आर्टिकल 19: मीडिया निगल गया वरना दिल्ली के दंगे पर कोर्ट की टिप्पणी आज राष्ट्रीय शर्म होती


दिल्ली हिंसा की तस्वीरें याद होंगी आपको, जब फरवरी के महीने में पूर्वी दिल्ली के इलाकों में दहशतगर्द दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे दुकानें लूट रहे थे, घरों में आग लगा रहे थे, निहत्थे लोगों, औरतों व बच्चों को निशाना बना रहे थे और भारतीय जनता पार्टी के नेता उन्हें उकसा रहे थे। कपिल मिश्रा को तो बीजेपी सरकार ने इंसानियत को रौंदने के एवज में बाकायदा पुरस्कृत किया और सुरक्षा दी। दिल्ली चुनाव के दौरान मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए नरेंद्र मोदी के मंत्री “देश के गद्दारों को गोली मारो…” जैसे नारे लगवा रहे थे। बीजेपी के एक नेता ने मस्जिदें गिराने और बलात्कार की दहशत कायम करने की कोशिश की और दिल्ली पुलिस पूरे इत्मीनान के साथ बेहयाई का बाइस्कोप देख रही थी।

आप पूछ सकते हैं कि अक्टूबर के महीने में फरवरी की बात करने का मकसद क्या है? दरअसल, नागरिक समूहों, मानवाधिकार संगठनों और राजनीतिक दलों ने दिल्ली हिंसा में पुलिस की भूमिका को लेकर जो सवाल उठाए थे, उस पर अदालत ने मुहर लगा दी है। दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने फरवरी की हिंसा को लेकर एक ऐसी टिप्पणी की है जिस पर दिल्ली की पुलिस को, केंद्रीय गृह मंत्रालय को और मोदी सरकार को शर्मिंदा होना चाहिए। अदालत ने कहा:

यह सामान्य जानकारी है कि 24 फरवरी 2020 के दिन उत्तर पूर्वी दिल्ली के कई हिस्से सांप्रदायिक उन्माद की चपेट में आ गये। इसने विभाजन के दिनों में हुए नरसंहार की याद दिला दी। यह हिंसा जल्द ही जंगल की आग की तरह राजधानी के नये भागों में फैल गयी और अधिक से अधिक निर्दोष लोग इसकी चपेट में आ गये।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने इससे निपटने में दिल्ली पुलिस की काहिली और निकम्मेपन पर टिप्पणी करते हुए कहा: “दिल्ली हिंसा 2020 एक प्रमुख वैश्विक शक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाले राष्ट्र की अंतरात्मा पर एक घाव है।” इतना ही नहीं, जज ने यहां तक कहा कि “दिल्ली में हुई यह हिंसा 1947 के भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद सबसे भयानक सांप्रदायिक हिंसा थी।” अदालत ने कहा कि “इतने कम समय में इतने बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाना पूर्व-नियोजित साजिश के बिना संभव नहीं है।” कौन थे वो साजिशकर्ता और कौन थे उनके आका? यह बताने में दिल्ली पुलिस का दिल बैठ जाता है। वह इधर-उधर की बात करने लगती है। इसकी वजह हम भी जानते हैं और आप भी।

अब देखिए टीवी और अखबारों का घिनौना खेल। इस पूरी टिप्पणी को मीडिया ने गोल कर दिया। टीवी ने तो सरासर कोर्ट की इतनी सख्त टिप्पणी के पूरे संदर्भ को ही गोल कर दिया। उसने इसमें से सिर्फ मसालेदार हिस्से को उठा लिया। हर जगह खबर ये छपी कि कड़कड़डूमा कोर्ट ने पार्षद ताहिर हुसैन के तीन मामलों में जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि ताहिर हुसैन का घर दंगाइयों का अड्डा बन गया था। उनके ऊपर सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के लिए कथित तौर पर अपने राजनीतिक दबदबे का दुरुपयोग करने का आरोप है। मतलब मीडिया ने पूरी टिप्पणी में से शातिराना तरीके से सिर्फ उतना हिस्सा उठाया जिससे दिल्ली हिंसा के लिए मुसलमानों के जिम्मेदार होने की धारणा बनायी जा सके और ऐसा लगे कि बहुसंख्यकों ने जो किया वह सिर्फ आत्मरक्षा में की गई पवित्र किस्म की हिंसा, लूट और आगजनी थी।

दिल्ली हिंसा को लेकर अलग-अलग संगठनों, समितियों और खुद राजनीतिक दलों ने दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाये थे। संसद में इस पर कई दिनों तक हंगामा भी हुआ था, लेकिन जिन लोगों ने भी इस तरह की स्वतंत्र जांच प्रक्रिया में हिस्सा लिया उन्हें दिल्ली पुलिस ने अलग-अलग तरीके से निशाना बनाया- चाहे वो प्रशांत भूषण हों या योगेंद्र यादव या फिर पत्रकार या छात्र-नौजवान। एमनेस्टी इंडिया ने हाल ही में दिल्ली हिंसा में दिल्ली पुलिस और भारतीय जनता पार्टी की भूमिका को लेकर एक लंबी रिपोर्ट सार्वजनिक की थी। उसने इस रिपोर्ट को बाकायदा कार्रवाई का अनुरोध करते हुए अमित शाह के गृह मंत्रालय को भेजा था। मोदी सरकार ने संदिग्धों पर तो कार्रवाई नहीं की, लेकिन एमनेस्टी इंडिया पर ताला जरूर लगवा दिया। एमनेस्टी को भारत से अपना कामकाज समेटना पड़ा। दिल्ली पुलिस ने उसे मनगढ़ंत बताया था।

अब अदालत की टिप्पणी बता रही है कि एमनेस्टी इंडिया की रिपोर्ट भी हालात की भयावहता को बयान करने में असमर्थ थी। 50 दंगा पीड़ितों, चश्मदीद गवाहों, वकीलों, डॉक्टरों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पूर्व पुलिस अफसरों से बातचीत और सोशल मीडिया पर डाले गए वीडियो के विश्लेषण के बाद एमनेस्टी इंडिया ने कहा था कि दिल्ली पुलिस दंगाइयों की कठपुतली की तरह काम कर रही थी और हत्यारों-हमलावरों को पुलिस की सरपरस्ती हासिल थी। लोग पुलिस की मदद के लिए फोन करते रहे, लेकिन मदद नहीं पहुंची। कई अफसर खुद दंगाइयों के साथ हिंसा में शामिल थे। इतना ही नहीं, दिल्ली पुलिस ने हिरासत में कैदियों को प्रताड़ित किया, सीएए के खिलाफ बैठे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के विरोध-स्थलों को तोड़ा, प्रदर्शनकारियों पर जुल्म ढाए और दंगाइयों की हिंसा को चुपचाप देखती रही।

ये है उस दिल्ली पुलिस का सांप्रदायिक और आपराधिक चेहरा जिसके बारे में गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में खड़े होकर कहा था कि दिल्ली हिंसा को रोकने के लिए उसने त्वरित और शानदार काम किया है। एमनेस्टी इंडिया ने कहा है कि ये ‘शानदार’ काम था दंगाइयों के इशारे पर दिल्ली पुलिस का नाचना। पूरे विपक्ष ने दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए थे लेकिन आठ महीने बाद भी दिल्ली पुलिस की भूमिका की कोई जांच नहीं हुई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की इस रिपोर्ट में बाकायदा भारतीय जनता पार्टी का नाम आया था। इस रिपोर्ट में बीजेपी नेता कपिल मिश्रा और दूसरे नेताओं के भड़काऊ भाषणों, जामिया मिलिया की लाइब्रेरी और हॉस्टल में पुलिस के हमलों और इसके बाद भड़की हिंसा को रोकने में दिल्ली पुलिस की काहिली का विस्तार से जिक्र है।

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ऐसे ही अदालत ने दिल्ली हिंसा को विभाजन के बाद की सबसे भयावह हिंसा नहीं कहा है। एमनेस्टी की रिपोर्ट कहती है कि हिंसा के पीड़ितों को इलाज से रोका गया। पीड़ितों और हिरासत में लिए गए लोगों को यातना दी गयी और उनके साथ मनमानी की गयी। गौर कीजिएगा ये दंगाइयों ने नहीं, दिल्ली पुलिस ने किया जैसा कि दर्ज है। रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा है कि नागरिकता कानून का विरोध कर रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर जुल्म ढाने और डराये–धमकाये जाने का एक साफ़ पैटर्न सामने है।

ये बात एमनेस्टी इंडिया ने तुक्के में नहीं कही थी। उसने सोशल मीडिया पर डाले गए वीडियोज़ में मानवाधिकार उल्लंघनों के सबूतों की विश्वसनीयता की पुष्टि करने के लिए विश्वविख्यात क्राइसिस एविडेंस लैब की मदद ली थी। ये लैब अत्याधुनिक, ओपन–सोर्स और डिजिटल जांच उपकरणों के ज़रिये, गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों का विश्लेषण और उनकी पुष्टि करने का काम करती है। क्राइसिस एविडेंस लैब ने वीडियो के समय, तारीख और स्थान की पुष्टि करके इन वीडियो को प्रमाणित किया है। एमनेस्टी इंडिया की टीम ने उन जगहों का दौरा भी किया है जहां ये वीडियो रिकॉर्ड किये गये थे। टीम ने वहां मौजूद चश्मदीद गवाहों और पीड़ितों से भी बात की है।

दिल्ली दंगों की जांच को लेकर दिल्ली पुलिस की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाइए कि खुलेआम डीसीपी के सामने खड़े होकर हिंसा भड़काने वाला कपिल मिश्रा के हाथ में हथकड़ी डालने की बजाय वो उसे हाथ जोड़कर सलाम कर रही है। उसे हिफाजत दे रही है। आप जानते ही होंगे कि पूछताछ के लिए दिल्ली पुलिस ने जो सम्मन भेजा था उसे कपिल मिश्रा ने कूड़ेदान में फेंक दिया है। पुलिस ने बहुत मुलायम धाराओं में उसे जमानती मामलों में सम्मन भेजा था क्योंकि बीजेपी का पानी उठाकर वो पुण्यात्मा हो गया है। तो अदालत क्या कहती है, नियम क्या कहते हैं और नैतिकता क्या कहती है, ये सारे सवाल अब सिर्फ पाखंड की तरह लगते हैं और हत्या, लूट, आगजनी जैसी घटनाएं राजनीति के सदाचार में बदल चुकी है। बात सुनने में बुरी लगती है, लेकिन दिल पर हाथ रखकर सोचिएगा आखिरी बार जिंदगी में आपको अच्छा क्या लगा था?



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