इस किताब के ऊपर पीछे की तरफ लिखा गया है:
“जॉन बर्जर की इस किताब ने पेंटिंग और कला आलोचना के बारे में सोचने का तरीका बदल दिया। यह शब्दों और चित्रों के जरिये दिखाती है कि हम जो कुछ भी हैं, वह हमें हमेशा सुंदरता, सत्य, सभ्यता, रूप, स्वाद, वर्ग और लिंग संबंधी हमारे अनेक पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता है!”
इसके अलावा जेनेट विंटरसन के हवाले से लिखा गया है, “बर्जर विचारों को इस तरह संभालते हैं जैसे एक कलाकार रंगों को संभालता है।”
जॉन बर्जर की प्रसिद्ध किताब ‘वेज़ ऑफ सींग’ के आशीष मिश्रा द्वारा किये हिंदी अनुवाद को पढ़ लेने के बाद यह दोनों बातें पूरी तरह से सही लग रही हैं। हिंदी संस्करण राजकमल प्रकाशन से छप कार आया है।

पुस्तक हमें चित्रकला के संदर्भ में बताती है कि विशेषाधिकार संपन्न एक अल्पसंख्यक तबक़ा (एलीट क्लास) अतीत की कला के रहस्यीकरण का इस्तेमाल अंततः वर्तमान में प्रभुत्वशाली वर्ग की भूमिका को न्यायोचित सिद्ध करने के लिए करता है और चूंकि प्रभुवर्ग की भूमिका को आधुनिक भाषा में न्यायोचित सिद्ध किया ही नहीं जा सकता इसलिए यह अनिवार्यतः रहस्यात्मक हो उठता है।
अपनी इस बात को समझाने के लिए लेखक 17वीं सदी में फ्रॉन्स हॉल्स की अंतिम दो महान पेंटिंग्स- जिसमें उन्होंने नीदरलैंड के हारलेम शहर के वृद्धाश्रम के संचालक और संचालिकाओं को चित्रित किया था- की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि संचालक और संचालिकाएं हॉल्स को घूर रही हैं। वह ऐसे चित्रकार को घूर रहे हैं जो आश्रयहीन है, अपनी प्रतिष्ठा खो चुका है और लोगों की कृपा पर ज़िन्दा है। पेंटर हॉल्स तटस्थ और वस्तुनिष्ठ रहने की कोशिश करता हुआ भी उन्हें किसी कंगाल की नजर से देख रहा है। अर्थात् वह उन नजरों को पार करने की कोशिश कर रहा है जो उसे कंगाल की तरह देखती हैं। यही इस पेंटिंग का तनाव है। एक ‘अविस्मरणीय कंट्रास्ट’ का तनाव!
हॉल्स पोर्ट्रेट बनाने वाला वह पहला चित्रकार है जो पूंजीवाद द्वारा गढ़े जा रहे नए किरदारों और उनके हाव-भाव को रचता है। उसने पेंटिंग में वही किया जिसे दो सदी बाद बाल्ज़ाक ने साहित्य में किया था।

इसके आगे यह पुस्तक हमें बताती है कि कैमरे के आविष्कार ने उन पेंटिंग्स को देखने का तरीका भी बदला जो कैमरे के आविष्कार के बहुत पहले बनाई गई थीं। मूलतः पेंटिंग्स जिन भवनों के लिए बनाई जाती थीं वह उनका अविभाज्य हिस्सा होती थीं।
पेंटिंग सामान्यतः अपने बारे में कही जाने वाली तमाम बातों के साथ पुनरुत्पादित होती हैं। इस बात को इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि यहां पर वान गॉग द्वारा बनाया गया एक चित्र दिया गया है। यह गेहूं के खेत के ऊपर उड़ते हुए कौवों का एक लैंडस्केप है। एक बार इसे देखिए।
फिर पन्ना पलटिए। अगले पन्ने पर इसी चित्र को बनाया गया है और इसके साथ यह जानकारी भी दी गई है कि यह अंतिम पेंटिंग है जिसे वान गॉग ने आत्महत्या से पहले बनाया था। इस एक जानकारी से इस चित्र को देखने का हमारा अनुभव कितना बदल जाता है, हालांकि आत्महत्या से पहले अंतिम पेंटिंग होने वाला तथ्य विवादित है।
इसके आगे तैलचित्रों के बारे में बताया गया है और एक कला माध्यम के तौर पर न्यूड चित्रों के बारे में बात की गई है। पेंटिंग्स में निर्वस्त्रता, नग्नता और अश्लीलता के बारे में बात की गई है कि किस तरह कोई चित्र या कोई प्रस्तुतीकरण वस्त्रों के साथ भी अश्लील हो सकता है और कोई चित्र या प्रस्तुतीकरण वस्त्रों के बिना भी श्लील हो सकता है।
पुस्तक का अंतिम अध्याय विज्ञापनों पर रोचक जानकारी प्रस्तुत करता है। विज्ञापन का असल उद्देश्य दर्शक के मन में उसकी वर्तमान जीवन-पद्धति के प्रति असंतोष पैदा करना है- समग्र सामाजिक जीवन के तरीक़े के प्रति असंतोष नहीं, बल्कि उस समाज में उसके निजी जीवन के तरीक़े पर असंतोष पैदा करना। विज्ञापन यह बताता है कि हम जो बेच रहे हैं अगर खरीदार उसे खरीद ले तो उसका जीवन बेहतर हो सकता है। वह उसके सामने उसके ही बेहतर व्यक्तित्व का विकल्प रखता है।

ऑयल पेंटिंग उन्हें संबोधित थी जिन्होंने बाजार से पैसा बनाया था। विज्ञापन उन्हें संबोधित होता है जिनसे बाजार बनता है। यह उस खरीदार-दर्शक को संबोधित होता है, जो उपभोक्ता-उत्पादक है। यह बाजार इन पर दोहरा लाभ कमाता है- पहले उनके श्रम से, दूसरा उनकी ख़रीद से। सारा ही विज्ञापन चिन्ता के बारे में है। यह समझ कि सब कुछ पैसा है और पैसा पाना चिंता से निकलने का तरीक़ा है।
पैसा ही जीवन है- इस अर्थ में नहीं कि पैसा नहीं होगा तो आप भूखों मर जाएंगे, इस अर्थ में भी नहीं कि पैसा आपको वह वर्गीय शक्ति दे सकता है कि आप दूसरे वर्गों पर अपना प्रभुत्व बना सकें, बल्कि इस अर्थ में कि पैसा हर मानवीय क्षमता की चाबी है। पैसा ख़र्चने की क्षमता जीवन जीने की क्षमता है। विज्ञापन की भाषा में जिनके पास खर्चने के लिए पैसा ना हो, वह व्यक्तित्वहीन हैं और जिनके पास पैसा है वह सब की चाहतों का पात्र होते हैं।
विज्ञापन उपभोग को लोकतंत्र का विकल्प बना देता है। कोई क्या खाता है, क्या (वाहन) चलाता है, इस बात का चुनाव, उसके राजनीतिक चयन की जगह ले लेता है। विज्ञापन समाज में मौजूद अलोकतांत्रिक तत्त्वों के छुपाने का एक मुखौटा बन जाता है और वह बाकी दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसे भी ढंक देता है। पूंजीवाद विज्ञापनों के बिना जीवित नहीं रह सकता है।

