बात बोलेगी: ‘लोकल’ से ‘बोकल’ को समझने की एक कोशिश!


‘बात’ बोलती है इशारे से। इशारे, जिन्हें भाषा विज्ञान में साइन कहा जाता है। जब इंसान के जीवन का दायरा कतिपय छोटा था, तब ज़ाहिर है कि उसी जिज्ञासाएँ भी कम थीं। लेकिन मनुष्य तो मौजूद था ही। जिज्ञासा का केंद्र भी सबसे पहले खुद मनुष्य ही बनता गया होगा। इसे सबसे नजदीक से व्यक्त किया होगा बोलियों ने, जो सीमित भूगोल में अपने को बनाती और गढ़ती रहीं। भाषा का दायरा हमेशा बड़ा रहा और उसकी जिज्ञासाओं के क्षेत्र भी व्यापक रहे क्योंकि इन्हें ‘बनाया’ गया।

बोलियों से कतिपय छोटे आकार के समाज निर्मित होते हैं। आकार में छोटे मानव समुदाय जिन बोलियों को रचते हैं, वे उसी समाज का बेहद बारीक अवलोकन करते हुए बनती हैं। मानव स्वभाव की गहरी पड़ताल सभी बोलियों में हुई है। भाषाओं में भी हुई है, लेकिन भाषा जिसे हम आज के संदर्भों में समझते हैं वह एक व्यापक राजनैतिक मामला इसलिए भी हो जाता है क्योंकि वह अंतत: एक तरह के ‘आधिपत्य’ से प्रेरित है।

बोली में नैसर्गिकता या स्वाभाविकता निश्चित रूप से भाषा की तुलना में अधिक है क्योंकि इसका प्राथमिक उद्देश्य भिन्न रहा है। हर बोली में व्यावहारिक बातें हैं। भाषा में शास्त्र रचे गए हैं। बोलियों को सिद्धान्त गढ़ने की चाह कभी नहीं रही। भाषा खुद सिद्धान्त के सहारे चलती है जिसे व्याकरण मान सकते हैं। बोलियां, सिद्धांत का प्रतिपक्ष हैं।

आज का समय लोकल के लिए वोकल हो जाने का है। सभी से आह्वान किया गया है कि इसके लिए अपने तन, मन और धन को न्यौछावर कर दिया जाये। लोकल तो सबके अपने-अपने होते हैं। चार लोगों की महफिल में चार लोकल भी हो सकते हैं। किसी के लिए भोजपुरी लोकल हो सकता है, किसी के लिए हो या संथाली, किसी के लिए बघेलखंडी तो किसी के लिए बुंदेलखंडी। मेरे लिए बुंदेलखंडी मेरा लोकल है और मैं इस ब्रह्मांड को साक्षी मानकर अपने लोकल के प्रति वोकल होकर अपने राष्ट्र-धर्म का निर्वाह करने जा रहा हूँ।

सभी बोलियों में मानव स्वभाव और उसके आचरण को लेकर एक जैसी या अलग-अलग ढंग से कही गईं एक तरह की बातें मिल सकती हैं, लेकिन वो कोई कॉपीराइट नहीं लगातीं। उन बातों को किसी एक ने नहीं कहा। कहते-कहते, बरतते-बरतते वो बात बनी और चल पड़ी। चलते-चलते, तमाम अनुभवों से गुजरते-गुजरते वो सिद्ध हुई और फिर उसका प्रयोग होता रहा।

आज जब शास्त्र से देश नहीं चल रहा और केवल ‘कहने’ या वोकल होने से या लोकल स्टाइल में बोलें तो बकलोली से ही चल रहा है, तब इसके मिजाज को समझने के लिए हमें बोलियों की दुनिया में जाना चाहिए।

जब कोर्ट संविधान के विवेक से न चलें, सरकारें अपनी ताकत के स्रोत (जनता) और उसके दिये आदेश यानी जनादेश से न चलें, मीडिया कतई बेशर्म और निर्लज्ज ढंग से सत्ता की भक्ति में लीन हो और लगे कि यहाँ से कुछ हासिल नहीं होगा, तब हमें सत्ता केन्द्रित व्यक्ति की परख उन बोलियों से करना चाहिए जिसने बारीकी से मनुष्य को समझने की सलाहियत दी है।

इसी कोशिश में आज हम बुंदेली में पैदा हुए दो शब्दों की तरफ चलेंगे। ये शब्द हैं– ‘लबरा’ और ‘दौंदा’। इनसे मिलकर एक कहावत बनी– ‘लबरा बड़ौ कै दौंदा’। आम तौर पर बोलियों में पली-बढ़ी सूक्तियां किसी संदर्भ या वाकये से प्रेरित होती हैं। यह कहन भी ज़रूर किसी घटना से प्रेरित रहा होगा। हम यहां केवल इसके अर्थ को खोलेंगे। इसके सहारे हम व्यक्ति केन्द्रित सत्ता या सत्ता केन्द्रित व्यक्ति को समझने की चेष्टा करेंगे। मने लोकल के सहारे बकलोल या कहें बोकल की पड़ताल करेंगे।

‘लबरा’ मतलब शब्दश: झूठा। ‘दौंदा’ मतलब अपनी बात पर अड़े रहने वाला, एक ही बात को बार-बार कहने वाला। अब यह तय करने की चुनौती हमें बुन्देली देती है कि इन दो में बड़ा कौन है?

यहां बड़े से मतलब यही है कि कौन जीतेगा। कौन किस पर भारी पड़ेगा। चलिए, उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिये एक व्यक्ति है जो शुद्ध, सफ़ेद झूठ बोल देगा कि मैं फकीर हूं। मैंने भीख मांगी है। मैंने चाय बेची है। मैंने पहले एम.ए. किया, फिर बी.ए. किया। देश में इन्टरनेट आने से पहले मैंने कलर फोटो को ई-मेल से कहीं भेजा। जो पहले बोले कि मैं विवाहित नहीं हूं, फिर कुछ साल बाद बताए कि मैं विवाहित हूँ। जो कहे कि एक साल में दो करोड़ रोजगार देंगे। विदेशों में रखे काले धन को ले आएंगे। यह भी कहे कि अब मेरे देश में हवाई चप्पल पहनने वाला हवाई जहाज़ में बैठेगा। और तो और, देश नहीं बिकने दूंगा जैसा झूठ बोले। यह सब सफ़ेद झूठ हैं, लेकिन यही झूठ इस व्यक्ति की ताकत भी हैं। आदमी लबरा होकर भी ताकतवर हो सकता है।

अब आते हैं दौंदा पर यानी जो बार-बार अपनी एक ही बात पर अड़ा रहे। मसलन, वो कहे कि बीते सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ। पहले विदेश में भारत की इज्ज़त नहीं थी। वो कहे कि हमारी सरकार गरीबी से लड़ रही है। वो कहे और कहता रहे कि यह सरकार सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास लेकर चल रही है। इस देश में मुसलमानों की हालत दुनिया के तमाम मुस्लिम देशों से भी अच्छी है। वो कहे कि कश्मीर में स्थिति सामान्य है और वहां के बाशिंदे कश्मीर के टुकड़े किए जाने से खुश हैं। वगैरह, वगैरह।

अब मूल बात में समस्या यह आ रही है कि लबरा और दौंदा में से किसी एक को अपनी ताकत सिद्ध करना थी या मुक़ाबला उनके बीच होना था। यहां तो एक ही व्यक्ति में दोनों मौजूद हैं। एक मजबूत लबरा जो किसी भी हद तक झूठ बोल सकता है और एक उतना ही बड़ा दौंदा जो हर बार फर्जी और गलत दावे को दोहराता रहे। आपको क्या लगता है बुन्देली ने इस प्रश्न पर विचार नहीं किया होगा कि अगर एक ही व्यक्ति में ये दोनों लक्षण हों तब क्या होगा?

मेरा जवाब है- नहीं! बुन्देली भाषा के समाज ने दोनों की ताक़त को बराबर माना और मैच टाई करा दिया। यह एक नया वाकया बेचारी बुन्देली के सामने आ खड़ा हुआ। और ये तो होना ही था। यह ‘न भूतो न भविष्यति’ वाली स्थिति है। यह दौर व्यक्ति केन्द्रित सत्ता और सत्ता केन्द्रित व्यक्ति का है। ऐसे ही किसी मसले को लेकर शास्त्रों में ‘संदेह’ नामक अलंकार का जन्म हुआ होगा। मामले से मेल खाती एक नज़ीर देखें –

सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है
सारी ही की नारी है कि नारी की ही सारी है

अब आप अपनी सुविधा से ‘लबरा’ को ‘सारी’ से और ‘दौंदा’ को ‘नारी’ से बदल कर देखें। समझ जाएंगे।  


लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं


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