देखने के तरीके: जॉन बर्जर की प्रसिद्ध किताब को पढ़ते हुए

पुस्तक हमें चित्रकला के संदर्भ में बताती है कि विशेषाधिकार संपन्न एक अल्पसंख्यक तबक़ा (एलीट क्‍लास) अतीत की कला के रहस्यीकरण का इस्तेमाल अंततः वर्तमान में प्रभुत्वशाली वर्ग की भूमिका को न्यायोचित सिद्ध करने के लिए करता है।

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पुस्तक समीक्षा: गौहर रज़ा की ‘मिथकों से विज्ञान तक’ को पढ़ते हुए

स्कूल के स्तर तक तो हम सब लोग अनिवार्य रूप से विज्ञान की पढ़ाई करते हैं लेकिन विज्ञान का वह ज्ञान हमारे जीवन और बुद्धि-विवेक का सहज हिस्सा क्यों नहीं बन पाता? उन सिद्धांतों को पढ़ने और जानने के बाद भी हम अपने रूढ़िवादी और परंपरा से प्राप्त विचारों को ही जीवन में क्यों ढोते रहते हैं?

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पुस्तक चर्चा: बदलती भू-राजनीति में रूस-अमेरिका के बीच मध्य एशिया पुल है या खाई? 

पुस्तक का परिचय देते हुए लेखक और जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. अजय पटनायक ने कहा कि पुस्तक का पहला संस्करण 2016 में आया था, परंतु इस भौगोलिक क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों के मद्देनजर दूसरे संस्करण को लाने की आवश्यकता महसूस हुई। उन्होंने कहा कि ये देश प्रारंभ में राष्ट्रवादी उत्साह के कारण पश्चिमी देशों और अमेरिका की ओर आकर्षित हुए थे, जिसका इस्तेमाल रूस के विरुद्ध किया गया।

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‘कोचिंग जाने वाले बच्‍चे’ उर्फ बिहार से दिल्‍ली तक बिखरी अनसुनी आवाजें, सपने और संघर्ष

राजधानी एक्सप्रेस वाया उम्मीदपुर हाल्ट   उन लाखों युवाओं की स्मृतियों का दस्तावेज है जो अपने भविष्य के लिए वर्तमान को गिरवी रख चुके हैं। यह उपन्यास हमें बताता है कि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी सिर्फ एक शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक संघर्ष भी है।

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अन्नदाता, जागो और देखो, हल की जगह चलाये जा रहे हैं बुल्डोजर!

प्रेम ही आदमी को कवि बनाता है। कवि की ज़रूरत इसलिए होती है कि जब हवाओं में घृणा भरी हो, वह प्रेम का संगीत बाँटता है। वह सुंदरता से प्रेम करना सिखाता है और बताता है, क्या सुंदर है, क्या नहीं।

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हिन्दू पुनर्जागरण से अधूरे नवजागरण तक भारतीय चित्रकला के राजनीतिक सफर की कहानी

भारतीय चित्रकला का सच’ एक ऐसी पुस्तक है जो समाजशास्त्रीय नजरिये से लिखी गयी है और जिसमें एकेडमिक्स के लटकों झटकों से दूर एक ऐसे कलाकार की दृष्टि का परिचय मिलता है जो भारत जैसे वर्ग विभाजित समाज में उत्पीड़ित बहुमत के साथ खड़ा है।

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‘सीने में फांस की तरह’ फंसी कविताएं

कवि के सीने की फाँस है सेलेब्रिटी बनाम सामान्य मनुष्य। वह कहते हैं- सराहना में/खो जाते सामान्यजन स्वतः/अपने आप। लगभग सभी कविताओं में कवि ऐसे ही विचलित होता है और मानवता के पक्ष में अपनी आवाज उठाता है। ‘आदिवासी’ कविता में निमाड़, मालवा के आदिवासियों का संघर्ष, उनकी बेबसी, उनके दुख, गरीबी और पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है। ‘मिथ’ बड़े पृष्ठभूमि की कविता है जिसमें कवि ने अन्तर्विरोधों को रेखांकित किया है।

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पुस्तक समीक्षा: भारत का संविधान – महत्वपूर्ण तथ्य और तर्क

यह किताब संविधान की पृष्ठभूमि और इसके निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए हिंदी में एक जरूरी दस्तावेज की तरह हैं जो महत्वपूर्ण तथ्यों के साथ-साथ संविधान के वजूद में आने के तर्कों को बहुत ही सटीकता के साथ प्रस्तुत करती है।

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धर्मनिरपेक्षता के संघर्ष में सरदार पटेल को सही नजरिये से समझने की कोशिश

, जब हम सेकुलरिज्म को पश्चिमी अवधारणा से देखते हैं जिसमें धर्म और राजनीति एक दूसरे से पर्याप्त दूरी बरतते हैं, तभी हमें सरदार हिंदुत्ववादी रुझान वाले दिखते हैं। किताब के परिचय में नानी पालखीवाला ने इस धारणा के लिए स्पष्ट तौर पर समाजवादियों जैसे जेपी, वामपंथियों के साथ ही आज़ाद को भी को ज़िम्मेदार ठहराया है।

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जीवन में संविधान: रोजमर्रा की कहानियों में संवैधानिक मूल्यों को आत्मसात करने की कोशिश

इस किताब में 76 लघु कहानियां हैं। ये महज कहानियां नहीं हैं बल्कि किसी न किसी के साथ हुई सच्ची घटनाएं हैं जिन्‍हें कहानी के माध्यम से किताब में बयां किया गया है। लेखक ने इन सभी घटनाओं को बहुत ही सरल भाषा में कहानी में ढाला है। इन कहानियों के जीवंत पात्र बच्चे हैं, महिलाएं हैं, किशोर/किशोरियां हैं, युवा हैं, बुजुर्ग हैं, दलित हैं, आदिवासी है, गरीब हैं, वंचित तबकों से हैं।

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