रामनवमी: मानवीय सभ्यता में करुणा और नैतिकता के आवाहन का पर्व


रामनवमी को केवल पंचांग की एक तिथि के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके साथ हमारे जीवन में करुणा, मर्यादा और न्याय की एक स्थायी स्मृति जुड़ी हुई है, जो समय-समय पर अपना अर्थ उद्घाटित करती रहती है। राम का जन्म भी केवल अवतार-कथा तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मनुष्य के भीतर आत्मानुशासन, विवेक और उत्तरदायित्व के भाव को स्थापित करता है। इस संदर्भ में तुलसी की पंक्ति ‘भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी’ एक साधारण काव्य-पंक्ति नहीं रह जाती क्योंकि इसमें वह विश्वास व्यक्त होता है जिसके सहारे एक समाज अपने नैतिक आदर्श को जन्म लेते हुए देखता है।

राम सत्ता के बल पर अपने लिए स्थान नहीं बनाते। वे लोक की संवेदना में धीरे-धीरे जगह बनाते हैं और वहीं टिके रहते हैं। इसलिए उन्हें समझना शासक और समाज के बीच बनने वाले उस नैतिक संबंध को समझना भी है। वे मंदिरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि लोकगीतों, स्मृतियों और संकट के समय उभरने वाले विश्वास में उपस्थित हैं। जब वे युद्ध करते हैं तब भी मर्यादा का त्याग नहीं करते क्योंकि उनके लिए शक्ति से पहले उसकी सीमा का बोध आवश्यक है।

इसीलिए रामनवमी केवल उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि एक ऐसे स्मरण में बदल जाती है जो यह भरोसा दिला सके कि जब समाज दिशाहीन हो जाए और सत्ता नैतिकता से दूर, तब भी लोकचेतना में नई शुरुआत की संभावना बनी रहेगी।


राम को पूजने के लिए आपको खुद पुरुषोत्तम होना होगा अर्थात अज्ञान से निकलना होगा…


जब महात्मा गांधी ने रामराज्य की बात की, तो उनका आशय किसी धार्मिक राज्य से नहीं था। वे एक ऐसे नैतिक और राजनीतिक आदर्श की बात कर रहे थे जहां शासन का केंद्र आम आदमी हो। वहां न किसी प्रतीक का वर्चस्व था, न शक्ति का प्रदर्शन; सबसे महत्वपूर्ण था समाज के अंतिम व्यक्ति का हित।

गांधी के लिए रामराज्य का अर्थ था न्याय, पारदर्शिता और करुणा। राज्य का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाना है। सत्ता सेवा का माध्यम बने, यही इस विचार का मूल है।

राममनोहर लोहिया ने भी राम को सामाजिक न्याय के संदर्भ में समझा। उनके अनुसार, रामराज्य तभी संभव है जब समाज में जाति, लिंग और वर्ग के आधार पर भेदभाव समाप्त हो। वे इस बात पर जोर देते हैं कि राम का नाम लेना तभी सार्थक है जब हम शंबूक और सीता के साथ जुड़े कठिन प्रश्नों से मुंह न मोड़ें।


जाति और रसूख के हिसाब से न्याय और मुआवजे का ‘राम राज्य’!


राम के चरित्र में एक आदर्श शासक के साथ एक संवेदनशील नागरिक भी दिखाई देता है। वे प्रजा से दूर नहीं रहते, बल्कि उनके दुख-सुख में शामिल होते हैं। सीता को वन भेजने का उनका निर्णय आज भी विवादित है, पर यह एक शासक के भीतर चल रहे नैतिक द्वंद्व को भी सामने लाता है।

शबरी का प्रसंग सामाजिक समावेश का संकेत है। निषादराज के साथ राम का संवाद दिखाता है कि सम्मान जाति या स्थिति से नहीं, संबंध से आता है। हनुमान की उपस्थिति बताती है कि क्षमता और समर्पण किसी वर्ग की बपौती नहीं होते। इन प्रसंगों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि राम किसी एक समुदाय के नहीं हैं। वे उन सभी के हैं, जो विश्वास, प्रेम और न्याय में आस्था रखते हैं।

आज जब लोकतंत्र केवल बहुमत तक सीमित हो चुका है, राम के माध्‍यम से गांधी और लोहिया की व्‍याख्‍याएं हमें याद दिलाती हैं कि सत्ता का असली अर्थ जिम्मेदारी है, न कि अधिकार।

राम अयोध्या के हैं, पर मिथिला भी उन्हें अपना मानती है। इसी कारण राम दोनों के हैं। राम और सीता का मिलन अयोध्या और मिथिला के बीच संबंध का आधार है। राम जब मिथिला आते हैं तो वे एक अतिथि के रूप में आते हैं फिर धीरे-धीरे लोगों के अपने हो जाते हैं।

मिथिला के लोकजीवन में राम को दामाद के रूप में भी देखा जाता है। उनके प्रति सम्मान है, पर दूरी नहीं है। लोगों के मन में उनके लिए अपनापन है। वे बाहर से आए हुए नहीं लगते। वे घर के सदस्य हो जाते हैं। सीता इस संबंध को और गहरा बनाती हैं। वे मिथिला के संस्कार अपने साथ लेकर अयोध्या जाती हैं। इससे राम का संबंध मिथिला से बना रहता है। यह संबंध समय के साथ और स्थिर होता जाता है।

मिथिला में राम को उनके व्यवहार से पहचाना जाता है। वे शांत हैं, संयमित हैं और सभी के प्रति सम्मान रखते हैं। धनुष-भंग उनका पराक्रम दिखाता है, पर लोगों के मन में जगह उनका स्वभाव बनाता है। इस कारण उन्हें केवल विजेता के रूप में नहीं, बल्कि योग्य और विश्वसनीय व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है।



ऐसे में सीता और राम का संबंध दो व्यक्तियों का संबंध नहीं रह जाता, वह दो परंपराओं और दो जीवन-पद्धतियों का मिलन बन जाता है। इस संगम में अयोध्या की मर्यादा और मिथिला की सरलता एक साथ दिखाई देती है। इस मिलन में किसी प्रकार का संघर्ष नहीं है। यह सहज स्वीकार का संबंध है।

राम और सीता का संबंध केवल प्रेमकथा नहीं है; यह उस तनाव का भी चित्रण है जो सत्ता और संवेदना के बीच उत्पन्न होता है। आज जब स्त्रियां अपने अधिकार और सम्मान के लिए संघर्ष कर रही हैं, सीता की कथा प्रेम में समानता और सम्मान दोनों की अनिवार्य उपस्थिति का एक वैचारिक आधार प्रदान करती है।

सीता की कथा भारतीय समाज में स्त्री के स्थान और उसकी गरिमा का प्रश्न है। उनकी पीड़ा और अनुभव उन असंख्य स्त्रियों के अनुभव से जुड़ते हैं जिन्हें बार-बार अपने अस्तित्व को सिद्ध करना पड़ता है। अग्निपरीक्षा और वनवास जैसी घटनाएं उस सामाजिक संरचना को जाहिर करती हैं जहां स्त्री के चरित्र पर संदेह सहज माना जाता है। यह त्रासदी एक व्यापक सामाजिक मानसिकता का प्रतिबिंब है।

सीता का मौन यहां बहुत अर्थवान हो जाता है। उन्होंने प्रत्यक्ष विद्रोह नहीं किया, पर उनके निर्णय एक गहरे प्रतिरोध को व्यक्त करते हैं। अंततः पृथ्वी में समा जाना उस स्त्री का प्रतीक है जो अपमान और संदेह के साथ जीने के बजाय आत्मसम्मान को चुनती है।


सीता जिस दिन कोई कदम उठाएगी, सारे सच एक झटके में अप्रासंगिक हो जाएंगे…

सीता की अनकही व्यथा और शापित अयोध्या का अधूरा प्रायश्चित


अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना है, लेकिन एक बड़ा प्रश्न यह है कि क्या राम हमारे विचारों और व्यवहार में बचे हैं?

राम के जीवन में राजनीति और नैतिकता का एक संतुलित संबंध दिखाई देता है। उन्होंने युद्ध किया, पर युद्ध उनकी पहली नहीं अंतिम भाषा थी। रावण का वध केवल विजय नहीं, बल्कि एक नैतिक निर्णय था। युद्ध के बाद लंका पर अधिकार न करना और उसे विभीषण को सौंप देना स्पष्ट करता है कि सत्ता उनके लिए अधिकार नहीं, दायित्व है।

राम का वनवास त्याग का प्रसंग भर नहीं है; यह नेतृत्व के आत्मशोध की प्रक्रिया है। एक राजकुमार का स्वेच्छा से वन में जाना केवल कर्तव्यपालन नहीं, बल्कि अपने भीतर के विस्तार का प्रयास भी है। वनवास के दौरान वे समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़ते हैं। वे शबरी के प्रेम को स्वीकार करते हैं, निषादराज के साथ बैठते हैं, और हनुमान व सुग्रीव से मित्रता करते हैं। यह बताता है कि नेतृत्व का अर्थ दूरी बनाना नहीं, बल्कि लोगों के साथ खड़ा होना है।


रामत्व की तलाश में नैतिक पतन को अभिशप्त नायक: मिथिला और रूस के लोक से दो छवियाँ


आज की राजनीति में अक्सर संवाद की जगह विवाद ले लेता है और विनम्रता की जगह दिखावा; ऐसे समय में राम का उदाहरण यह स्मरण कराता है कि राजनीति का उद्देश्य केवल जीत नहीं, बल्कि समाज का कल्याण होना चाहिए। आज जब नेतृत्व अक्सर छवि और प्रचार तक सीमित हो चुका है, तब राम का प्रसंग हमें याद दिलाता है कि सच्चा नेता वही है जो समाज की वास्तविकताओं को समझे।

केवल राम मंदिर बना देने से, राम को केवल प्रतीक बना देने से, उनका अर्थ सीमित हो जाता है। उनका वास्तविक महत्त्व तब सामने आएगा है जब उनके आदर्श समाज के व्यवहार में दिखाई दें। जब न्याय केवल शब्द न रह जाए, जब स्त्री की गरिमा सुरक्षित हो, और जब कमजोर भयमुक्त जीवन जी सके, तभी कहा जा सकता है कि राम हमारे बीच हैं।

आज भारत तकनीकी और आर्थिक प्रगति की नई ऊंचाइयों को छू रहा है, पर यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या केवल भौतिक विकास पर्याप्त है। किसी भी समाज की स्थिरता उसके नैतिक आधार पर निर्भर करती है। यहीं राम की प्रासंगिकता सामने आती है।

राम हमें सिखाते हैं कि विजय मर्यादा से मिलती है, नेतृत्व समर्पण से आता है और समाज विश्वास तथा न्याय से बनता है। आज के समय में जब नैतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संकट एक साथ उपस्थित हैं, तब राम का स्मरण हमारी नैतिक आवश्यकता है।

राम अतीत की कथा भर नहीं, भविष्य की कसौटी हैं। उनका हमारे बीच लौटना समाज के भीतर उस चेतना की जागृति‍ का संकेत होगा जहां न्याय, करुणा और मर्यादा फिर से जीवन का आधार बनते हैं।


(आशुतोष कुमार ठाकुर मैनेजमेंट प्रोफेशनल, साहित्यिक आलोचक और क्यूरेटर हैं। उनके लेख देश के प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित होते रहे हैं। आवरण तस्वीर AI निर्मित है।)

सच्ची रामायण और हिंदी का कुनबावाद: संदर्भ ललई सिंह यादव


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