विनीत तिवारी को फिलिस्तीन पर पुस्तक लेखन फेलोशिप का प्रलेस ने किया स्वागत


अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) ने पुणे के प्रतिष्ठित संस्थान शंकर ब्रह्मे समाज विज्ञान ग्रंथालय द्वारा आयोजित रिसर्च एवं बुक-राइटिंग फेलोशिप इस वर्ष विनीत तिवारी को प्रदान किए जाने का स्वागत किया है। विनीत तिवारी प्रलेस से सम्बद्ध लेखक, कवि और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। इस फेलोशिप के तहत वे फिलिस्तीन के समकालीन विषयों पर एक विस्तृत शोधपरक पुस्तक का लेखन करेंगे।

यह फेलोशिप अगस्त 2026 से शुरू होकर तीन महीने की अवधि के लिए होगी। फेलोशिप के अंतर्गत लिखी जाने वाली पुस्तक को ग्रंथालय द्वारा हिंदी, अंग्रेजी और मराठी में प्रकाशित किया जाएगा।



ग्रंथालय द्वारा जारी आधिकारिक पत्र में विनीत तिवारी के योगदान की सराहना करते हुए कहा गया है, एक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था के प्रति आपकी अटूट प्रतिबद्धता ने फिलिस्तीन पर सार्वजनिक विमर्श को समृद्ध करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। आपके कार्यों ने भारत के समकालीन लेखकों और कार्यकर्ताओं को गहराई से प्रेरित किया है।”

मूल रूप से शिवपुरी (मध्य प्रदेश) के रहने वाले और वर्तमान में दिल्ली व इंदौर को आधार बनाकर कार्य करने वाले विनीत तिवारी पिछले तीन दशकों से जन आंदोलनों और मानवाधिकारों के मुद्दों पर और दो दशकों से देश में फिलिस्तीन एकजुटता अभियान में लगातार सक्रिय हैं। पेशे से सिविल इंजीनियर रह चुके विनीत तिवारी ने बाद में पत्रकारिता, कविता और नाट्य-लेखन को अपना माध्यम बनाया। वे इंदौर स्थित संदर्भ केन्द्र के संस्थापक सदस्य हैं और फिलहाल दिल्ली के ‘जोशी-अधिकारी इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज’ से संबद्ध हैं।

वे ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ और अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन (एप्सो) के राष्ट्रीय सचिव मण्डल के सदस्य भी हैं। वे ‘इंडो-फिलिस्तीन सॉलिडैरिटी नेटवर्क’ से केन्द्रीय स्तर पर जुड़े हैं और भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की राष्ट्रीय कोर टीम के सदस्य हैं। विनीत तिवारी ने नवंबर 2025 में फिलिस्तीन के वेस्ट बैंक क्षेत्र का जमीनी दौरा भी किया था।


Fellowship

पुणे  स्थित ‘शंकर ब्रह्मे समाज विज्ञान ग्रंथालय’ देश का एक अत्यंत प्रतिष्ठित और प्रगतिशील संस्थान है। इसकी स्थापना देश के विख्यात प्रगतिशील विचारक और वास्तुकार (आर्किटेक्ट) शंकर ब्रह्मे की स्मृति में की गई थी, जिन्होंने पुणे विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक डिज़ाइन तैयार किया था। वर्ष 1969 में उनके असामयिक निधन के बाद, उनकी पत्नी और प्रख्यात मार्क्सवादी अर्थशास्त्री डॉ. सुलभा ब्रह्मे ने इस वैचारिक व शोध संस्थान की नींव रखी थी। यह संस्थान केवल एक पुस्तकालय तक सीमित न रहकर जनसरोकारों, मानवाधिकारों और सामाजिक चेतना के मुद्दों पर लगातार व्याख्यानों का आयोजन, शोध दस्तावेजों का प्रकाशन और जागरूकता अभियान चलाता है। संस्थान अब तक परमाणु ऊर्जा, कश्मीर, गुजरात, सांप्रदायिकता, युद्ध और साम्राज्यवाद जैसे गंभीर विषयों पर 70 से अधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित कर चुका है।


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About जनपथ

जनपथ हिंदी जगत के शुरुआती ब्लॉगों में है जिसे 2006 में शुरू किया गया था। शुरुआत में निजी ब्लॉग के रूप में इसकी शक्ल थी, जिसे बाद में चुनिंदा लेखों, ख़बरों, संस्मरणों और साक्षात्कारों तक विस्तृत किया गया। अपने दस साल इस ब्लॉग ने 2016 में पूरे किए, लेकिन संयोग से कुछ तकनीकी दिक्कत के चलते इसके डोमेन का नवीनीकरण नहीं हो सका। जनपथ को मौजूदा पता दोबारा 2019 में मिला, जिसके बाद कुछ समानधर्मा लेखकों और पत्रकारों के सुझाव से इसे एक वेबसाइट में तब्दील करने की दिशा में प्रयास किया गया। इसके पीछे सोच वही रही जो बरसों पहले ब्लॉग शुरू करते वक्त थी, कि स्वतंत्र रूप से लिखने वालों के लिए अखबारों में स्पेस कम हो रही है। ऐसी सूरत में जनपथ की कोशिश है कि वैचारिक टिप्पणियों, संस्मरणों, विश्लेषणों, अनूदित लेखों और साक्षात्कारों के माध्यम से एक दबावमुक्त सामुदायिक मंच का निर्माण किया जाए जहां किसी के छपने पर, कुछ भी छपने पर, पाबंदी न हो। शर्त बस एक हैः जो भी छपे, वह जन-हित में हो। व्यापक जन-सरोकारों से प्रेरित हो। व्यावसायिक लालसा से मुक्त हो क्योंकि जनपथ विशुद्ध अव्यावसायिक मंच है और कहीं किसी भी रूप में किसी संस्थान के तौर पर पंजीकृत नहीं है।

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