किसी लेखक के जाने के बाद यह सवाल अक्सर सतह पर आ जाता है कि हमने वास्तव में क्या खोया है- एक व्यक्ति, एक रचनाकार, या उस भाषा का एक ऐसा ढंग जो हमारे समय में लगभग अप्रासंगिक घोषित किया जा चुका था? विनोद कुमार शुक्ल के निधन के साथ यही प्रश्न बार-बार मेरे भीतर उठता रहा। हर बार उत्तर किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचा। शायद इसलिए कि शुक्ल का लेखन स्वयं किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से बचता रहा।
विनोद कुमार शुक्ल 1937 में छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव में जन्मे थे। उन्होंने अपने पूरे जीवन को महानगरों में चलने वाली रचना की राजनीति से लगभग अलग रखा। वे कभी साहित्यिक मंचों के आकर्षण में नहीं आए, न ही सार्वजनिक वक्तव्यों में खुद को प्रस्तुत किया। उनका लेखन धीमा, स्थिर था। वह गहन नैतिकता से भरी एक प्रक्रिया थी।
बीते कुछ दिनों से वे बीमार चल रहे थे और अस्पताल में भर्ती थे। उनके जाने की ख़बर में कोई नाटकीयता नहीं थी। बस यह एहसास था कि भाषा के भीतर कहीं एक बेहद हल्की, लेकिन स्थायी उपस्थिति अब दिखाई नहीं देगी।
पहली बार उनका सामना
मैंने विनोद कुमार शुक्ल को पहली बार 2002 में पढ़ा था। वह समय जब पढ़ना आदत नहीं, खोज थी। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में स्नातक का पहला वर्ष था। मधुबनी से बनारस की यात्रा ने मेरे भीतर भाषा और संसार को देखने का ढंग बदलना शुरू ही किया था।
पटना में अशोक राजपथ की पुरानी किताबों की दुकान से दीवार में एक खिड़की रहती थी मेरे हाथ में आई। आज सोचता हूँ तो लगता है वह किताब मैंने खरीदी नहीं थी। उसने मुझे चुन लिया था। उस शीर्षक में ही कुछ ऐसा था जो अपनी ओर खींचता था- एक दीवार और उसमें रहने वाली खिड़की। स्थिरता के भीतर हल्का-सा विचलन।
बनारस लौटकर हॉस्टल के कमरे में मैंने उसे पढ़ा। उसी शाम मित्र चंदन पांडेय से लंबी बातचीत हुई। हम कथा, कथानक या शिल्प पर चर्चा नहीं कर रहे थे। हम यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि यह भाषा इतना कम कहकर इतना अधिक कैसे छोड़ जाती है।
न पहुँचने वाला आगमन
विनोद कुमार शुक्ल उन लेखकों में नहीं थे जो ‘आते’ हैं। वे साहित्यिक परिदृश्य में कभी प्रवेश करते हुए दिखाई नहीं दिए। वे वहीं थे, शुरू से, लेकिन उस तरह से नहीं जैसे ध्यान आकर्षित किया जाता है।
उनका लेखन किसी भी तरह के नाटकीय तंत्र या शैलीगत छल-कपट से दूर रहा। उनका लेखन समय की रेखाओं में धीरे-धीरे चलता था। उनके कथ्य में पात्रों का नाम होना या न होना, घटनाओं का बड़ा मोड़ होना या न होना, सब इसलिए था ताकि पाठक उस अंतराल में बैठकर खुद को सुन सके।
भाषा का संकोच
विनोद कुमार शुक्ल की भाषा का सबसे महत्वपूर्ण गुण उसका संकोच है। यह संकोच कमजोरी नहीं, बल्कि एक गहरी नैतिक चेतना से उपजा है। वे शब्दों पर अधिकार नहीं जताते। वे उन्हें उनके हाल पर छोड़ देते हैं।
उनकी रचनाओं में दोहराव, ठहराव और हिचकिचाहट दिखाई देती है। आलोचना की भाषा में कहें तो यह शैलीगत जोखिम है, लेकिन यही जोखिम उनके लेखन को मानवीय बनाता है। वे जानते थे कि जीवन रैखिक नहीं है, और भाषा भी नहीं हो सकती।
नामहीन उपस्थिति
उनकी रचनाओं में अनेक पात्र नामहीन हैं। यह कोई सौंदर्य-युक्ति नहीं, बल्कि एक वैचारिक स्थिति है। नाम देना किसी को स्थिर करना है। शुक्ल जीवन को स्थिर नहीं करना चाहते थे।
उनकी कविता ‘जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे’ इसी अधूरेपन की स्वीकृति है। जीवन में जो लोग हमारे सबसे निकट होते हैं, अकसर हमारी सबसे निजी जगहों पर अनुपस्थित होते हैं। शुक्ल इस अनुपस्थिति को दुख की तरह नहीं, सच्चाई की तरह स्वीकार करते हैं।
अनिर्धारित प्रेम
‘प्रेम की जगह अनिश्चित है’- यह पंक्ति किसी काव्यात्मक चमत्कार की तरह नहीं आती। यह लगभग सपाट है और शायद सपाटपन में ही इसकी सच्चाई है।
शुक्ल के यहां प्रेम कोई स्थिर भावना नहीं, बल्कि एक अस्थायी स्थिति है जो आती है, रहती है, और कभी-कभी बिना किसी निष्कर्ष के चली भी जाती है। यह प्रेम आधुनिक मनुष्य की उस असुरक्षा को स्वीकार करता है जिसे साहित्य अक्सर ढकने की कोशिश करता है।
राजनीति, जो चुप है
विनोद कुमार शुक्ल को अराजनीतिक कहना सरलीकरण होगा। उनका लेखन राजनीति को नारों में नहीं, ध्यान में खोजता है।
नौकर की कमीज़ में एक साधारण-सी वस्तु, एक कमीज़ पूरे सामाजिक तंत्र को खोल देती है। आकांक्षा, वर्ग और असमानता वहां किसी नारे की तरह नहीं आते, बल्कि रोज़मर्रा की विवशताओं में घुलकर दिखाई देते हैं।
सम्मान और विलंब
उन्हें 2024 में मिला ज्ञानपीठ पुरस्कार किसी उपलब्धि का चरम नहीं था। वह उस समय का विलंबित स्वीकार था जो बहुत देर से उनकी भाषा की गति के साथ चल पाया।
शुक्ल पुरस्कारों से नहीं बदले। शायद इसलिए कि उन्होंने कभी उसके लिए लिखा ही नहीं। उनका लेखन स्वयं में पर्याप्त था।
उनके बाद
विनोद कुमार शुक्ल के जाने के बाद हिंदी भाषा में एक तरह का नैतिक मौन कम हो गया है। वह मौन, जो शब्दों को ज़रूरत से ज़्यादा बोलने से रोकता था।
उनकी रचनाएं अब भी हमारे साथ हैं, लेकिन उनके साथ वह दृष्टि चली गई जो हमें बताती थी कि साहित्य का काम अनिवार्यत: दुनिया को बदलना नहीं, बल्कि उसे थोड़ा अधिक ध्यान से देखना भी हो सकता है।
और खिड़की…
दीवार में एक खिड़की रहती थी। आज भी रहती है।
वह बाहर की ओर नहीं, भीतर की ओर खुलती है। शायद विनोद कुमार शुक्ल की सबसे बड़ी देन यही थी कि उन्होंने हिंदी गद्य को फिर से अंदर की ओर देखना सिखाया।
(आशुतोष कुमार ठाकुर साहित्य और कला पर नियमित लिखते हैं)

