यह महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है… अश्रु स्वेद रक्त से, लथपथ लथपथ…

क्या हमें भी उन टीवी चैनलों सा संवेदनहीन हो जाना चाहिए जो जलती चिताओं के दृश्य दिखाते-दिखाते अचानक रोमांच से चीख उठते हैं- ‘’प्रधानमंत्री की चुनावी सभा शुरू हो चुकी है, आइए सीधे बंगाल चलते हैं।‘’

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आज अपने चारों ओर बुने जा रहे झूठ से कैसे लड़ते भगत सिंह?

ब्रिटिश साम्राज्यवाद तो भगत सिंह को न डरा पाया न हरा पाया किन्तु वैज्ञानिकता की बुनियाद पर टिके आधुनिक भारत के निर्माण की भगत सिंह की संकल्पना से एकदम विपरीत एक अतार्किक, अराजक और धर्मांध भारत बनाने कोशिशों का मुकाबला वे किस तरह करते इसकी तो कल्पना ही की जा सकती है।

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बढ़ता हुआ एकाधिकार लोकतांत्रिक सुधार नहीं, सत्ता के वर्चस्व को स्थायी बनाने का नुस्खा है!

वी डेम की रिपोर्ट में भारत पिछले वर्ष की तुलना में सात स्थानों की गिरावट के साथ कुल 180 देशों में 97वें स्थान पर है। ‘’ऑटोक्रेटाइजेशन टर्न्स वायरल’’ शीर्षक रिपोर्ट में यह संस्थान भारत को थर्ड वेव ऑफ ऑटोक्रेटाइजेशन के अंतर्गत आने वाले देशों में शामिल करता है।

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चुनावों में हस्तक्षेप का निर्णय कर के किसान नेताओं ने कहीं कोई खतरा तो नहीं मोल लिया है?

कहीं किसान नेता अपने आंदोलन को परिणाममूलक बनाने की हड़बड़ी में किसान आंदोलन के अब तक के हासिल (जो किसी भी तरह छोटा या कम नहीं है) को दांव पर लगाने का खतरा तो मोल नहीं ले रहे हैं? क्या किसान नेता संबंधित प्रान्तों के किसानों को उन पर मंडरा रहे आसन्न संकट की बात पर्याप्त शिद्दत और ताकत के साथ बता पाएंगे?

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डिजिटल मीडिया के गले में कानूनी फंदा डालकर ये सरकार डराना चाह रही है या खुद डरी हुई है?

जब सरकार यह कहती है कि इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के व्यापार का एक बड़ा भाग भारत से होता है और इन्हें भारत के कानून के मुताबिक चलना होगा तो क्या इसमें यह संकेत भी छिपा होता है कि इन प्लेटफॉर्म्स को सरकार के हितों का ध्यान रखना होगा और सत्ता विरोधी कंटेंट से दूरी बनानी होगी?

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चौरी चौरा के सरकारी पुनर्पाठ के ज़रिये गांधी और उनकी अहिंसा को खारिज करने की कवायदें

प्रधानमंत्री जी का यह भाषण और इस भाषण के बाद बुद्धिजीवी वर्ग में व्याप्त चुप्पी दोनों ही चिंताजनक हैं। हिंसा का आश्रय तो हम पहले से ही लेने लगे थे किंतु क्या अब यह स्थिति भी आ गई है कि हम सार्वजनिक रूप से अहिंसा को खारिज कर गौरवान्वित अनुभव करने लगेंगे? क्या प्रधानमंत्री आंदोलनरत किसानों को यह संदेश देना चाहते हैं कि वे चौरी चौरा की घटना को अपना रोल मॉडल मानें?

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किसानों के लिए यह बजट निराशाजनक है, ऐसा कहना सरकारी कठोरता को कम कर के आंकना होगा

सरकार इस बजट के माध्यम से किसानों को यह संदेश देना चाहती है कि उनके आंदोलन से प्रभावित होकर वह अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव करने वाली नहीं है, बल्कि किसानों के लिए पिछले बजटों में जो थोड़े बहुत प्रावधान किए गए थे उन्हें लेकर भी वह कंजूसी बरतने का दुस्साहस अवश्य करने वाली है।

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‘किसान सच्चा पृथ्वीपति है, उसे सरकार से क्यों डरना?’ किसान आंदोलन के लिए गांधीजी के कुछ सबक

आज की हमारी सरकार भले ही किसानों की योग्यता और बुद्धिमत्ता पर संदेह करती हो और किसानों के साथ चर्चा करने वाले अनेक वार्ताकार उन्हें नासमझ के रूप में चित्रित करते हों किंतु गांधी जी उनमें एक आजाद, जाग्रत और प्रबुद्ध नागरिक के दर्शन करते हैं।

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26 जनवरी, 2021 एक तारीख नहीं, तवारीख के बनने का दिन है!

चाहे वे किसानों के समर्थक हों या किसानों के विरोधी, उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि किसानों की ट्रैक्टर परेड और गणतंत्र दिवस के पारंपरिक शासकीय आयोजन की तुलना करने की गलती न करें।

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क्या न्यायपालिका का काम कार्यपालिका और विधायिका के फैसलों को संरक्षण देना है?

अगर सरकार की मंशा आंदोलन को समाप्त करने अथवा मामले को लंबा खींचकर किसान नेताओं के धैर्य की परीक्षा लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट का उपयोग करने की थी तो सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की यह मंशा पूरी की है और स्वयं को उपयोग होने दिया है।

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