पुस्तक चर्चा: बदलती भू-राजनीति में रूस-अमेरिका के बीच मध्य एशिया पुल है या खाई? 

पुस्तक का परिचय देते हुए लेखक और जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. अजय पटनायक ने कहा कि पुस्तक का पहला संस्करण 2016 में आया था, परंतु इस भौगोलिक क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों के मद्देनजर दूसरे संस्करण को लाने की आवश्यकता महसूस हुई। उन्होंने कहा कि ये देश प्रारंभ में राष्ट्रवादी उत्साह के कारण पश्चिमी देशों और अमेरिका की ओर आकर्षित हुए थे, जिसका इस्तेमाल रूस के विरुद्ध किया गया।

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दो बरस बाद बेतलहेम में क्रिसमस : नया साल, नये सपने, उम्मीद और हौसले के नाम!

व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए शायद यह पहला नया बरस है और पहली क्रिसमस है जब मैं बहुत खुश हूँ। इसकी वजह है फ़लस्तीन से आया एक ईमेल जिसमें बेतेलहेम की एक दोस्त ने एक वीडियो भेजा है और साथ ही बताया है कि दो साल से ग़ज़ा में हो रहे नरसंहार के चलते बेतेलहेम में और सारे फ़लस्तीन में क्रिसमस नहीं मनाया गया था। इस बार बेतेलहेम में क्रिसमस ट्री सजाई गई और क्रिसमस मनायी गई।

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कविता जीवन पर निर्बल की सच्ची पकड़ है : कुमार अम्बुज को कुसुमाग्रज सम्मान के सन्दर्भ में

मराठी के विशिष्ट कवि कुसुमाग्रज के नाम पर स्थापित सम्मान से हाल में कुमार अम्बुज को सम्मानित किया गया है। कुमार अम्बुज प्रगतिशील लेखक संघ के सक्रिय और वरिष्ठ पदाधिकारी हैं। इस अवसर पर उन्हें बधाइयों के साथ उनकी रचनात्मक यात्रा पर संक्षिप्त टिप्पणी

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ग़सान कनाफ़ानी: फ़िलिस्तीन मुक्ति संघर्ष का राइटर और फाइटर

कनाफ़ानी ने जितना लिखा, उसका अभी तक कुछ अंश ही हासिल किया जा सका है। उन्होंने अनेक अखबारों में लिखा। अनेक नामों से लिखा। उनके लिए लेखन अपना नाम बनाने का नहीं, बल्कि फ़िलिस्तीन की आज़ादी के मक़सद को हासिल करने के लिए तर्क का औजार था, दुश्मन के ख़िलाफ़ मोर्चा था और लोगों को लामबंद करने की पुकार थी।

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स्मृति शेष: बड़े भाईसाहब से कैसे साथी बने कॉमरेड केसरी सिंह

उनके ठीक होने की इच्छा, उनके अंतिम समय तक कुछ न कुछ सार्थक करने और सीखने का व्यक्तित्व हमेशा हमारी यादों में रहेगा। मौत तो सबको ही आती है लेकिन वे लोग मौत के बाद भी जीते हैं जो मौत के डर से जीते-जी हथियार नहीं डाल देते।

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पॉल रॉबसन – समुद्र, आकाश और मिट्टी की आवाज़

इंदौर, 15 अप्रैल 2023 पिछली सदी के महान गायक और  नागरिक अधिकारों के योद्धा पॉल रॉबसन की 125वीं जयंती के मौके पर भारतीय जन नाट्य सघ (इप्टा) की इंदौर इकाई …

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साम्राज्यवाद के विरुद्ध अडिग चट्टान थे फिदेल कास्त्रो: 96वें जन्मदिन पर विशेष आयोजन

इन फिल्मों को हिंदी में डब करके हिंदी के दर्शकों को दिखाना भी बहुत ज़रूरी है ताकि नयी पीढ़ी के लोग हाड़-माँस के बने फिदेल कास्त्रो, चे गुएवारा, सल्वादोर अलेंदे, शेख मुजीबुर्रहमान आदि जैसे अजूबे करिश्माई व्यक्तित्वों को जान सकें और उनसे ये सीख सकें कि लोग ऐसे करिश्माई पैदा नहीं होते बल्कि असाधारण हालात साधारण लोगों को भी करिश्माई बना देते हैं।

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दो बच्चियों के खोने और मिलने से उपजे कुछ विचार

शहर में रहने वाले हर नागरिक को मानवीय गरिमा के साथ अपनी रोजी-रोटी कमाने का अवसर मुहैया करवाना भी सरकार की ज़िम्मेदारी है। धर्मार्थ भोजन बाँटना, प्याऊ खोलना अच्छे काम हैं लेकिन ऐसी व्यवस्था कायम करना जहाँ किसी को भीख माँगने की आवश्यकता महसूस ही न हो, इससे बड़ा जनहित का काम कोई नहीं।

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किसान आंदोलन के नेतृत्व को रचनात्मक तरह से अपनी शांतिपूर्ण छवि को वापस हासिल करना होगा

योगेंद्र यादव जैसे नेता तो इल्जाम लगाए जाने के पहले से ही गलती मानने और कृत्य की निंदा करने को तैयार बैठे थे जैसे चौरी-चौरा कांड हो गया हो और गाँधी जी की तर्ज पर इन्हें भी आंदोलन वापस लेने का ऐतिहासिक मौका मिला हो। जो हुआ, वैसा होना एक बड़ी चूक है लेकिन इतनी बड़ी भी नहीं कि आप सरकार द्वारा परोसी आंदोलन विरोधी हर खबर को सच मान लें और उसी रौ में बह जाएं।

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