सीएए विरोधी आंदोलन में महिलाओं की गिरफ्तारी के खिलाफ़ 1100 नारीवादियों का संयुक्त बयान

दिल्ली पुलिस तुरंत अपनी कानूनी स्थिति के साथ सभी एफआईआर, गिरफ्तारी, हिरासत को सार्वजनिक करे और हिंसा की सभी घटनाओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करे

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‘सोशल डिस्टैंसिंग’ का सरकारी प्रयोग बंद करने सम्बंधी निर्देश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका

नवायन ने अदालत से दरखवास्त की है कि सरकारों को कहा जाए कि “सोशल डिस्टैंसिंग” की जगह वे “फिज़िकल डिस्टैंसिंग”, “इंडीविजुअल डिस्टैंसिंग”, “डिज़ीज़ डिस्टैंसिंग” या “सेफ़ डिस्टैंसिंग” का प्रयोग करें।

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न रैली, न सभा, न आयोजन! 134 साल में पहली बार वेबिनार पर मनाया गया मजदूर दिवस

इंदौर में श्रम संगठनों, जन संगठनों, कला-संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत संगठनों एटक, सीटू, सन्दर्भ, प्रलेस, इप्टा, एन. एफ. आई. डब्ल्यू. और रूपांकन के संयुक्त तत्वाधान में एक अनूठा और सार्थक कार्यक्रम आयोजित किया।

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खुल जाए शहर का ताला: अहमदाबाद और सूरत में प्रवासी मजदूरों पर आजीविका ब्यूरो का अध्ययन

यह अध्ययन दो प्रमुख भारतीय शहरों अहमदाबाद और सूरत में कोविड के महामारी का रूप लेने से पहले किया गया। प्रस्तुत है अध्ययन का सार

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वर्धाः खराब खाने की शिकायत पर विश्वविद्यालय ने छात्रा से लिया माफ़ीनामा, ABVP को उजागर कर दी पहचान

विश्वविद्यालय के करीब 200 छात्र-छात्राएं ऐसे हैं जो लॉकडाउन की वजह से परिसर में ही फंस कर रह गये

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कोरोना से उपजे आर्थिक संकट पर राहुल गांधी और रघुराम राजन के बीच हुई पूरी बातचीत यहां पढ़ें

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस दौर में कुछ जानकारों के साथ कुछ विशिष्ट विषयों पर वीडियो चर्चा शुरू की है। इस कड़ी में उन्होंने विश्व के जानेमाने अर्थशास्त्री और भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन से आधे घंटे की बातचीत की जिसे विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर लाइव स्ट्रीम किया गया।

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अगर लॉकडाउन नहीं होता तो क्या ऋषि कपूर आज ज़िंदा होते? उनकी ट्विटर टाइमलाइन कुछ कहती है…

जनता कर्फ्यू से लेकर रामनवमी के बीच गुजरे 10 दिन के लॉकडाउन में हम देखते हैं कि काफी तेज़ी से ऋषि कपूर की मानसिक स्थिति बदल रही है। एक जद्दोजेहद दिखलायी देती है, विचार प्रक्रिया अस्पष्ट है और सबके कल्याण के लिए वे बंदिशाें को और मज़बूत करने के हक में भी हैें।

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नग़ीब माहफूज़ की कहानी “आधा दिन”

कायरो, मिस्र में 1911 में जन्मे नग़ीब माहफूज़ ने 17 वर्ष की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था. उनका पहला नाविल 1939 में शाया हुआ और 1952 में मिस्र की क्रांति से पहले उनकी लिखी दस और किताबें शाया हो चुकी थीं

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