लोकतंत्र की अंतिम क्रिया अभी बाकी है!

हम सभी एक सामूहिक, राष्ट्रव्यापी मदहोशी के शिकार हो गए थे. किस चीज़ का नशा कर रहे थे हम? हम तक एनसीबी का परवाना क्यों नहीं पहुंचा? सिर्फ बॉलीवुड के लोगों को ही क्यों बुलाया जा रहा है? कानून की नज़र में हम सभी बराबर हैं कि नहीं?

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बहुजन समाज के आईने में COVID-19 से बनती दुनिया और कार्यभारों का एक अध्ययन

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और विश्व असमानता डेटाबेस, पेरिस के सह-निदेशक थॉमस पिकेटी का अनुमान है कि 2020 की यह कोविड-19 महामारी दुनिया के अनेक देशों में बड़े परिवर्तनों का वाहक बनेगी। मुक्त-व्यापार और बाजार की गतिविधियों पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाये जाने संबंधी विमर्श को चुनौती मिलेगी और इनकी गतिविधियों में हस्तक्षेप करने की मांग समाज से उठेगी।

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COVID-19: सांख्यिकी, विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना पर एक जिरह

कोविड से होने वाली मौतों से संबंधित आधिकारिक आँकड़े किस क़दर झूठे और भ्रामक हैं, इसके प्रमाण अन्य अध्ययनों में भी सामने आ रहे हैं। हाल ही में ब्रिटेन ने स्वीकार किया है कि उसके आँकड़े अतिशयोक्तिपूर्ण थे। आँकड़ा जमा करने की ग़लत पद्धति के कारण उन लोगों की मौत को भी कोविड से हुई मौत में जोड़ दिया गया जिनकी मौत की मुख्य वजह कुछ और ही थी।

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जाँच से ‘समझौता’: 2007 के समझौता एक्सप्रेस धमाके में NIA की भूमिका पर PUDR की रिपोर्ट

समझौता ब्‍लास्‍ट केस पर पीपुल्‍स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (PUDR) नेे एक लंबी तथ्‍यात्‍मक रिपोर्ट निकाली थी। हिंदू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद की नींव रखने वाले इस धमाके और फिर उसे धता बता देने वाली जांच को समझने के लिए इस रिपोर्ट को पढ़ा जाना चाहिए।

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भारत छोड़ो आंदोलन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सैद्धांतिक असहमतियाँ क्या थीं?

सावरकर गांधी जी की अहिंसक रणनीति से इस हद तक असहमत थे कि गांधी जी की आलोचना करते करते कई बार वे अमर्यादित लगने वाली भाषा का प्रयोग करने लगते थे। सावरकर की पुस्तक गांधी गोंधल पूर्ण रूप से गांधी की कटु आलोचना को समर्पित है।

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बाबरी मस्जिद, राम मंदिर और हिन्दी समाज: आनंद स्‍वरूप वर्मा से लंबी बातचीत

जहां तक बौद्धिक तबके की प्रतिक्रिया का सवाल है, मस्जिद गिराए जाने के 15 दिनों के अंदर ही दिल्ली से 80 कवियों, कथाकारों, रंगकर्मियों और विभिन्न क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक टीम लखनऊ पहुंच गई जहां उसने एक विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया।

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“बाबरी के बाद प्रगतिशील लोगों ने कश्मीर को मुस्लिम बहुसंख्यक का मुद्दा समझ कर गलती कर दी”!

कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने की पहली बरसी पर फिल्मकार संजय काक से जितेंद्र कुमार की बातचीत

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आदर्शों का लोप: राष्‍ट्रीय आंदोलन के दौरान भारत के भविष्‍य की परिकल्‍पना: संदर्भ नेहरू और गांधी

एक औद्योगीकृत देश के रूप में भारत के संवैधानिक उभार व विकास की अंग्रणी राष्‍ट्रवादियों द्वारा सराहना को गांधीजी पूर्णत: खारिज करते थे। उनका उद्घोष था कि ”बिना अंग्रेज़ों के अंग्रेज़ी शासन” की कोई जगह ही नहीं थी।

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शहर से दूर जाते हुए शहर के भीतर आना… जैसे खुद को पाना! वकील लेन से जंतर-मंतर की सुरंग में…

सुरंग पार करके जब आप बाहर निकलते हैं तो खुद को एक कम्पाउंड में पाते हैं, जहां बड़े-बड़े पेड़ों और बहुत सी वनस्पति के झुरमुट के बीच चंद रिहाइशी मकान बने हैं. वहां दाखिल होते ही एक पल को आपको लगता है मानो सुंदरबन सरीखे वर्षावन के बीच बसा कोई गाँव हो. अपने आस-पास का नज़ारा देख कर जब आप विस्मय में धीरे-धीरे अपनी पलकें झपका रहे होते हैं तो खुद को जैसे किसी जलडमरूमध्य में पाते हैं.

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रफ़्तार: पिता दिवस पर एक लघुकथा

ट्रेन अपनी गति पकड़ चुकी थी। अब तक मुझे अपनी सीट नहीं मिल पायी थी। जो सीट मेरे लिए मुकर्रिर थी वो दूसरे कोच में थी। स्टेशन पर जब तक गाड़ी खड़ी रही मैं अपनी उसी सीट पर बैठा था। कुछ देर बाद एक बूढ़ा दंपत्ति मेरे पास आया…

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