इस बार क्यों बदला-बदला सा है मॉनसून का मिजाज़?

NASA (नासा) के गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज़ का कहना है कि सबसे गर्म वर्ष का पिछला रिकॉर्ड 2016 के नाम था जिस बाद 2020 सबसे गर्म वर्ष किया गया है। पिछले 30 वर्षों के रुझान स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि वैश्विक तापमान में वृद्धि ज़्यादातर मानव-प्रेरित गतिविधियों के कारण होती है जिससे जलवायु पैटर्न और वार्षिक मौसम प्रणाली बदलते हैं।

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महाविनाश को आमंत्रण है महाकाली पर बन रहा पंचेश्वर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट

2010 में एक अंतरराष्ट्रीय संस्था इंस्टीट्यूट फॉर एनवायर्नमेंटल साइंसेज (आइईएस) के लिए वैज्ञानिकों (मार्क एवरार्ड और गौरव कटारिया) के अध्ययन के अनुसार, यदि केवल महाकाली घाटी के पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाओं का आकलन किया जाए तो इस परियोजना की लागत, लाभ से कई गुना अधिक होगी। इस अध्ययन के अनुसार भारत और नेपाल को मिला कर घाटी के 80 हजार से ज्यादा लोग प्रभावित होंगे, जिसमें मुख्यतः किसान, मजदूर, मछुआरे हैं।

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Vaccine Internationalism: बिग फार्मा के एकाधिकार को चुनौती में केरल ने मिलायी अपनी आवाज़!

केरल के मुख्‍यमंत्री विजयन ने वैक्‍सीन उत्‍पादन को विस्‍तार देने की प्रतिबद्धता जताते हुए कहा कि वे इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्‍ड वाइरोलॉजी में एक अनुसंधान इकाई की शुरुआत करेंगे और केरल स्‍टेट ड्रग्‍स एंड मैन्‍युफैक्‍चरर्स जैसी सार्वजनिक इकाइयों को वैक्‍सीन निर्मित कर के निर्यात करने की अनिवार्यता लागू करेंगे।

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मनरेगा में जातिगत एडवाइजरी: दलित-आदिवासी के लिए न रहेगा फंड, न मिलेगा रोजगार!

इस एडवाइजरी की जरूरत क्या है? एडवाइजरी इस पर चुप है, लेकिन यह प्रचारित किया जा रहा है कि ऐसा आदिवासी व दलित मजदूरों की वास्तविक संख्या का पता लगाने के लिए किया जा रहा है। इसके लिए क्या वाकई मजदूरों का भुगतान अलग-अलग श्रेणियों में करने की जरूरत है? क्या यह मनरेगा की मूल मंशा के खिलाफ नहीं है?

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जलवायु, कोविड और प्रकृति के पतन के तिहरे संकट से निपटने में G7 देशों की तैयारी नाकाफ़ी

यदि ये नेतागण अक्टूबर में होने वाली G20 बैठक तक एकजुट नहीं होते हैं, तो COP26 बैठक का विफल होना तय है। फ़िलहाल सितंबर में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा अब COP26 से पहले G7 नेताओं के लिए महत्वपूर्ण तारीख के रूप में निर्धारित की गयी है।

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शूद्र, बहुजन, दलित: OBC की सही पहचान के लिए एक सही शब्द की तलाश पर बहस

। हमारे भारतीय समाज में केवल आर्थिक उत्पीड़न ही नहीं होता बल्कि जातिगत उत्पीड़न के साथ शोषण कई गुना बढ़ जाता है। यही सवाल बाबा साहेब अम्बेडकर को भी जीवनपर्यंत परेशान करते रहे। उन्होंने अपने समय के सवालों से जूझते हुए भविष्य के संघर्षों के लिए जो बात कही है वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

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जलवायु परिवर्तन की कोई वैक्सीन नहीं है! भारत के स्वास्थ्यकर्मियों के लिए एक गाइड

इस दस्तावेज का उद्देश्य स्वास्थ्यकर्मियों को जलवायु परिवर्तन और मरीजों तथा समुदायों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले उसके असर के बारे में विभिन्न विचार-विमर्श करने और मीडिया, विधायिका तथा नीति निर्धारकों जैसे हितधारकों को प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार करना और संचार संबंधी विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करना है।

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क्‍या अब मूल्यहीन राजनीति के विकल्प के बारे में नहीं सोचना चाहिए?

क्या चुनावी राजनीति में दलों द्वारा सत्ता के बदलाव से समाज की नैतिक न्यूनतम जरूरतें पूरी होती या हो सकती हैं? हो सकती हैं अगर चुनाव सिर्फ सत्ता हासिल करने मात्र का जरिया न हों। जनता के प्रति उत्तरदायित्व निर्वहन के लिए हों। इसलिए उन वास्तविक तत्वों को समझना जरूरी है जिनके आधार पर नैतिक न्यूनतम के लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।

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शहीद रामप्रसाद बिस्मिल: वो क्रांतिकारी जिसने क्रांति का रास्ता छोड़ जीवन जीने की लालसा नहीं की

अक्सर ही उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि दिखाने हेतु, उन्हें अशफाकुल्लाह के अभिन्न मित्र के स्वरूप मे पेश किया जाता है, परन्तु यह भी दोनों क्रांतिकारियों की विरासत को दरकिनार कर सिर्फ ऊपरी तौर पर उन्हें याद रखना है।

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सवा सौ साल पुरानी नागरीप्रचारिणी सभा का खोया गौरव लौटेगा, अदालती फैसले ने तोड़ा खानदानी वर्चस्व

हिन्दी भाषा और नागरी लिपि के निर्माण और प्रसार में अनिवार्य भूमिका निभाने वाली 128 वर्ष पुरानी संस्था नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी की हालत चिंताजनक थी. इस संस्था पर लंबे समय से एक परिवार ग़ैरकानूनी तरीक़े से क़ाबिज़ था. ये लोग निजी लाभ के लिए मनमानेपन से संस्था की मूल्यवान चल-अचल संपत्ति का दुरुपयोग कर रहे थे.

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