चला गया चौरंगी का रखवाला: स्मृतिशेष मणिशंकर मुखर्जी
आज जब उनके जाने की खबर फैल रही है, तो शाहजहां होटल की छवि मन में लौटती है। गलियारे शायद थोड़े धुंधले हैं। मेज़ पर घंटी रखी है। लिफ्ट अब भी चल रही है। पात्र अब भी बहस कर रहे हैं। यही साहित्य का विरोधाभास है। सर्जक चला जाता है, सृजन रह जाता है।
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