Vinod Kumar Shukla

वह खिड़की जो भीतर की ओर खुलती थी : स्‍मृतिशेष विनोद कुमार शुक्ल

उनका लेखन किसी भी तरह के नाटकीय तंत्र या शैलीगत छल-कपट से दूर रहा। उनका लेखन समय की रेखाओं में धीरे-धीरे चलता था। उनके कथ्य में पात्रों का नाम होना या न होना, घटनाओं का बड़ा मोड़ होना या न होना, सब इसलिए था ताकि पाठक उस अंतराल में बैठकर खुद को सुन सके।

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छह दशक से कविता के ‘अंधेरे में’ भटकता मुक्तिबोध का कहानीकार

मुक्तिबोध की रचना-प्रक्रिया में कविता चूंकि कहानी लिख पाने में हासिल विफलता के बाद आती है (जिसका उद्देश्य महज खुद को प्रकट कर के खो देना है), फलस्वरूप मुक्तिबोध के ही लेखे ‘‘साहित्यिक फ्रॉड’’ का अनुपात उनकी कविताओं में उनकी कहानियों के बनिस्बत कहीं ज्यादा है।

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बेरोजगारों के सबसे आत्मीय कथाकार हैं अमरकांत: प्रणय कृष्‍ण

आजादी के बाद नए भारत में जनता, विशेषकर किसानों, युवाओं और श्रमिकों की उम्मीदें निराशा में बदलती गई हैं, उसको अमरकांत ने बहुत ज़हीन ट्रिक से अभिव्यक्त किया। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन की बहुस्तरीय आवाज़ों को अपनी कहानियों व उपन्यासों में दर्ज किया। उन्होंने आजाद भारत में उभर रहे सांप्रदायिक ख़तरे, मध्यवर्ग के भीतर सामंती प्रवृतियों की गहराई से शिनाख्त की।

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भारतीय आलोचना का विद्रूप दोहरे अलगाव की देन है: मदन सोनी

गोष्ठी में दो दिनों तक इन मुद्दों पर जमकर चर्चा हुए। कई नई स्थापनाएं सामने आईं, कई समस्याग्रस्त पदों पर नई रोशनी पड़ी, अनेक मुद्दे अनसुलझे भी रहे। गोष्ठी का उद्घाटन वक्तव्य अशोक वाजपेयी ने दिया।

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विष्णुचंद्र शर्मा: अनुभव पकी आंखें और सृजन का निरंतर उत्साह ही उनके जीवन की प्रेरणा रहा

वह कहते थे कि अपनी शर्तों पर जीवन जीने के कारण मैं दिल्ली में एक गुमनाम साहित्यकार बनकर रह गया क्योंकि मैंने कभी किसी की चापलूसी नहीं की, सिर्फ अपने मन की करता था। वे घुमक्कड़ प्रवृत्ति के थे। उनका जन्म काशी में हुआ और आशियाना राजधानी दिल्ली में बनाया। उन्होंने अपनी शर्तों पर बनारस से दिल्ली तक का सफर तय किया था।

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लेखक संगठन और आत्मालोचन का सवाल: हिरन पर घास कौन लादेगा?

प्रो. अब्दुल अलीम, जिनका संबंध प्रगतिशील लेखक संघ के पुरोधाओं से है, उन्होंने लेखकों की एक बड़ी मीटिंग में कहा था कि लेखक संगठन बनाना उतना ही कठिन है जितना कि हिरन पर घास लादना, लेकिन हिरन पर घास लादने का कार्य प्रगतिशील लेखक संघ के उत्तराधिकारियों का काम है। इसे कोई दूसरा नहीं कर सकता है।

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बनारस ने उन्हें बहिष्कृत किया, लेकिन नामवर ने अपने गुरु का वैचारिक ध्वज कभी झुकने नहीं दिया!

बनारस में बंगला नवजागरण और रवीन्द्रनाथ टैगोर की चेतना से शिक्षित-दीक्षित और संस्कारित होकर हज़ारीप्रसाद द्विवेदी जब आए तब उन्हें अनेक तरह का विरोध झेलना पड़ा। इसकी झलक नामवर जी की किताब ‘दूसरी परंपरा की खोज’ और विश्वनाथ त्रिपाठी की किताब ‘व्योमकेश दरवेश’ में मिलती है। नामवर सिंह ने ऐसे में यदि द्विवेदी जी को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया तब यह बतलाने की जरूरत नहीं रह जाती कि उनकी विचारधारा क्या थी।

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उसने कहा था- “यह महाद्वीप एक दूसरे को काटने को दौड़ती हुई बिल्लियों का पिटारा है”!

धर्म को गुलेरी जी बराबर कर्मकाण्ड नहीं बल्कि आचार-विचार, लोक-कल्याण और जन-सेवा से जोड़ते रहे। इन बातों के अतिरिक्त गुलेरी जी के विचारों की आधुनिकता भी हमसे आज उनके पुनराविष्कार की मांग करती है।

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अमरकांत के कथा साहित्य में स्त्री की उपस्थिति

आज कथाकार अमरकांत की जयन्‍ती है। उनके लेखन का दायरा निम्नमध्यवर्ग और मध्यवर्ग की समस्याओं के आसपास केन्द्रित रहा है। इस समाज की आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति को अमरकांत ने व्यापक विस्तार के साथ चित्रित किया है।

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तिर्यक आसन: बधाई हो! हिंदी में पाठकों से अधिक संख्या साहित्यकारों की हो गई है

बधाई देने के लिए कई प्रकाशकों, संपादकों, साहित्यकारों ने ‘पेड स्लीपर सेल’ बना रखी है। ‘पेमेंट’ नकद के रूप में नहीं होता। कई अन्य रूपों में होता है। बधाई की जितनी नई उपमा, उतना अधिक पेमेंट।

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