MNREGA का अंत: एक कानून नहीं, एक नई चेतना पर वार!


बिहार के एक ग्रामीण इलाके में कुछ युवा सामूहिक रूप से पढ़ रहे हैं। किताब का नाम है-  उपभोक्तावादी संस्कृति का जाल! वे उपभोग और उपभोक्तावाद के अंतर को समझ रहे हैं। समाजवादी कार्यकर्ता और चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा द्वारा लिखी इस पुस्तिका को पढ़ते नौजवान गहरी बहस में हैं। कौन हैं ये युवा? पहली पीढ़ी के पढ़े-लिखे दलित-बहुजन युवक-युवतियों की किसी टोली का साथ बैठकर ऐसी पुस्तिका को पढ़ना और फिर उस पर चर्चा करना एक असामान्य दृश्य है। यह टोली यहाँ तक कैसे पहुँची?

इस टोली के माता-पिता जब अपनी पंचायत में काम के अभाव से 2008 में ग्रस्त थे, तब इनका संपर्क जन जागरण शक्ति संगठन (जे.जे.एस.एस.) के कार्यकर्ताओं से हुआ, जिन्होंने इन्हें रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के तहत काम माँगने के लिए प्रेरित किया। यहाँ से शुरू हुआ एक सिलसिला, जिसमें इन मजदूर साथियों ने काम के अपने अधिकार को हासिल करने के लिए सामूहिक संघर्ष किए –  अमूमन अपनी ही पंचायत के बिचौलियों और भ्रष्टाचारियों से भिड़े, कभी अपने मुखिया (सरपंच) से लड़े, कभी ब्लॉक पर धरना-प्रदर्शन किया और कभी पटना-दिल्ली में बड़ी-बड़ी रैलियों में शामिल हुए।

अपने संघर्षों से उत्साहित मजदूरों ने सिर्फ़ नरेगा पर ही दखल नहीं दिया, बल्कि इन्होंने संघर्षों के कई द्वार खोले। कहीं राशन, पेंशन, आंगनबाड़ी में मिलने वाली सुविधाओं पर आवाज उठाई, कहीं जातिगत हिंसा को लेकर इकट्ठा हुए, तो कहीं बसोबास की ज़मीन के लिए स्थानीय जमींदारों से भिड़ गए। इन सामूहिक संघर्षों के साथ-साथ एक नई सामाजिक और राजनीतिक चेतना का विकास हुआ। नरेगा में काम करने वाले मजदूर साथी जो संगठन में आते-जाते थे, उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाने के प्रयास बढ़ाए। उन्हें युवा शिविरों और कार्यक्रमों में भेजा। एक तरफ इन मजदूर साथियों में खुद एक नई चेतना का विकास हो रहा था, दूसरी तरफ वे अपने बच्चों को भी एक नया मौका दे रहे थे।



हमने मनरेगा पर यह लेख इस किस्से से इसलिए शुरू किया कि आम तौर पर मनरेगा के खात्मे को लोग मजदूरों की जीविका के अधिकार तक सीमित रख रहे हैं, पर इस क़ानून ने एक नई सामाजिक-राजनीतिक चेतना के विकास के लिए नए दरवाजे खोले थे। ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों के लिए पहली बार एक साथ इतने बड़े पैमाने पर आने का मौका मिला था। इस मौके ने उन्हें संगठित होने का अवसर दिया। असंगठित क्षेत्र में आने के चलते इन्होंने कभी स्थायी काम या स्थायी “मालिक” का अनुभव नहीं किया था। इनमें कई महिला मजदूर भी थीं, जिन्हें सचमुच पहली बार खेत के बाहर कोई काम मिला था। अब पंचायत में ही काम का मौका मिला, जहाँ इन्हें सरकारी मशीनरी और अपने ही चुने हुए प्रतिनिधियों से काम लेना था।

इन्हीं मजदूरों ने देश के सुदूर इलाकों में मजदूर संगठनों का निर्माण किया या उन्हें ताकत दी। जे.जे.एस.एस. जैसे कई संगठनों को इससे बल मिला और वहाँ एक नई सामाजिक-राजनीतिक चेतना का विकास हुआ। आप पाठक अपने आप में असाधारण हैं, गंभीर चिंतन और सामाजिक बदलाव में कार्यरत संगठनकर्ता हैं। ऐसे में यह समझना कि मनरेगा की समाप्ति एक नई चेतना के विकास पर हमला है, और भी जरूरी हो जाता है। इसलिए लेख का शुरुआती किस्सा और भी प्रासंगिक हो जाता है।

हाल में केंद्र सरकार ने मनरेगा कानून को वापस ले लिया और VB-ग्राम-जी नाम का एक नया कानून ला दिया। हर रोज हिंदी दैनिक अखबार इस नए कानून की तारीफ के पुलिंदे बाँध रहे हैं। आइए जानें कि इस कानून की हकीकत क्या है।

18–19 दिसंबर 2025 को VB-GRAM-G (विकसित भारत – Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin) Act)) को लोकसभा में पारित कर मनरेगा क़ानून को वापस ले लिया गया। शुरू में सबको लगा कि यह केवल नाम बदलने की कवायद है- एक ऐसी रस्म जिसमें नाम तो बदलता है, पर जगह और चीजें पहले जैसी ही रहती हैं, और जिसकी हमें आदत-सी पड़ गई है। अब तो मुग़लसराय याद करना पड़ता है, धीरे-धीरे DDU ही जुबान पर चढ़ गया है।

ऐसे में नरेगा संघर्ष मोर्चा की सामूहिक समझ और हमारे जमीनी अनुभव से यही समझ में आता है कि इस बार सिर्फ नाम नहीं बदला गया, बल्कि पूरे कानून के बुनियादी स्वरूप को ही बदल दिया गया।

हक नहीं, अब सरकार का ‘रहम’: मनरेगा की मूल भावना है कि मजदूर अपनी जरूरत के हिसाब से काम माँगेंगे और उन्हें साल में कम से कम 100 दिन का काम सरकार देगी। मनरेगा कानून की आत्मा में “काम का अधिकार” है। इस भावना को कुचलते हुए नए कानून में केंद्र सरकार को यह अधिकार दे दिया गया है कि वह हर राज्य के लिए एक बजट तय करेगी। इससे केंद्र सरकार को राज्यों को दी जाने वाली राशि की मात्रा मनमाने ढंग से तय करने का अधिकार मिल गया है, और इसी के आधार पर यह तय होगा कि किसी राज्य में कितने दिनों का रोजगार दिया जा सकता है। यह मनरेगा की मूल सोच को पूरी तरह पलट देता है, जहाँ राशि आवंटन मजदूरों की माँग के अनुसार होता था, और उसकी जगह एक ऐसी आपूर्ति-आधारित व्यवस्था ले आता है, जिसमें रोजगार की माँग को पहले से तय बजट के अनुसार ढलना पड़ेगा।

राज्यों पर 40 प्रतिशत वित्तीय बोझ डालना: मनरेगा के तहत मजदूरी का 100% और सामग्री लागत का 75% वहन करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की होती है। व्यवहार में इसका अर्थ है कि केंद्र और राज्यों के बीच खर्च का अनुपात लगभग 90:10 रहता है। अब ज़्यादातर राज्यों को हर 100 रुपये के ख़र्च में 40 रुपये देने पड़ेंगे। यह प्रावधान न केवल राज्यों पर भारी वित्तीय बोझ डालता है, बल्कि गरीब राज्यों और उन राज्यों पर भी असमान रूप से असर डालता है जहाँ से बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए पलायन करते हैं और जिन्हें ग्रामीण रोजगार की सबसे अधिक जरूरत है। बढ़े हुए वित्तीय बोझ के कारण राज्य सरकारें खर्च कम करने की नीति अपनाने पर मजबूर होंगी और मजदूरों की काम की माँग को दर्ज ही नहीं करेंगी।

60 दिनों तक काम बंद रखने का प्रावधान- जीवन के अधिकार का उल्लंघन: नए कानून के मुताबिक अब एक साल में 60 दिनों तक काम बंद/स्थगित रहेगा। यह ग़रीबों के जीवन एवं आजीविका के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है। बेरोजगारी, महँगाई और ग्रामीण संकट के समय में इस तरह का प्रावधान योजना के मूल उद्देश्य को निष्प्रभावी कर देगा तथा लाखों परिवारों को भुखमरी की ओर धकेलने वाला सिद्ध होगा।

किसे रोजगार दिया जाएगा, यह तय करना- मजदूरी की गारंटी के ख़िलाफ़: मनरेगा काम का एक कानूनी अधिकार स्थापित करता है, जो माँग-आधारित और सार्वभौमिक है – “जिस भी व्यक्ति को काम की आवश्यकता है, उसे माँग के आधार पर रोजगार उपलब्ध कराना।” नए क़ानून में केंद्र सरकार उन क्षेत्रों का चयन करेगी जहाँ इस क़ानून के तहत काम दिया जाएगा। यह भेदभावपूर्ण है तथा संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 16 के विरुद्ध है। यह केंद्र को अत्यधिक शक्ति भी प्रदान करता है। रोज़गार का अधिकार आवश्यकता के आधार पर होना चाहिए, न कि प्रशासनिक या राजनीतिक चयन के आधार पर।

ठेकेदारी को बढ़ावा: मनरेगा में ठेकेदारों और बड़ी मशीनों पर पूरी तरह से रोक लगी थी, पर नए ग्राम-जी कानून में कानून के भीतर ही ठेकेदारों को जगह दे दी गई है, जिससे बड़े पैमाने पर ठेकेदारी पर काम होने की संभावना बढ़ गई है। काम को पीएम गति शक्ति के तहत बड़ी योजनाओं की ओर मोड़ा जा रहा है, जिससे ठेकेदारों और पूँजीपतियों को फ़ायदा होगा।

ग्राम पंचायत की स्वतंत्रता और शक्ति को कमजोर करना: मनरेगा कानून में ग्राम पंचायत को बहुत अधिकार दिए गए हैं। कौन-सा काम होगा, यह ग्राम सभा द्वारा तय किया जाता है और उसी के अनुसार काम होता है। नए कानून में ग्राम सभा द्वारा पारित कार्य ग्रामीण इंफ़्रास्ट्रक्चर स्टैक में शामिल किया जाएगा और उसी स्टैक के हिसाब से काम खोले जाएँगे। इस स्टैक में अन्य विभागों का भी दख़ल होगा, जिससे कौन-सा काम किया जाए उसकी स्वतंत्रता ग्राम पंचायत की नहीं रहेगी। राज्य सरकार तय करेगी कि कौन-से 60 दिन काम बंद होंगे, न कि ग्राम पंचायत। इस तरह ग्राम पंचायत के अधिकारों को सीमित किया गया है।



मनरेगा को हटा कर यह नया कानून वही सरकार लाई है जिसके शीर्ष नेता श्री नरेन्द्र मोदी ने दस साल पहले (वर्ष 2015) लोकसभा में अपने भाषण में कहा था- “मैं लगातार यह चर्चा सुनता रहता हूँ कि सरकार मनरेगा को खत्म करने की योजना बना रही है, या पहले ही ऐसा कर चुकी है। मेरी राजनीतिक समझ मुझसे कहती है कि मनरेगा को कभी ख़त्म मत करो क्योंकि मनरेगा आपकी असफलताओं का जीवंत स्मारक है। और मैं गाजे-बाजे के साथ इसका ढोल पीटता रहूँगा। मनरेगा रहेगा, आन-बान-शान से रहेगा और गाजे-बाजे के साथ दुनिया को बताया जाएगा।”

फिर मोदी जी को किस मजबूरी या किस दबाव में यह बदलाव लाना पड़ा? क्या वे भूल गए कि उन्होंने दस साल पहले क्या कहा था? या फिर जिन कॉर्पोरेट घरानों से उनकी नज़दीकियाँ हैं, उनके लिए अब इस तरह के ‘काम के अधिकार’ की बात स्वीकार्य नहीं रही- क्योंकि इसमें उनके मुनाफे का कोई इजाफा नहीं होता? उन्हें तो चाहिए सस्ते दर पर मजदूर!

कारण जो भी हो, एक जनपक्षीय क़ानून को हटाने के पीछे सरकार की जन-विरोधी मंशा साफ़ दिखाई देती है। जो आज मनरेगा के साथ हुआ है, वह हमने पहले भी देखा है- जब इस सरकार ने CAA लाया, किसान-संबंधित क़ानून लाए और अब चार लेबर कोड लाए, हर बार सरकार को कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा है, और इस बार भी जन-संघर्ष जारी है। अब देखना यह है कि क्या लोकतंत्र पर विजय होगी या तंत्र लोगों (आम जन) को अपनी सत्ता की ताकत से रौंद डालेगा।


लेखकद्वय जन जागरण शक्ति संगठन, बिहार से सम्बद्ध हैं


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