हमारी फरियादों को सुनने वाला अब कोई नहीं है: अरुंधति रॉय


ये एक छोटा सा वीडियो है, दिल्ली से। यहां हम सभी, जो जमा हुए हैं, वे लोग हैं, जो आपको लगातार सुन रहे हैं। हम लोग यहां कुछ साधारण सी मांगों को उठाने के लिए आये हैं। हमें ये मांगें उठानी पड़ रही हैं, यही अपने आप में बताने के लिए काफी है कि हम कैसे आदिम समाजों में जी रहे हैं।

सभी के लिए स्वास्थ्य सेवाएं। इस धरती पर रह रहे सभी के लिए भोजन, एक निश्चित आमदनी और सिर पर छत। इन बातों की मांग करनी पड़ रही है, यही इस बात सबूत है कि हमारा समाज अब मानवीय नहीं रह गया है।

मुझे वास्तव में आश्चर्य हो रहा है कि ये मांग हम किससे कर रहे हैं? हम किससे फरियाद कर रहे हैं? कोई हमें सुन भी रहा है?

कोविड 19 एक वायरस है1 लेकिन यह एक एक्स रे भी है जिसने यह उजागर कर दिया है कि हमने अपने समाज के साथ, अपने ग्रह के साथ, क्या-क्या किया है। जिसे हम सभ्यता कह रहे थे, वो तो विध्वंस निकला। जिसे हम सुख कह रहे थे, वह लालच निकला। जिन्हें हम रोजमर्रा की चीजें मानकर नजरअंदाज किया करते थे, वे भयावह अन्याय थे। अब यहां एक दरार पड़ गयी है। एक विस्फोट हुआ है। या विस्फोट के जैसा कुछ कुछ। और चीथड़े, यहां वहां हवा में लटक रहे हैं। वे हवा में ही टिक गये हैं. ये कहां जाकर गिरेंगे?

करोड़ों लोगों को घर में बंद कर दिया गया। मुझे नहीं लगता कि इतिहास में कभी ऐसा मौका आया होगा जब पूरी दुनिया के लोगों पर एक ही तरह का कानून लागू किया गया था। यह बहुत चिंता की बात है। कुछ देशों में यह बीमारी बहुत ही विनाशकारी रही है। कुछ दूसरे देशों में इसका ‘उपचार’ ही विनाश ला रहा है। लाखों लोगों ने अपनी नौकरी गंवा दी- वास्तव में करोड़ों लोगों ने अपनी नौकरी गंवा दी है। यहां भारत में, केवल चार घंटे के नोटिस पर 138 करोड़ लोगों पर 55 दिनों का लॉकडाउन लागू कर दिया गया। शहरों में फंसे लाखों मजदूरों के पास न खाने की व्यवस्था थी, न ठहरने का प्रबंध और न ही परिवहन की व्यवस्था, वे कहीं जा भी नहीं सकते थे। तब उन्होंने कूच करना शुरू किया। अपने अपने गांवों की ओर लंबी पदयात्रा। रास्ते में थकान से कई मर गए, कई भूख-प्यास और गर्मी से मर गए तो कई सड़क हादसे में मारे गए। कुछ को पकड़ लिया गया, तो कुछ पर ब्लीच व रसायनों का छिड़काव किया गया, जैसा जानवरों पर किया जाता है। पुलिस ने उनकी पिटाई की। पुलिस की पिटाई से कई लोगों की जान चली गयी।

ये लाखों लोग अपने गांव लौट रहे हैं। भूखे व बेरोजगार। यह मानवता के खिलाफ किया गया एक अपराध है। हमें इसका हिसाब चाहिए।

लेकिन आसमान तो साफ़ हो गया है। चिड़ियों की चहचहाहट फ़िज़ाओं में है और जंगली जानवर शहर की सड़कों पर दिखने लगे हैं। धरती हमें याद दिला रही है कि उसके पास खुद अपने उपचार के तरीके मौजूद हैं लेकिन इसके लिए उसे इतना सब करना पड़ा।यह महामारी दो दुनियाओं के बीच का प्रवेश द्वार है। सवाल यह है कि हम इसके पार कैसे जाएंगे? क्या हम मर के अगली दुनिया में प्रवेश करेंगे? या हम एक नया जन्म ले रहे हैं? एक इंसान के रूप में अपने जन्म और मृत्यु पर हमारा बहुत अख्तियार नहीं होता है, लेकिन एक जिंदा नस्ल के रूप में, शायद हम एक माध्यम बन सकते हैं।

अगर हम एक नया जन्म ले रहे हैं, या लेने की इच्छा रखते हैं, तो हमें अपने गुस्से को विद्रोह का रूप देना चाहिए। उसे इंकलाब तक ले जाना चाहिए। दान दक्षिणा और परोपकार से काम नहीं चलेगा। परोपकार बुरी चीज़ नहीं है लेकिन वह आक्रोश को हमदर्दी में बदल देती है। वह दरअसल ख़ैरात है, जो लेने वाले को तो छोटा बना देती है लेकिन देने वाले में ताकत व अभिमान का एक बोध पैदा करती है जिसकी अपेक्षा उसने की ही नहीं थी। परोपकारी काम सामाजिक ढांचे से छेड़छाड़ नहीं करते, उसे जस का तस कायम रखते हैं।

हमारी फरियादों को सुनने वाला अब कोई नहीं है। जो हम पर राज कर रहे हैं, वे कब का मर चुके हैं। उनके जबड़े भिंचे हुए हैं। हमें जो चाहिए, उसे छीनकर लेना होगा। या फिर लड़ते लड़ते मिट जाना होगा।


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