MNREGA का अंत: एक कानून नहीं, एक नई चेतना पर वार!

हाल में केंद्र सरकार ने मनरेगा कानून को वापस ले लिया और VB-ग्राम-जी नाम का एक नया कानून ला दिया। हर रोज हिंदी दैनिक अखबार इस नए कानून की तारीफ के पुलिंदे बाँध रहे हैं। आइए जानें कि इस कानून की हकीकत क्या है।

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मनरेगा से कमजोर लोगों को मिले राजनीतिक अनुभव की सीख आसानी से मिटने वाली नहीं है

आज जब इस क़ानून को कमज़ोर किया जा रहा है या ख़त्म किया जा रहा है, तो सिर्फ़ रोज़गार नहीं छीना जा रहा। वह पूरा राजनीतिक अनुभव, वह आत्मविश्वास, वह सामूहिक ताक़त भी छीनी जा रही है। लेकिन यह भी सच है कि इस प्रक्रिया में लोगों ने यह सीख लिया है कि संगठित होकर बोलना ही रास्ता है। यह सीख आसानी से मिटने वाली नहीं है।

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मनरेगा: रोजगार से कहीं ज्यादा, आजादी का एक अनुभव

इन क़ानूनों के बाद मजदूरों का सरकार से विश्वास टूटना स्वाभाविक है। यही टूटा हुआ विश्वास आने वाले समय में एक बड़े मजदूर आंदोलन में बदलेगा- हमें इस पर पूरा भरोसा है।

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दो बरस बाद बेतलहेम में क्रिसमस : नया साल, नये सपने, उम्मीद और हौसले के नाम!

व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए शायद यह पहला नया बरस है और पहली क्रिसमस है जब मैं बहुत खुश हूँ। इसकी वजह है फ़लस्तीन से आया एक ईमेल जिसमें बेतेलहेम की एक दोस्त ने एक वीडियो भेजा है और साथ ही बताया है कि दो साल से ग़ज़ा में हो रहे नरसंहार के चलते बेतेलहेम में और सारे फ़लस्तीन में क्रिसमस नहीं मनाया गया था। इस बार बेतेलहेम में क्रिसमस ट्री सजाई गई और क्रिसमस मनायी गई।

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SIR, सामाजिक न्याय और भारतीय गणतंत्र का भविष्य: चुनौतियों का विश्लेषण

जो समूह आज देश में प्रभावी है, उसका मुख्य उद्देश्य जनता को अलग-थलग करना और सभी संभावित धन (खनिज धन, भूमि पूंजी और अवसर) पर कब्जा करना है, जो भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती है।

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समाज में फैल रहे असहिष्णुता के ज़हर को कैसे रोकें? विरोधी विचारों का सह-अस्तित्व कैसे कायम हो?

सदियों से इस धरती पर – जिसे हम आज भारत कहते हैं – परस्पर विरोधी विचारों, मान्यताओं और दर्शनों का सहअस्तित्व था, उनके बीच गर्मजोशी से बहसें हुआ करती थीं और ये तमाम बहसें किन्हीं स्वीकार्य तौर-तरीकों के तहत की जाती थीं। मतलब, दूसरे पक्ष की बात को सुनना, उसके खण्डन के लिए तर्क देना और फिर अपनी बात रखना … यह बेहत सख़्ती से लेकिन खुद की और प्रतिपक्षी की गरिमा को बनाए रखते हुए किया जाता था।

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दीपोत्सव 2025: ‘रिकॉर्ड’ बनाने की प्रवृत्ति UP में विकास की प्राथमिकताओं को कहीं पीछे न छोड़ दे!

सरकार की प्राथमिकताएँ अभी भी यूपी को आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र बनाने की है और इसीलिए महाकुंभ और दीपोत्सव जैसे कार्यक्रम को यूपी की पहचान बनाने की कोशिश सरकार करती है। इससे क्या यूपी का कोई उज्ज्वल भविष्य हो सकता है?

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CJI पर जूते का जश्न: लोग अब किस मुंह से इंसाफ मांगेंगे और न्याय व्यवस्था पर विश्वास करेंगे?

किसी देश के लिए कितनी शर्म की बात है कि देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश के ऊपर जूता फेंका जा रहा है और लाखों लोग इसका जश्न मना रहे हैं। ये सोचने की बात है कि ऐसे लोग फिर किस मुँह से न्याय माँगेंगे और किस हक से न्याय व्यवस्था पर विश्वास करेंगे?

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केदारनाथ यात्रा: धूल, धुएं, बाजार, बुलडोजर और कारोबार का दर्शन

भारत या दुनिया के किसी भी पर्यटन स्थल की ख़ूबसूरती उसकी मौलिकता में होती है। वो जैसे हैं वैसे ही बने रहें। जब हर जगह बाज़ार घुसेगा, हर खूबसूरत जगह का बाज़ारीकरण होगा तो कितने दिन बचे रह पाएँगे ये नदी-पहाड़, ये झील-झरने, ये समंदर और उसकी मौलिकता।

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नीली जींस में नस्‍ली श्रेष्‍ठता के अवशेष

यूजेनिक्स की सूक्ष्म छाया अभी भी टिकी हुई है। मीडिया और विज्ञापनों में ‘सुंदर, शुद्ध, आकर्षक’ गुणों को अभी भी “अच्छे जनुक” के रूप में दिखाया जाता है। यूजेनिक्स आज नकार दी गई है, फिर भी उसके नीचे भेदभाव की जड़ें अभी भी समाज में हैं। ‘गुड जींस’ ये आज सहज बोले जाने वाले शब्द हैं लेकिन उनके पीछे यूजेनिक्स के भयंकर वारिसे का इतिहास है।

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