मनरेगा केवल रोजगार उपलब्ध कराने वाला कानून नहीं था। यह ग्रामीण भारत में रहने वाली महिलाओं के जीवन में आजादी और आत्मसम्मान लेकर आया। हमारे जैसे लोग, जो जमीनी स्तर पर महिलाओं के साथ काम करते हैं, उनके लिए मनरेगा किसी वरदान से कम नहीं रहा। मनरेगा से जुड़ी महिलाओं को संगठित करना अपेक्षाकृत आसान था क्योंकि इस कानून ने उन्हें न केवल काम दिया, बल्कि सार्वजनिक जीवन में खड़े होने का हौसला भी दिया।
मनरेगा कानून आने से पहले, खासकर उन इलाक़ों में जहां मनरेगा मज़दूर यूनियन काम करता है, महिलाओं का घर से बाहर निकलना आसान नहीं था। बैंक जाना, ब्लॉक या जिला कार्यालय तक पहुँचना, यह सब लगभग असंभव जैसा था। मनरेगा ने महिलाओं को घर से निकलना सिखाया। महिलाएं बैंक तक पहुँचीं, ब्लॉक और जिला कार्यालयों में जाकर अपनी बात रख सकीं। जरूरत पड़ने पर काम के दिनों की संख्या बढ़ाने और मजदूरी दर बढ़ाने की मांग को लेकर राज्य और केंद्र सरकार तक अपनी आवाज़ पहुँचा सकीं।
शुरुआती दौर में मनरेगा ने पलायन को भी रोका, लेकिन जैसा अक्सर सरकारी योजनाओं के साथ होता है वही हाल धीरे-धीरे मनरेगा का भी किया गया। रोज-रोज के तकनीकी बदलावों, ऑनलाइन प्रक्रियाओं और प्रशासनिक अड़चनों के कारण लोगों को काम मिलने में दिक्कतें बढ़ती गईं। नतीजा यह हुआ कि लोग मनरेगा से धीरे-धीरे दूर होने लगे।

हमें वह दौर भी याद रखना चाहिए जब कोरोना संकट के समय लोगों को घरों में बैठने के लिए मजबूर कर दिया गया था। उस समय मनरेगा ने न केवल लोगों को काम दिया, बल्कि उनके परिवारों का सहारा भी बना। लोग यह समझकर काम मांगते थे कि मनरेगा एक कानून है। काम नहीं मिला, तो बेरोजगारी भत्ते की मांग करते थे। पहली बार लोगों को यह अहसास हुआ था कि सरकार उनकी बात मानने के लिए बाध्य है।
इससे पहले यही लोग जब किसी काम से ब्लॉक कार्यालय जाते थे, तो कर्मचारी उनसे ढंग से बात तक नहीं करते थे, लेकिन मनरेगा से जुड़ी महिलाएं जब जाती थीं तो वही कर्मचारी उनसे सम्मान से बात करने को मजबूर होते थे क्योंकि उनके हाथ में कानून था और उस कानून से जुड़ा संगठन खड़ा था। मनरेगा के तहत काम मिलने से महिलाओं के हाथ में पैसा आया जिसे उन्होंने स्थानीय बाजारों में अपनी जरूरतों के लिए खर्च किया। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था भी मजबूत हुई।
यह कानून 2005 में जब संसद से पास हुआ और 2006 में पहले 200 जिलों में, फिर 2008 में पूरे देश में लागू हुआ, उसके बाद आम चुनाव हुए और यूपीए दूसरी बार सत्ता में आई। इसका सीधा अर्थ यह था कि लोगों ने मनरेगा से मिलने वाले रोजगार को देखकर सरकार चुनी। इसके बाद से आज तक हम देखते हैं कि किस तरह पार्टियां चुनाव जीतने के लिए लोगों को बरगलाती रही हैं, लेकिन मनरेगा जैसे ठोस कानूनों को धीरे-धीरे कमजोर करती चली गईं।
यह कहना ग़लत होगा कि मनरेगा में खामियां नहीं थीं, लेकिन इन्हीं खामियों ने हम जैसे संगठनों को खड़ा होने का अवसर दिया। शुरुआत में जॉब कार्ड बनवाना ही एक संघर्ष था। कर्मचारियों का मानना था कि अगर सबका जॉब कार्ड बन गया तो काम कैसे देंगे। अपने लोगों का कार्ड बन जाता था, बाकी लोगों को रोज चक्कर लगवाए जाते थे। जॉब कार्ड बनने के बाद काम के लिए महीनों इंतजार। लोगों को यह भी नहीं पता था कि मनरेगा में काम मांगने पर ही काम मिलता है। किसी तरह काम मिल भी गया, तो मजदूरी मिलने में समस्या। काम के दौरान रोजगार सहायक द्वारा जरूरत से ज़्यादा काम करवाना- इन तमाम शिकायतों ने संगठनों को मज़बूत करने में बड़ी भूमिका निभाई।
मुझे याद है, एक बार दिवाली के समय मजदूरों की मजदूरी उनके खाते में नहीं आई। मनरेगा मजदूर यूनियन ने “घेरा डालो, डेरा डालो” के तहत तीन दिनों तक ब्लॉक कार्यालय का घेराव किया। उसके बाद मजदूरों की मजदूरी तुरंत खातों में डाली गई। संगठन की ताक़त के बल पर हमने दर्जनों बार ब्लॉक की तालाबंदी कर मजदूरों के लिए काम और मजदूरी हासिल की।
मनरेगा में सामाजिक अंकेक्षण का प्रावधान भी था, जो स्थानीय हाथों में था। शुरू में जब सोशल ऑडिट होता था तो कर्मचारी डरते थे, लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था कमजोर होती गई और मनरेगा, जो लोगों के लिए खुशियां लेकर आया था, उसे भी भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया गया। फिर भी लोगों ने यह सीख लिया था कि सरकार से कैसे, किस मुद्दे पर और किस तरह लड़ना है। इसलिए लोग बार-बार अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहे हैं और आगे भी उठाते रहेंगे।
मनरेगा कानून के खत्म होने से निश्चित रूप से मजदूरों के काम के अधिकार की गारंटी समाप्त हो गई है, लेकिन एक जन संगठन के रूप में हम मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहेंगे। मनरेगा भी मजदूरों को उनका पूरा हक दिलाने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया था, लेकिन मजदूरों को यह समझ आ गया है कि संगठित होकर आवाज उठाने से ही उनकी बात सुनी जाएगी। हमें भरोसा है कि अब संगठन की जिम्मेदारी और बढ़ गई है, जिसे हमारे युवा साथी पूरी गंभीरता के साथ निभाएंगे।
नए श्रम क़ानून हों या यह नया रोजगार क़ानून- दोनों ही पूँजीपतियों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए लाए गए हैं। मनरेगा रहने के कारण मजदूर लगातार मजदूरी बढ़ाने की मांग कर रहे थे। कई इलाकों में साल के सौ दिन का काम भी मिल जाता था, जिससे पलायन कम होता था। इससे कंपनियों को सस्ते मजदूर मिलने में परेशानी हो रही थी। इसलिए सरकार ने लोगों के हाथ से काम के अधिकार को ही छीन लिया। अब लोग मजबूरी में कंपनियों की ओर जाएंगे, जहां उन्हें औने-पौने दामों पर रखा जाएगा और वे मालिकों की शर्तों पर काम करने को मजबूर होंगे।
इन क़ानूनों के बाद मजदूरों का सरकार से विश्वास टूटना स्वाभाविक है। यही टूटा हुआ विश्वास आने वाले समय में एक बड़े मजदूर आंदोलन में बदलेगा- हमें इस पर पूरा भरोसा है।
(सुरेश राठौर, मनरेगा मजदूर यूनियन, वाराणसी से सम्बद्ध हैं)

