किसान आंदोलन कल 9 महीने पूरा करेगा, सिंघू मोर्चा पर होगा SKM का अखिल भारतीय सम्मेलन!

भारत का ऐतिहासिक किसान आंदोलन – जो दुनिया का सबसे बड़ा, निरंतर, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन बन चुका है – कल 9 महीने पूरा करेगा – संयुक्त किसान मोर्चा का अखिल भारतीय सम्मेलन कल से सिंघू मोर्चा पर शुरू होगा.

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SKM का अखिल भारतीय अधिवेशन 26-27 अगस्त को, आंदोलन के विस्तार पर होगी चर्चा!

सम्मेलन 5 सत्रों में आयोजित होगा। 26 अगस्त को तीन सत्र होंगे, 10:00 से 1:00 तक, 2:00 से 3:30 बजे तक और 3.45 से 6 बजे तक होंगे। यह सत्र उद्घाटन सत्र, औद्योगिक मजदूरों पर और खेत मजदूरों, ग्रामीण मजदूरों का आदिवासी जनता पर किए जाएंगे। 27 अगस्त को 2 सत्र होंगे। पहला महिलाओं, छात्रों और युवाओं के हालात पर, सुबह 9:30 से 12:00 तक और अंतिम सत्र समापन सत्र, दोपहर 12:00 से 1:00 बजे तक। सभी सत्र में नेता इस आंदोलन के सवालों को संबोधित करते हुए अपने वर्ग के पर प्रभाव पर चर्चा करेंगे।

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ये दुनिया तालिबान के खूनी शासन की तरह कहीं अफगानी महिलाओं के संघर्ष को भी भुला न दे: RAWA

पेंटागन ने साबित कर दिया है कि आक्रमण अथवा हस्तक्षेप कभी भी सुरक्षित ढंग से समाप्त नहीं होता। सभी साम्राज्यवादी ताक़तें अपने सामरिक, राजनैतिक और वित्तीय स्वार्थों के लिए दूसरे देशों पर हमला करती हैं लेकिन अपने झूठ और कॉरपोरेट मीडिया की ताकत के बल पर अपने असली इरादों तथा एजेंडा पर पर्दा डालती रहती हैं।

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गन्ने की कीमतों और बकाया भुगतान पर पंजाब सरकार से किसानों की वार्ता बेनतीजा, जारी रहेगा विरोध

पंजाब सरकार के प्रतिनिधिमंडल द्वारा किसान नेताओं को आश्वासन दिया गया कि वे पंजाब में गन्ना उत्पादन से संबंधित उत्पादन की लागत के विवरण पर कल किसान नेताओं और विशेषज्ञों के बीच परामर्श करेंगे और इस परामर्श से प्राप्त जानकारी के आधार पर परसों मुख्यमंत्री इस पर निर्णय लेंगे।

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पंजाब में गन्ना किसान आंदोलित, पलवल मोर्चे पर हुए हमले की SKM ने की कड़ी निंदा

गुरुवार की सुबह संयुक्त किसान मोर्चा के पलवल मोर्चा पर 10-15 गुंडों ने मोर्चा पंडाल तोड़ कर मोर्चा में मौजूद किसान नेताओं पर हमला बोल दिया। गुंडों ने लंगर के रसोई स्वयंसेवकों पर भी हमला किया और कुछ टेंटों में आग लगाने की कोशिश की। घटना की खबर मिलते ही स्थानीय किसान बड़ी संख्या में जमा होने लगे तो गुंडे भाग गए।

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संयुक्त किसान मोर्चा का अखिल भारतीय सम्मेलन 26-27 अगस्त को, उत्तराखंड भी गरमाया

केंद्र सरकार ने हमेशा यह दिखाने की कोशिश की है कि यह ऐतिहासिक किसान आंदोलन कुछ राज्यों तक सीमित है, इस तथ्य की अनदेखी करते हुए कि देश भर के किसान जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और यह सम्मेलन केंद्र सरकार के झूठ के कफ़न में एक और कील साबित होगा।

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कोरोना काल में बच्चों की शिक्षा की चुनौती पर सांसदों के साथ RTE फोरम का वर्चुअल संवाद

फोरम द्वारा पेश 13 सूत्री मांगों के मद्देनजर सांसदों ने एक स्वर से अफसोस जताया कि जब शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त वित्तीय जरूरत थी, तब वर्ष 2021 में शिक्षा के राष्ट्रीय बजट में भारी कटौती की गई। कोरोना की पहली लहर के बाद अतिरिक्त सहायता नहीं मिलने की स्थिति में भारत के ग्रामीण इलाकों के 64% बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाने की आशंका को लेकर उन्होंने गहरी चिंता जताई।

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‘यथास्थितिवाद के विरोधी थे विलास, इसलिए नए संगठन बनाना उनकी जीवनशैली का हिस्सा बन गया’

कॉमरेड विलास के प्रश्न सीपीएम नेतृत्व के लिए असुविधाजनक बनते गए और सीपीएम नेता शरद पाटिल के विचार के प्रति उनका खिंचाव बढ़ता गया, किन्तु उनके इस विचार से कि देश में जनवादी क्रांति जाति इत्यादि सामाजिक प्रश्नों को भी हल कर देगी विलास को रास नहीं आता था इसलिए उनका सीपीएम के अंदर और बाहर साथ देने के बजाय प्रश्नाकुल बने रहे और सीपीआई(एमएल) के एक गुट सीआरसी में 1980 के दशक के आरंभिक दिनों में शामिल हो गए और उस दशक के ही 1987 तक महाराष्ट्र यूनिट के स्टेट सेक्रेटरी बने रहे।

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बंगाल का अकाल और ख़्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म ‘धरती के लाल’: IPTA की शृंखला

बिजन भट्टाचार्य का नाटक ‘नबान्न’ देखने के लिए जब अब्बास साहब 1943 गए तो वहां उन्होंने अकाल की वजह से पलायन करके कलकत्ता आए भीख माँगते किसानों और भूख की वजह से कचरे के ढेर से खाना तलाशते बच्चों, सड़कों पर गरीबों की लाशों तथा उसके बरक्स शानदार होटलों में चलते अमीरों के उत्सवों और जश्नों को देखा जिससे विचलित होकर और इसी विषय पर बने नाटक ‘नबान्न’, ‘अंतिम अभिलाषा’ और कृष्ण चन्दर की कहानी ‘अन्नदाता’ से प्रेरित होकर ‘धरती के लाल’ फिल्म बनाने की योजना बनायी।

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‘कोरोना में कोर्ट’: अदालतों पर निर्भर आबादी की लॉकडाउन में बर्बादी का एक दस्तावेज

यह फिल्‍म पटना हाइकोर्ट सहित राज्‍य की विभिन्‍न अदालतों पर निर्भर आबादी के बीच जनज्‍वार फाउंडेशन द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण पर आधारित है। एक घंटे की इस फिल्‍म में अदालती कामों से जुड़े हर तबके की समस्याओं को दिखाया गया है।

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