आगरा: दुनिया की बदलती तस्वीर और भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात पर व्याख्यान


कॉमरेड रमेश मिश्रा के छठवें स्मृति दिवस के अवसर पर आयोजित व्याख्यान में इस बार 17 जून 2026 को वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ. जया मेहता (दिल्ली) का व्याख्यान हुआ। उनके सम्बोधन का विषय था “दुनिया की बदलती तस्वीर और भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात”।  

डॉ. जया मेहता ने अपनी बात की शुरुआत करते हुए कहा कि जून 2025 में मुंबई में जब लोगों ने फ़लस्तीन के ग़ज़ा में जारी नरसंहार के खिलाफ़ प्रदर्शन करने के लिए पुलिस से अनुमति माँगी तो पुलिस ने मना कर दिया। इसके खिलाफ वामपंथी दलों ने मुंबई उच्च न्यायलय में गुहार लगायी। उच्च न्यायालय की न्यायाधीश ने कहा कि आप काहे हज़ारों मील दूर हो रहे ज़ुल्म, नरसंहार और अन्याय के पचड़े में पड़ते हैं। अपने मोहल्ले की नालियाँ साफ़ करवाने को आंदोलन कीजिए, अच्छी सड़कें बनवाने को आंदोलन कीजिए, अपने देश में, अपने शहर में पर्यावरण, प्रदूषण, कचरा, साफ़-सफ़ाई आदि कोई कम मुसीबतें हैं जो आप दूर देश का मामला लेकर प्रदर्शन करना चाहते हैं। 

इसके छह-सात महीनों बाद अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर हमला कर दिया। जंग वहां हुई और भारत में  गैस सिलिंडरों के दाम बढ़ने लगे। एक महीने में ही तीन-तीन बार पेट्रोल के दाम बढ़ाये गए। शायद न्यायाधीश महोदया को समझ आ गया होगा कि हम किसी कुएँ में रहने वाले मेंढक नहीं हैं, इंसान हैं और यह इंसानी लकीरों से जो देश बनाये गए हैं, वे बनते-बिगड़ते रहते हैं लेकिन एक जगह होने वाली घटनाओं के असर पूरी दुनिया पर पड़ते हैं। देश में भी यह मामला सिर्फ़ तेल तक नहीं सीमित रहता। अगर पेट्रो उत्पाद महंगे होंगे तो उर्वरक भी महंगे होंगे। फिर खेती पर और किसानों पर असर पड़ेगा। उससे खाद्यान्न और महंगा होगा। उससे खाद्य सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी। 



डॉ. मेहता ने कहा कि जब तेल महँगा हुआ तो हमें तेल ख़रीदने के लिए अपनी विदेशी मुद्रा को ज़्यादा ख़र्च करना पड़ा।  उससे हमारा विदेशी मुद्रा भण्डार खाली होने लगा। विदेशी मुद्रा  बुलाने के लिए हमने बाहर की कंपनियों को अपने यहाँ के शेयर मार्केट में निवेश करने को कहा। जो कम्पनियाँ पोर्टफोलियो निवेश करती हैं मतलब किसी तरह का वास्तविक निवेश नहीं करती, कोई कारखाना वगैरह नहीं लगातीं, बल्कि केवल वित्तीय सट्टेबाजी में अपना धन लगाती हैं, अगर उन्हें अपना निवेश खतरे में लगे तो वे एक सेकंड में अपना निवेश निकाल ले जाती हैं। और उन्होंने निकाल लिया। उससे रुपये की क़ीमत और ज़्यादा गिरी। और गिरी तो और निकाल लिया, उससे और ज़्यादा गिरी। यह एक तरह का ज़हरीला चक्रव्यूह होता है।   

जो नीट की परीक्षा में हुआ, जो सीबीएसई की परीक्षा में हुआ, जो बदहाली हमारी शिक्षा व्यवस्था या स्वास्थ्य व्यवस्था में है, उसका कोई सीधा सम्बन्ध ईरान के युद्ध या अंतरराष्ट्रीय बदलावों से नहीं है, वो सब हमारी अंदरूनी व्यवस्थागत गड़बड़ियों की वजह से हुआ लेकिन ऐसा लग रहा है कि स्वास्थ्य हो या शिक्षा, खाद्य सुरक्षा हो या परिवहन हो, या आर्थिक मोर्चे पर बैलेंस ऑफ़ पेमेंट का सवाल हो, हर मोर्चे पर हमारी व्यवस्था कमज़ोर और जर्जर हो रही है।  फिर भी सरकार बोली कि भारतीय अर्थवयवस्था की 7.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और  मोदी जी दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की नुमाइंदगी करने जी-7 की मीटिंग में गए। जी-7 में विकसित औद्योगिक अर्थव्यवस्था वाले देश इटली, फ्रांस, कनाडा, जर्मनी, जापान, इंग्लैंड और अमेरिका हैं। जब 1975 में जी-7 बना था तब वह दुनिया के समूचे सकल घरेलू उत्पाद का 70 फ़ीसद हिस्सा रखता था।  पिछले 50 वर्षों में दुनिया में जो बदलाव हुए हैं, उनमें जी-7 का दुनिया के जीडीपी में हिस्सेदारी घटकर 43 फ़ीसदी रह गई है। सन 2003 से जी-7 की मीटिंगों में भारत को लगभग हर बार एक विशेष आमंत्रित की हैसियत से मेहमान के तौर पर बुलाया जाता है लेकिन सदस्य नहीं बनाया जाता। एक तरफ विकसित देश भारत के बाज़ार को अपने पक्ष में करने के लिए भारत को अपनी तरफ झुकाये रखना चाहते हैं, दूसरी तरफ़ हमारे भारत के शासक 220 डॉलर अरबपतियों के सहारे विकसित देशों में अपनी जगह बनाना चाहते हैं और अपनी अर्थव्यवस्था के तूफ़ानी रफ़्तार से बढ़ने का दावा करते हैं।  इस वृद्धि दर की हक़ीक़त यह है कि मानव विकास सूचकांक  की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत की जगह 193 देशों में 130वीं है। मतलब मानव  विकास के बुनियादी आधारों पर हम 130वें क्रम पर हैं लेकिन अमीरी के क्रम में हम दुनिया के सर्वोच्च सात देशों के साथ जुड़ना चाहते हैं। मोदी जी बताना चाह रहे हैं कि देखिये हमने कितनी तरक़्क़ी कर ली कि जी-7 के देश भी हमें बुला रहे हैं और उनके चाटुकार विशेषज्ञ कह रहे हैं कि हम गुजरे तीन वर्षों में 133 से 130 पर आ गए और हम दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं।    

डॉ.  जया मेहता ने कहा कि यह डॉलर वाले 220 अरबपति और जी-7 के देश हमारी पहचान नहीं हैं।  हमारे लोग ही हमारी पहचान हैं और वे 95 फ़ीसदी ग़रीब हैं। पहले कांग्रेस और अब भाजपा के शासनकाल में जो आर्थिक नीतियाँ देश में अपनायी गईं हैं, उनसे अमीर-ग़रीब की खाई बहुत तेज़ी से चौड़ी हुई है। जितनी ज़्यादा ग़ैर बराबरी हमारे देश में बढ़ती जा रही है, उससे किसी भी समाज में शांति और स्थायित्व हो ही नहीं सकता। 

यह तो हुई देश की अर्थव्यवस्था की हालत का जायज़ा। अब बाक़ी दुनिया देख लीजिए क्योंकि इस वैश्वीकरण के बाद वाली दुनिया में जो होता है, उसके असर दूसरी जगहों तक भी पहुँचते हैं। ईरान पर अमेरिका और इज़रायल का हमला हो का फ़लस्तीन पर इज़राल का हमला हो, उसके असर हिन्दुस्तान तक भी पहुँचते हैं, बल्कि हिन्दुस्तान तक ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों पर यह ख़तरा मंडरा रहा है। अंकटाड की रिपोर्ट कहती है कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के  ऐसे 75  देशों पर गंभीर असर हुए हैं जो दुनिया के सबसे ज़्यादा अविकसित देश (लीस्ट डेवलप्ड कन्ट्रीज) कहलाते हैं। इन 75 देशों में से 65 देश ऐसे हैं जो अपने इस्तेमाल के लिए आयातित तेल पर निर्भर  रहते हैं। उनकी अर्थव्यवस्था हमसे भी ज़्यादा कमज़ोर है। उन्हें सिर्फ़ तेल में आयी उछाल और उनकी मुद्रा में आयी गिरावट की वजह से 20 अरब डॉलर ज़्यादा ख़र्च करने पड़ रहे हैं। आप सोच सकते हैं कि जिनके खाने के लाले पड़े हुए हैं  उनके लिए 20 अरब डॉलर का अतिरिक्त ख़र्च कितना भारी पड़ेगा। 

अमेरिकी दादागिरी की एक शर्त यह भी है कि हम ग़रीब देशों को जितना मर्जी महँगा सामान बेचें लेकिन आप और किसी से सस्ते में खरीद भी नहीं सकते। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से डॉलर सभी देशों की मुद्रा बना दी गयी है। इस वजह से कोई भी देश अमेरिका को नाराज़ करने की हिम्मत  नहीं करता। फिर भी रूस, चीन जैसे अनेक देश जिनसे अमेरिका को कोई खतरा होता है या जो देश उसकी बात न मानें, उन पर अमेरिका प्रतिबन्ध लगा देता है। रूस पर लगाया, ईरान पर लगाया और भी अनेक देशों पर। अब तक ऐसे 67 देश हैं जिन पर अमेरिका ने प्रतिबन्ध लगा रखे हैं। इन देशों ने मिलकर अपना एक समूह बना लिया। इन्हें अमेरिका ने प्रतिबंधित किया कि वे डॉलर में व्यापार नहीं कर सकते तो इन देशों ने डॉलर का विकल्प ढूँढ़कर व्यापार भी किया और विकास भी किया। पूँजीवादी अर्थशास्त्री सोच रहे थे कि डॉलर का सहारा हट  जाने से रूस की मुद्रा रूबल और अर्थव्यवस्था गिर जाएगी। एक सप्ताह चलेगी, एक महीने में गिर जाएगी। लेकिन रूबल नहीं गिरा।  तीन साल हो गए, चल रहा है।  ऐसा ही ईरान के बारे में कहा गया था कि वह कहाँ टिक पाएगा, लेकिन वह भी टिका है और रूस भी टिका है. बल्कि  देशों के शासकों को अपनी जनता का समर्थन और इज़्ज़त भी हासिल हुई है।

आज यह सब देश मिलकर अमेरिका की दादागिरी को चुनौती दे रहे हैं लेकिन भारत का शासक वर्ग अभी भी अमेरिका का मोह नहीं छोड़ना चाह रहा है जबकि अब सारी दुनिया के सामने यह ज़ाहिर हो चुका है कि अमेरिका किसी नियम-क़ायदे को नहीं मानता है, और लोगों की जान की उसे कोई परवाह नहीं है।  ऐसी व्यवस्था में मुट्ठी भर लोग ही तरक़्क़ी कर सकते हैं, जनता की बदहाली होती है।  बिना समाजवादी व्यवस्था के सही मायनों में किसी भी देश में लोगों की तरक़्क़ी नहीं हो सकती। 



आरंभ में सभी अतिथियों ने कॉमरेड रमेश मिश्रा के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। दिल्ली से आयीं विशेष अतिथि भारतीय महिला फेडरेशन की राष्ट्रीय महासचिव कॉमरेड निशा सिद्धू, राष्ट्रीय सचिव कॉमरेड अरुणा सिन्हा एवं प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव कॉमरेड विनीत तिवारी ने भी विचार व्यक्त किये। आयोजन की अध्यक्षता कॉमरेड ओम प्रकाश प्रधान, किसान सभा के राष्ट्रीय परिषद के सदस्य ने की। कॉमरेड रमेश मिश्रा के सुपुत्र कॉमरेड नीरज मिश्रा ने कॉमरेड रमेश मिश्रा के बारे में संस्मरण सुनाये। भाकपा के जिला मंत्री कॉमरेड पूरन सिंह, एस. के. खोसला आदि ने अपने विचार रखे।

व्याख्यान के पूर्व परमानन्द शर्मा के संगीत निर्देशन में इप्टा आगरा के कलाकारों ने नाट्य पितामह राजेन्द्र रघुवंशी रचित गीत “लेनिन तुम्हें सलाम”, यदु राही का गीत “जब तक रोटी के प्रश्नों पर रखा रहेगा भारी पत्थर” एवं असलम खान ने अन्य गीत पेश किये। गायन में आशुतोष गौतम, जय कुमार, बालेन्दू भदौरिया थे। ढोलक पर संगत की संजय ने। धन्यवाद उपसचिव भाकपा, मोहन सिंह ने दिया। सभा का संचालन दिलीप रघुवंशी ने किया। यह वैचारिक मंथन सुधी श्रोताओं से भरे हुए माथुर वैश्य सभागार, पचकुइयां, आगरा में सम्पन्न हुआ।

इस अवसर पर विशेष रूप से उपस्थित थे -हरिविलास दीक्षित,सरला जैन,कुमकुम रघुवंशी, प्रियंका मिश्रा, प्रोफ़ेसर ज्योत्स्ना रघुवंशी,एम. पी. दीक्षित, धारमजीत,मनोज झा, भिकम सिंह कुशवाह, कोमल सिंह, निरोति लाल, करुणेश राजपूत, रामनाथ शर्मा, भारत सिंह, संग्राम सिंह आदि।



About जनपथ

जनपथ हिंदी जगत के शुरुआती ब्लॉगों में है जिसे 2006 में शुरू किया गया था। शुरुआत में निजी ब्लॉग के रूप में इसकी शक्ल थी, जिसे बाद में चुनिंदा लेखों, ख़बरों, संस्मरणों और साक्षात्कारों तक विस्तृत किया गया। अपने दस साल इस ब्लॉग ने 2016 में पूरे किए, लेकिन संयोग से कुछ तकनीकी दिक्कत के चलते इसके डोमेन का नवीनीकरण नहीं हो सका। जनपथ को मौजूदा पता दोबारा 2019 में मिला, जिसके बाद कुछ समानधर्मा लेखकों और पत्रकारों के सुझाव से इसे एक वेबसाइट में तब्दील करने की दिशा में प्रयास किया गया। इसके पीछे सोच वही रही जो बरसों पहले ब्लॉग शुरू करते वक्त थी, कि स्वतंत्र रूप से लिखने वालों के लिए अखबारों में स्पेस कम हो रही है। ऐसी सूरत में जनपथ की कोशिश है कि वैचारिक टिप्पणियों, संस्मरणों, विश्लेषणों, अनूदित लेखों और साक्षात्कारों के माध्यम से एक दबावमुक्त सामुदायिक मंच का निर्माण किया जाए जहां किसी के छपने पर, कुछ भी छपने पर, पाबंदी न हो। शर्त बस एक हैः जो भी छपे, वह जन-हित में हो। व्यापक जन-सरोकारों से प्रेरित हो। व्यावसायिक लालसा से मुक्त हो क्योंकि जनपथ विशुद्ध अव्यावसायिक मंच है और कहीं किसी भी रूप में किसी संस्थान के तौर पर पंजीकृत नहीं है।

View all posts by जनपथ →