अख़बारनामा: वैश्वीकरण के दौर में भारतीय पत्रकारिता का एक जायज़ा

आज जो साम्प्रदायिकता का ज़हर हमारे समाज की जड़ों में गहरे तक उतरता जा रहा है तो यह केवल आज घटित हो गई कोई परिघटना नहीं है। इसकी भूमिका तभी से बननी शुरू हो गई थी जब उदारीकरण की नीतियों के माध्यम से हमारा देश अमेरिकी साम्राज्यवाद के जाल में फंसने लगा था। इस बारे में आलोक श्रीवास्तव जी की यह पुस्तक आंखें खोलने वाली है।

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सूली पर बिजूका और टोह लेते कव्वे: किसान आंदोलन के नाम बिना शीर्षक का एक इन्स्टालेशन

बिना शीर्षक की यह अद्भुत रचना खेती-किसानी पर कारपोरेटी हमले का दृश्यांकन है जो दर्शकों को दुख और सदमे से गुज़ारते हुए आक्रोश की ओर ले जाती है। इसकी परिकल्पना जन संस्कृति के पैरोकार और अनूठे कला गुरू प्रोफ़ेसर धर्मेंद्र कुमार ने की है।

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हिन्दी अखबारों में ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ का संविधान-विरोधी और किसान-विरोधी चेहरा

आज के संपादकीय, संपादकीय पेज (यह हिन्दी का पहला अखबार है जहां इसके मालिक संजय गुप्ता संपादक की हैसियत से हर रविवार को कॉलम लिखते हैं) और ऑप-एड पेज ‘विमर्श’ पर छपे लेखों को देखें। वहां से जातिवाद की दुर्गंध भभका मारकर बाहर निकल रही है।

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लोकप्रिय आध्यात्मिकता की आड़ में पूंजी, सियासत और जाति-अपराधों के विमर्श का ‘आश्रम’

आश्रम सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह सिखाती है कि धर्म को केवल एक पहलू से समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। वो भी भारतीय समाज में तो और नहीं, जिसका आधार ही धार्मिक मान्यताओं पर टिका हो।

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भाषणों के आईने में लालू प्रसाद यादव

लेखक और संपादक अरुण नारायण ने सदन में दिये गये लालू प्रसाद के भाषणों का एक प्रतिनिधि संकलन निकाला है। इनकी इस प्रकाशित किताब का नाम ‘सदन में लालू प्रसाद: प्रतिनिधि भाषण’ है। यह किताब दिल्ली के ‘द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन’ ने प्रकाशित की है। अरुण नारायण ने इस किताब के भीतर लालू प्रसाद के भाषणों को बड़ी सूझ-बूझ और बौद्धिकता के साथ सात खण्डों में संपादित किया है।

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सिनेमाई संघर्ष में औरत की जिंदगी का मुरब्बा खराब क्यों हो जाता है?

पिछले कुछ वर्षों में रीलिज हुई पुरुषों की बायोपिक पान सिंह तोमर, भाग मिल्खा भाग और एम एस धोनी : द अनटोल्ड स्टोरी आदि को देखने हुए समझ में आया कि पुरुष बायोपिक में जहां पराक्रमपूर्ण दृश्यों की भरमार होती है और इससे फिल्म भरी-भरी लगती है वहीं स्त्रियों की बायोपिक में चमत्कार रचने की प्रवृत्ति फिल्म को पटरी से ही उतार देती है। बचता क्या है?

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शिमला डायरी: पीछे छूट गई धूल को समेट लाया कौन खानाबदोश

यह किताब की सिर्फ एक समीक्षा नहीं है, बल्कि उस काल खंड की पत्रकारिता व चंडीगढ़-हिमाचल की साहित्यिक-सांस्कृतिक दुनिया का एक संक्षिप्त, रोचक संस्मरण भी है।

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Listen To Her: रोज़ाना अनसुनी रह जाती हुई चीखें

यह फिल्म जैसे हमारे समय के अंधेरे चेहरे पर आईने की रोशनी भर दिखाती है, लेकिन उस क्षणिक रोशनी में एक त्रासद, कंडीशंड और तकलीफ़ों से भरी दुनिया हठात हमारे सामने दिख जाती है जिसके कई आयाम और समानान्तर कथाएं हैं।

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‘गुंजन सक्सेना…’ हमें अहसास कराती है कि भारतीय परिवारों को कैसे पिताओं की ज़रूरत है

क्या होता अगर फिल्में बचपन से ही हमारे जीवन का अहम हिस्सा होतीं? यहां फिल्मों का मतलब अच्छे सिनेमा से है।

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सत्ता और जरायम की समकालीन दुरभिसंधियों के बीच दो अतिकथनों पर खड़ा ‘पाताल लोक’

मूल वस्तु, बड़े स्टार्स, कंटेन्ट, निवेश आदि से निर्मित किए गए इस अतिकथन को हिन्दी के बड़े कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन ‘अज्ञेय’ की एक बहुत छोटी सी कविता की सामयिक व्याख्या से समझा जा सकता है। अज्ञेय की मूल कविता है- “साँप/तुम सभ्य तो हुए नहीं/ नगरों में बसना/ तुम्हें नहीं आया/ एक बात पूछूं/ ये डसना कहाँ से सीखा/ ये विष कहाँ से पाया?”

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