श्रद्धांजलि: आज आदिवासियों के हक में उठने वाली एक आवाज़ मौन हो गयी!


आखिरकार फादर स्टेन स्वामी सरकारी कैद से आजाद हुए। हमेशा के लिए। आज सरकारी और नक्सली हिंसा झेलने वाले आदिवासियों की एक आवाज मौन हो गयी है।

किसी तरह मुम्बई के तलोजा केंद्रीय कारागार से अस्पताल में उनके इलाज की कोशिश हो रही थी, लेकिन फादर स्टेन स्वामी का स्वास्थ्य जेल में लगातार गिरता गया। बिना सुनवाई के आठ महीने जेल में बिताने के बाद उनका टूटता हुआ शरीर मानव अधिकारों के लिए आवाज उठाने वालों पर हमला करने वाली सरकार और काफी हद तक कमजोर न्याय व्यवस्था के सामने नहीं टिक पाया।

चौरासी वर्षीय फादर स्टेन स्वामी जीवन भर दलित आदिवासियों के लिए कार्यरत रहे। जेल जाने से पूर्व वे लगातार सभी सामाजिक मुद्दों पर सरकार के सामने हमेशा खड़े हुए। हमेशा गांधी के मूल्यों को लेकर अहिंसक रास्ते को सही मानते हुए वे काम करते रहे। झारखंड में आदिवासियों के पत्थलगड़ी आंदोलन में उन्होंने आगे बढ़कर हिस्सा लिया। आदिवासियों को उनका हक मिले, उनके जंगल पर उनका अधिकार है, ऐसा पूंजीपतियों के हाथ में खेलने वाली सरकार कैसे स्वीकार कर सकती है?

फिर आदिवासियों की निस्वार्थ सेवा करने वाले सेवार्थी को बदनाम करने के उनको भीमा कोरेगांव वाले केस में उनका भी नाम डाल दिया गया और राष्ट्रीय जांच एजेंसी उनसे लगातार पूछताछ कर रही थी जिसके लिए वे हमेशा उपलब्ध रहते थे। वे भीमा कोरेगांव केस में अपनी किसी भी तरह की भागीदारी से हमेशा इनकार करते रहे। सरकार के साथ यह न्याय व्यवस्था पर भी प्रश्न है कि जो व्यक्ति अपने हाथ से उठाकर खाना नहीं खा सकता था, पानी नहीं पी सकता था, बिस्तर से हिल नहीं सकता था, उसको भारत की न्याय व्यवस्था जमानत देने से इंकार क्यों करती रही?

फादर स्टेन स्वामी की ‘’सरकारी हत्या’’ ने बहुत सारे प्रश्नों को समाज के लिए छोड़ा है। साथ ही एक बड़ा आदर्श भी छोड़ा है। 84 साल के कृशकाय फादर स्टेन स्वामी की आवाज सरकार के लिए घातक थी, इसलिए उनको जेल में डाला। तो क्या हम बोलना बंद कर दें? सच्चाई के लिए आवाज उठाना बंद कर दें? आदिवासी-दलित समाज पर हो रहे बर्बर हमले के खिलाफ आवाज उठानी बंद कर दें?

फादर स्टेन स्वामी का बलिदान हमें यही सिखा रहा है कि हमेशा जिन मूल्यों के लिए वे खड़े रहे और अंत में अपने जीवन का बलिदान दे गए, हम जो लोग संविधान में विश्वास रखते हैं, जो इस समता के सनातन मूल्य का सम्मान करते हैं वे सब उनके बलिदान को याद रखेंगे। दलित- आदिवासियों के संघर्ष को कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे। उनके हक के लिए अपनी आवाज को पुरजोर कायम रखेंगे। यही श्रद्धांजलि फादर स्टेन स्वामी को होगी।


विमल भाई माटू जन संगठन और जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) से जुड़े हैं