कमल शुक्ला पर हमले में पत्रकारिता भी घायल हुई है!

कमल शुक्ला पर हमले को लेकर यह सवाल बार-बार पूछा जाता है कि क्या इस घटना को रोका जा सकता था? जवाब मिलता है ‘हां’, रोका जा सकता था! इय हमले की जांच के लिए गठित पत्रकारों की उच्चस्तरीय कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि दरअसल यह घटना सोशल मीडिया पर छिड़े महीने भर पुराने एक विवाद का परिणाम थी जिस विवाद में कमल शुक्ला, सतीश यादव, कलेक्टर कांकेर और कमल शुक्ला पर हमला बोलने वाले शामिल थे।

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राग दरबारी: यह कांग्रेस का संकट है या सभी पार्टियों का बराबर संकट?

सवाल यह है ही नहीं कि कांग्रेस को बचाया जा सकता था. यहां सवाल यह था कि कांग्रेस किस जाति या समुदाय के साथ गठबंधन करती जिससे कि उसकी डूबती हुई लुटिया को बचाया जा सकता था? क्या उस डूबती हुई नैया को पूरी तरह डुबाने का श्रेय राहुल गांधी को दिया जाना चाहिए? शायद यह कहना राहुल गांधी के साथ नाइंसाफी होगी.

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आधी रात खेला यूपी सरकार ने दांव, काग़ज़ी जंग में फंस गयीं कांग्रेस की बसें, मजदूर सड़क पर

16 मई को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के भेजे पत्र पर यूपी सरकार केवल काग़ज़ी खानापूर्ति करने में लगी थी

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राग दरबारी: विकास के वैकल्पिक मॉडल पर भारत में चर्चा क्यों ठप है?

हमारे देश के अधिसंख्य ‘बुद्धिजीवी’ इसी मोड में हैं कि उन्हें आज भी यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं है कि मोदी जी के नेतृत्व में ही कोरोना से जंग जीती जा सकती है!

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अलीगढ़: समद लिंचिंग केस के आरोपियों पर कांग्रेस ने की रासुका लगाने की मांग

अलीगढ़ पुलिस द्वारा 6 नामजद अभियुक्तों के ख़िलाफ़ 307, 147, 323, 904, 188 के तहत मुक़दमा दर्ज़ होने के बावजूद अभी तक सिर्फ़ 2 आरोपियों को पकड़ना और पीड़ित के पिता लईक उर रहमान से घटना के दो दिन बाद तक भी संपर्क न करना साबित करता है कि पुलिस सत्ता पक्ष के दबाव में काम कर रही है।

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