जब तक कि डेवलपमेंट के फ़ायदे का उचित और बराबरी से डिस्ट्रीब्यूशन नहीं होगा तब तक ऐसे ही चलता रहेगा।
अगर विश्वगुरु बनना है, देश से ग़रीबी को सचमुच मिटाना है तो बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन हो, वेलफेयर स्कीम्स को ज़मीनी स्तर पर मजबूत करना होगा, हर व्यक्ति तक हेल्थ सर्विसेज की पहुँच इंश्योर करनी होगी और स्किल डेवलपमेंट पर ज़ोर देना होगा।
मुफ्त राशन देने के साथ-साथ यह भी देखना होगा कि सरकारी अस्पतालों में दवाई और डॉक्टर समय पर मिलें और सरकारी स्कूलों में ऐसी पढ़ाई हो कि गरीब का बच्चा भी बड़े दफ़्तरों में नौकरी पाने लायक बन सके।
निष्कर्ष यही है कि ग़रीबी सिर्फ एक आर्थिक मसला नहीं है यह सोशल जस्टिस का भी मामला है। ज़्यादातर लोग सिर्फ इसलिए ग़रीब नहीं हैं कि उनके पास कमाई का साधन नहीं है! वे इसलिए ग़रीब हैं क्योंकि उनके पास आगे बढ़ने के अवसरों का समान अधिकार नहीं है, मौके नहीं हैं!

