पुलिस के हथियारों से मुंगेर में हुआ नरसंहार: घटनाक्रम, संदर्भ व मांगें


बीते 26 अक्टूबर की रात मुंगेरवासियों के लिए दर्द-आंसुओं से भरी एक खौफनाक रात थी, जब दुर्गापूजा के मूर्ति विसर्जन के दौरान दर्जनों लोगों पर पुलिस प्रशासन ने गोलियां चलायीं व बेरहमी से लाठीचार्ज किया। इसमें 18 साल के अनुराग की घटनास्थल पर ही मौत हो गयी। मौत ऐसी कि कातिल का भी शरीर कांप जाए। बाकी 50 से भी ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गये। 

#जनरल_डायर_नीतीश_कुमार और #मुंगेर_नरसंहार के साये में पहला मतदान

मुंगेर की बड़ी दुर्गा अपने श्रद्धालुओं में अलग ही महत्व रखती है, आप इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि मुंगेर जिले के हर घर में एक बड़ी दुर्गा की फ़ोटो लगी होती है। बड़ी दुर्गा की प्रतिमा 400 साल से बनती आ रही है। कई मूर्तिकार बदले पर उन्होंने अपने वंशज को उतने ही प्रतिभाशाली ढंग से मूर्ति बनाना सिखाया कि 400 साल में आज तक बड़ी दुर्गा की प्रतिमा में रत्ती भर का भी फर्क नहीं आया। 

विजयादशमी को दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन होता है, लेकिन मुंगेर की बड़ी दुर्गा कहारों के कंधे पर होते हुए 8 किलोमीटर की दूरी तय करती हैं और अंततः विसर्जन सोझी घाट (गंगा नदी) में किया जाता है। मुंगेर व जमालपुर शहर को मिला कर 100 से ज्यादा मूर्तियां बैठती हैं, लेकिन जब विसर्जन का वक़्त आता है तो पहले बड़ी दुर्गा का ही विसर्जन किया जाता है जिसमें 10 घंटे से ज्यादा का समय लगता है। 50 टन से ज्यादा भारी मूर्ति को लोग कंधे पर ढोते हुए 8 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं।

यह घटना 26 अक्टूबर के 12 बजे रात की है जब 100 से ज्यादा श्रद्धालुओं के द्वारा बड़ी दुर्गा का विसर्जन किया जाना था। दुर्भाग्यवश, कहारों (जो कंधे पर मूर्ति को लेकर जाते हैं) को चोट लग जाने के कारण दुर्गा की प्रतिमा को सड़क पर ही रोक दिया जाता है। लोग प्रतिमा को जमीन पर उतार देते हैं और पुलिस श्रद्धालुओं पर दबाव बनाती है कि जल्दी से जल्दी मूर्ति का विसर्जन करें। श्रद्धालु, अपनी समिति (जो बड़ी दुर्गा के सारे खर्च व व्यवस्था के लिए आम लोगों के द्वारा बनायी जाती है) से राय लेने की बात कहते हैं क्योंकि 100 लोगों से इतनी भारी मूर्ति कंधे पर ढोते हुए विसर्जन करना नामुमकिन सा है, इसीलिए लोगों ने समिति से बात करने के बाद ही फैसला लेने का निश्चय किया।

चूंकि 28 अक्टूबर को बिहार चुनाव के प्रथम चरण का मतदान होना था इसीलिए पुलिस प्रशासन ने श्रद्धालुओं पर अतिरिक्त दवाब डाला। इससे भी जब बात नहीं बनी तो इंचार्ज पुलिस अधिकारी ने मैडम साहिबा से फ़ोन पर बात की और उसके बाद दो हवाई फायरिंग कर दी। लोग डर गये और भागने लगे। फिर पुलिस ने सबको समेट कर एक जगह एकत्रित किया और जमकर लाठियां बरसायीं। कई लोग घायल हुए। यह सब इतना जल्दी हो रहा था कि लोगों को कुछ समझ ही नहीं आया। और फिर गोलियां बरसायी गयीं जिसमें 7 लोग गंभीर रूप से घायल हुए, एक 18 वर्ष के युवा की घटनास्थल पर ही मौत हो गयी। उसके सि‍र में गोली लगी और भेजा बाहर आ गया। 

पूरे शहर में 27 तारीख की अहले सुबह अफरातफरी मच गयी। कई लोग घायल थे, कई लोग मारे गये। मुंगेर की लोगों की बात मानें तो उन्होंने मौत की संख्या 4 बतायी है, जिसमें चार तस्‍वीरें उपलब्ध हैं जबकि अखबारों व पुलिस प्रशासन ने मात्र 1 की मौत की पुष्टि की है। 100 से ज्यादा लोग लापता थे। धरने-जुलूस निकलने लगे जिसका मुख्य नारा था: लिपि सिंह (एसपी) को गिरफ्तार करो, DM को बर्खास्त करो, चुनाव का बहिष्कार करो। दर्द व आंसुओं से भारी रात, सुबह होते ही आक्रोश में बदल चुकी थी।

पुलिस प्रशासन द्वारा यह कहा गया कि श्रद्धालुओं ने पत्थरबाजी की और असामाजिक तत्वों द्वारा गोलियां चलायी गयीं जबकि एक भी वीडियो जो पत्थरबाजी का सबूत दे, सामने नहीं आया है। एक फ़ोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुई जिसमें एक पुलिस अधिकारी अपनी पिस्टल चमकाते हुए चला आ रहा है। कुछ चश्मदीद गवाह हैं जिसने दो पुलिस अधिकारी को गोली चलाते देखा। इसमें बाशुदेवपुर थाना प्रभार शिशिर कुमार सिंह व मुफ्फसिल थाना प्रभारी ब्रजेश कुमार सिंह शामिल हैं। कई चश्मदीदों ने खुद अपने सामने लोगों को पुलिस की गोलियों से घायल होते हुए देखा। लोग कह रहे थे कि एके 47 को सिंगल फायर पर चलाया गया। 

27 अक्टूबर की सुबह जब लोगों को पता चला कि पुलिस ने 100 से ज्यादा लोगों को उठाया है तो वे एसपी और डीएम से मिलने गए। और उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि जो लोग रात से लापता हैं क्या प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार कर रखा है? प्रशासन कहता है कि आप दरख्वास्त लिखिए तभी हम वेरिफाइ कर पाएंगे, जिससे लोग और भी परेशान हो गए और प्रशासन का चक्कर काटते रहे। 

मुंगेर नरसंहार के घटनाक्रम में आप पुलिस प्रशासन की तानाशाही को देखिए। जब बंदूक ऐसे लोगों के संरक्षण में दे दी जाए जो तुनकमिजाज हों; जिला ऐसे अधिकारियों के हाथ में दे दिया जाए जो जनता की सेवा न कर उसको नियंत्रित करे; और सत्ता ऐसे हाथों में दे दी जाए जिसको जनता कीड़े-मकोड़ों की तरह लगने लगे; तब जनता की भलाई इसी में है कि वो सड़क पर निकल कर अपने आपको रिचार्ज करे और अपनी ताकत के अनुभव को समझे।

आखिर किसी के पास हमारे जीवन का ‘स्विच’ कैसे हो सकता है। वो कौन होता है यह निर्णय लेने वाला कि हम जीवित रहेंगे या मारे जाएंगे!

हमें मुआवजा का ढोंग नहीं चाहिए, हमें अपना पावर चाहिए। अपनी ताकत को हम महसूस करना चाहते हैं। हम ‘जनता जनार्दन हैं’ वाले वाक्य को अपने जीवन में रीढ़ की हड्डी के रूप में देखना चाहते हैं।  

फिलहाल तो हम यह चाहते हैं कि वो मुंह जिसने खून करने का आदेश दिया और वह हाथ जिससे हमारे दोस्त, हमारे भाई, हमारे नागरिक का खून हुआ, वो जेल के अंदर हों! 

हम एसपी लिपि सिंह व हत्यारे पुलिसवालों की गिरफ्तारी चाहते हैं!


PSO
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@Pso4revolution


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