दो बरस बाद बेतलहेम में क्रिसमस : नया साल, नये सपने, उम्मीद और हौसले के नाम!


मैं नास्तिक हूँ लेकिन त्यौहारों की ख़ुशी कम करने वाला नहीं हूँ। वैसे तो नास्तिक का अर्थ होता है – वेदनिंदको नास्तिकः। वेद की निंदा करने वाला नास्तिक होता है, लेकिन प्रचलन में अर्थ यह है कि जो ईश्वर को नहीं मानता वह नास्तिक होता है।

लोग सोचते हैं कि नास्तिकों के कोई त्योहार और पर्व नहीं होते। यह गलत है। देश की आजादी से लेकर अनेक दिवसों- मजदूर दिवस, महिला दिवस, बाल दिवस, शिक्षक दिवस आदि- को नास्तिक लोग पर्व की तरह मना सकते हैं। वे जिस दिन खुश हों, हर उस दिन को एक पर्व की तरह मना सकते हैं। उसके लिए उन्हें किसी पौराणिक कहानी या धार्मिक आडंबर की जरूरत नहीं होती।

मैं यह भी नहीं जानता कि कोई ईसा मसीह वाकई थे भी या नहीं। अगर थे भी तो क्या वे 25 दिसम्बर 0000 को पैदा हुए थे या किसी और दिन! मुझे इस अँग्रेजी कैलेण्डर को मानने में भी सैद्धांतिक ऐतराज है जो उपनिवेशवाद की थोपी गईं अनेक अन्य बातों की ही तरह थोपा गया है और वैज्ञानिक तौर पर भी खरा नहीं है। इसके बनिस्बत भारतीय पंचांग ज्‍यादा वैज्ञानिक और सही हैं। यह जानकर तो और भी आश्चर्य होता है कि इसमें जूलियस सीजर ने अपने नाम पर एक महीना रखने की जिद की थी कि इसमें 31 दिन होने चाहिए। आखिर वह सीजर था, लेकिन उसके बाद जो रोमन साम्राज्य का बादशाह बना वह ऑगस्टस भला अपने आपको इतिहास में सीजर से कम कैसे दर्ज होने देता? इसलिए उसने अपने नाम पर रखे गए महीने अगस्त में भी 31 दिन करवा दिए।

फरवरी बेचारी का कोई नहीं था, सो उसके हिस्से से एक-एक करके दो दिन हटा दिए गए और उसे 28 का कर दिया। दुख और आश्चर्य तो यह कि हम लोग सारी दुनिया में इसे मानते क्यों आ रहे हैं? सोचिए, इतना अवैज्ञानिक कैलेंडर केवल इसलिए दुनिया पर थोप दिया गया क्योंकि वह साम्राज्य ने बनाया था। उम्मीद है कि आने वाले वक्‍त में यह मनुष्य समाज अधिक वैज्ञानिक सोच-समझ के साथ अधिक मानवीय बनेगा। 



जो काम करने से बेवजह या नाजायज वजह से रोका जाए, उसे मानना एक तरह की गुलामी होती है जिसे एक जिंदा तर्कशील इंसान स्वीकार नहीं कर सकता। इसलिए अगर मैं बांग्लादेश में या पाकिस्तान में होता और मुझे दिवाली या होली मनाने से रोका जाता तो भले ही मैं अपने मन से यह त्यौहार यूँ ही नहीं मनाता, लेकिन जबरदस्ती रोका जाता तो ज़रूर मनाता। और इसके लिए लड़ता। जाहिर है कि पिटता, लेकिन लड़ता।

ठीक वैसे ही, यह नया साल वाकई नया है या नहीं यह अलग बात है; क्रिसमस को ईसा मसीह पैदा हुए थे या नहीं यह सब अलग बात है; लेकिन इस समाज में, हमारे देश में, कुछ लोग जिनके हाथ में सत्ता का डंडा आ गया है और दिमाग पर ताकत का नशा जिनकी सहृदयता और तार्किकता को ढाँप चुका है, वे ग्रेगोरियन कैलेंडर का नया साल मनाना रोक दें यह ठीक नहीं। वे सबसे जबरदस्ती गुड़ी पड़वा मनवाएं, यह गलत है। वे लोगों को क्रिसमस न मनाने दें और ख़ुद लाउडस्पीकर लगाकर कभी गणेशोत्सव, कभी नवरात्रि और कभी कोई और त्यौहार मनाएं, यह ठीक बात नहीं है।

पिछले दिनों कुछ नजदीक के साथी, आशिमा रॉयचौधुरी, कॉमरेड अमरीक सिंह, कॉमरेड जनार्दन, नहीं रहे। अकस्मात् ही। उनके जाने का दुख है, लेकिन यह जीवन है। दुख की कोई तुलना नहीं होती, लेकिन त्रिपुरा के युवा एंजेल की देहरादून में हुई हत्या से बहुत दुख हुआ।

अपने से भिन्न जो है, उसके लिए उत्सुकता और स्वागत न होकर घृणा और अपने बेहतर होने का भाव बहुत गलत है। ऐसा तो असभ्यों में भी नहीं होता है। यह बहुत गलत दिशा है समाज की। लेकिन नये जीवन आए भी दुनिया में। उनका स्वागत है। उनसे उम्मीद है बेहतर की।



व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए शायद यह पहला नया बरस है और पहली क्रिसमस है जब मैं बहुत खुश हूँ। इसकी वजह है फ़लस्तीन से आया एक ईमेल जिसमें बेतेलहेम (जहां ईसा मसीह का जन्मस्थान बताया जाता है) की एक दोस्त ने एक वीडियो भेजा है और साथ ही बताया है कि दो साल से ग़ज़ा में हो रहे नरसंहार के चलते बेतेलहेम में और सारे फ़लस्तीन में क्रिसमस नहीं मनाया गया था। इस बार बेतेलहेम में क्रिसमस ट्री सजाई गई और क्रिसमस मनायी गई।

बेतेलहेम में बमुश्किल 10 फ़ीसदी आबादी ईसाई है लेकिन क्रिसमस वहां सभी मनाते हैं। उनकी खुशी को देखकर बहुत अच्छा लगा। क़त्लेआम बंद हो, इज़रायल और नेतन्याहू को सजा मिले। फ़लस्तीन आजाद हो। भारत में हर तरह की संकीर्णता खत्म हो।

लगता है कुछ ज़्यादा ही मांग रहा हूं नये साल से, लेकिन मुझे लगता है कि यह तो न्यूनतम है और इतना तो अब से बहुत पहले मिल जाना चाहिए था।


(विनीत तिवारी प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव हैं और इंडिया-पैलेस्टाइन सॉलिडैरिटी नेटवर्क से जुड़े हैं। वे एक माह पहले वेस्ट बैंक, फ़लस्तीन के दस दिवसीय प्रवास से लौटे हैं।)


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