स्त्री-पात्रों के चित्रण में प्रेमचंद खुद को केवल समस्या तक सीमित नहीं रखते, समाधान सुझाते हैं


प्रेमचंद की रचनाओं को पढ़कर ऐसा लगता है कि वे पात्र के बहाने जिस समस्या को उठाते हैं, उस समस्या को सामने से अवगत करा रहे होते हैं। वे इस तरह के कथाकार हैं, जिनकी रचनाओं को पढ़ कर समाज की हर समस्या को गहराई में समझा जा सकता है। इतना ही नहीं, उन समस्याओं को दूर करने के लिए अपने ढंग से समाधान भी देने की वे कोशिश करते हैं। भले ही उन पर आलोचकों द्वारा आरोप लगता आया हो कि वे अंत में आदर्शवादी हल बतलाते हैं, किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आदर्शवादी ही सही परन्तु समाज की समस्याओं को दिखाने के साथ उसे हल करने का वे प्रयास भी करते हैं। शुरू में उन पर आदर्शवाद का प्रभाव अवश्य रहा है, परन्तु जब वे किसी मुद्दे को उठाते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि समाज की सच्चाई और असलियत दिखा रहे हैं जिसमें किसी तरह की कोई बनावट नहीं है।

प्रेमचंद के यहां स्त्री

उनके पहले हिंदी उपन्यास ‘सेवासदन’ की बात की जाए तो उनकी लेखनी में एकदम वैसी ही स्थिति देखने को मिलती है, जैसे समाज में वास्तविक रूप से घटित हो रही होती हैं। किसी के पिता कितने भी ईमानदार हों परन्तु जब बेटी की शादी की बात आती है तो सारी ईमानदारी, मर्यादा और स्वाभिमान टूट जाते हैं। घूसखोरी के रास्ते पर चलने को मजबूर हो जाते हैं। उसके बाद की जो स्थिति बनती है, उसका हूबहू चित्रण सेवासदन में मिलता है। सुमन के पिता जब रिश्वतखोरी में पकड़े जाते हैं तो उनके पास जेल जाने और बदनामी के सिवा कुछ नहीं बचता। इसके बाद जैसे घर की स्थिति बदतर होती चली जाती है। प्रेमचंद ‘सेवासदन’ में ठीक ऐसी ही स्थिति का चित्रण करते हैं। सुमन की शादी किसी अयोग्य व्यक्ति से हो जाती है जिसके साथ वह खुश नहीं रह पाती। आपसी समझ भी नहीं बन पाती है। यहां तक उसका पति उसे शक की निगाह से देखता है। देर रात आने के कारण उसे घर से निकाल देता है। इसके बाद वही समस्या, जो किसी भी भारतीय नारी के साथ हो सकती है- उसे कोई स्वीकार नहीं करता। 

वह एक दिन पद्मसिंह, जो वकील हैं, के घर में भी बिताती है परन्तु समाज के डर से वे भी उसे घर में रखने को राज़ी नहीं हो पाते। उसके बाद केवल वेश्या की चौखट ही उसका सहारा बनती है। प्रेमचंद ने इस बहाने यह दिखाने की कोशिश की है कि किस तरह होता है वेश्यावृत्ति का निर्माण! साथ ही, उन्होंने समाज को आईना दिखाने का काम किया है कि किस प्रकार समाज के पुरुष वेश्या का तिरस्कार करते हैं, भले ही वह अकेले में उसका तलवा चाटे और उसके रूप की प्रशंसा करे। इस समाज का बेहयापन है कि जो वेश्या के साथ सम्बन्ध रखते हैं, उनकी इज्जत पर थोड़ी भी आँच नहीं आती किन्तु घर की अपने बहू-बेटियों को वेश्याओं के आसपास फटकने तक नहीं देना चाहते।

प्रेमचंद ने यहाँ भी सुधार की बात की हैं। किस तरह वेश्या को सही मार्ग पर लाया जाए, इस समस्या के समाधान हेतु उन्होंने वेश्याओं के लिए एक आश्रम बनाने की बात कही हैं। इस समाधान को कई आलोचकों ने आदर्शवादी करार दिया है, परन्तु यह भी सच है कि इस समाधान के माध्यम से वेश्या के जीवन में बदलाव लाया जा सकता है। सुमन की जिंदगी को बेहतर बनाया जा सकता है। 

वेश्याओं से इतर सामान्य स्त्रियों की स्थिति भी समाज में दयनीय ही थी। प्रेमचंद ने उसे भी आर्थिक नजरिये से देखने का प्रयास किया है। दहेज के चलते लड़कियों की शादी तिगुनी उम्र के साथ कर दी जाती थी। इस समस्या को प्रेमचंद ने ‘निर्मला’ में बख़ूबी उठाया है। निर्मला की शादी शुरू में तो अच्छी जगह तय होती है किंतु उसके पिता के मर जाने पर लड़के वाले शादी से इनकार कर देते हैं। फिर उसकी माँ को मजबूरन निर्मला की शादी बाप के उम्र के व्यक्ति तोताराम से करनी पड़ती है, जिसकी मरी हुई पत्नी का बच्चा निर्मला की उम्र का होता है। इस तरह निर्मला की जिंदगी नरक बन जाती है। वह बाप की उम्र की व्यक्ति से कैसे प्रेम कर पाती? अंत में निर्मला अपनी जिंदगी का अंत कर देती है। ठीक इसी तरह ‘सेवासदन’ में भी सुमन की शादी पैसों के अभाव के कारण बेमेल व्यक्ति से होती है।

इन सभी बेमेल शादियों का मुख्य कारण दहेज ही था। पैसा न होने की वजह से किसी भी व्यक्ति के हाथ में बेटी पकड़ा दी जाती थी। इन सारी समस्याओं पर प्रेमचंद ने आमलोगों का खासा ध्यान केंद्रित करवाया है। 

गोदान की धनिया

प्रेमचंद के समय में भी आज ही की तरह किसानों की स्थिति बदत्तर थी। उनकी दशा में कोई सुधार होते नहीं दिख रहा था। हर एक दिन किसानों के हालात उन्हें मौत के करीब ला रहे थे। प्रेमचंद ने किसान की व्यथा को लगभग हर उपन्यास में उठाने की कोशिश की है, जिसमें सबसे अहम उपन्यास गोदान है। इसे पढ़ कर किसानों की समस्याओं से गहराई में अवगत हुआ जा सकता है। आज भी किसान कर्ज के बोझ से लद जाते हैं। बैंको से कर्ज लेने की कोई खास सुविधा नहीं है जिसके कारण जमींदारों और महाजनों से ही उधार लेना पड़ता हैं जो अधिक ब्याज की कीमत पर देते हैं। बहरहाल, जैसे-तैसे बुआई-रोपाई तो करते हैं लेकिन फिर भी अच्छी पैदावार की गारंटी नहीं होती। कभी सुखाड़ तो कभी बाढ़। उस समय जैसे अंग्रेजों को किसानों के दुख-दर्द से कोई मतलब नहीं होता था ठीक वैसे ही, आज की सरकारें भी किसानों की व्यथा से कोई लेना-देना नहीं रखती हैं। सरकारें भी कर्ज़ देने के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं कराती हैं।  इसका परिणाम यह होता है कि जिस महाजन से वे कर्ज लेते हैं, उसे नहीं चुका पाने के कारण अपनी जमीन तक गंवा बैठते हैं। भूमिहीन होकर भी खेतों में काम करते तो हैं लेकिन पर्याप्त भोजन तक नहीं मिल पाता। कभी-कभी स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं।

प्रेमचंद ने गोदान में होरी के बहाने ऐसे ही स्थिति को बहुत बारीकी से दिखाने की कोशिश की है। होरी एक किसान पात्र है जिसके पास आखिर में आज के किसानों की भांति खोने को कुछ नहीं बचता। और आखिर में मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से टूट जाता है। पैसा न होने के कारण अपनी छोटी बेटी रूपा की शादी अपने हमउम्र के व्यक्ति से करना पड़ जाता है जिसका दुख उसे सदैव रहता है। इस हालत में भी कड़ी धूप में महाजन का खेत जोतना पड़ता है जिसके कारण उसकी मृत्यु हो जाती है। उसके बाद भी बड़े लोग पैसा लेने में होरी की पत्नी धनिया की जान नहीं छोड़ते है। तब वह अंत में दातादीन से इतना कहकर बेहोश हो जाती है कि “महाराज, घर में न गाय है, न बछिया और न पैसा। यही पैसे हैं, यही इनका गो-दान है।” और पछाड़ खाकर गिर पड़ती है। 

महाजन और जमींदार किसान को परम्परा में बाँधे रखते थे ताकि उनका शोषण कर सकें, जिसमें धर्म का भी बहुत बड़ा हाथ है। अमूमन भारत के किसान परम्परावादी होते हैं। एकदम होरी की तरह, परन्तु धीरे-धीरे किसान जागरूक भी हो रहे थे। होरी का बेटा इस शोषण की परंपरा पर उँगली उठाता है। वह इस परंपरा से मुक्त होकर शहर जाकर मजदूर बन जाता है। प्रेमचंद अपनी रचना में उस समय के पंच की सच्चाई से भी अवगत कराते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि आज भी पंच में कोई बदलाब नहीं आया है। आज भी एकदम हूबहू स्थिति विद्यमान है, इसलिए आज भी प्रेमचंद जैसे महान कथाकार प्रासंगिक हो जाते हैं। झूठी परम्परा के नाम पर पंच भी लूटने में पीछे नहीं रहा है। वह भी किसान के शोषण में भागीदार रहा है।

आज भी परम्परा और धर्म के नाम पर तमाम तरह का शोषण जारी है। किसान धर्म और प्रतिष्ठा से डर कर शोषण का शिकार हो जाते हैं। होरी को भी समाज और डर के कारण ही हर्जाना के रूप में दण्ड देना पड़ता है ताकि गाँव और लोगों के बीच प्रतिष्ठा के साथ रह सके। प्रेमचंद किसान की गरीबी से भी हूबहू परिचय करवाते हैं।  जिस तरह उस समय के किसान दिक्कत झेल रहे थे, आज के किसान भी उसी गरीबी को झेल रहे हैं। उनकी आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। 

गोदान में वर्णित पात्र के माध्यम से उस समय के किसानों के आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। जब होरी की बेटियों को जोर की भूख लगती है तो वे अपनी काकी (चाची) के घर के तरफ दौड़ पड़ती  हैं ताकि खाने को वहां कुछ मिल जाए। धनिया की साड़ी से भी गरीबी का पता चलता है। वह फटी साड़ी से ही दिन काट रही होती है। होरी को भी अपना खास ध्यान नहीं रहता है। वह अपने बाप-दादा के ओढ़ना से ही ठण्ड बिताते आ रहा था। वह पूरी तरह खराब होने के बाद भी मरते दम तक ओढ़ना नहीं खरीद पाया। कितना अजीब है न! बड़े लोग पैसों की बदौलत अपने कितने शौक पूरे कर लेते हैं जबकि होरी जैसा किसान एक गाय तक का शौक नहीं पूरा कर पाता है। जो गाय कर्ज लेकर खरीदता भी है, वह भी आफत बन जाती है। उसी का एक भाई गाय को ज़हर दे देता है जिससे उसकी मौत हो जाती है। उसके लिए फिर एक नई तंगी का दौर शुरू हो जाता है।

प्रेमचंद अपने उपन्यास में समाज की हरेक समस्या को उठा कर पाठक के समक्ष इस ढंग से रखते हैं कि जैसे पाठक अपने सामने सारी समस्याओं को देख रहा हो। वे समाज के प्रति इतना जागरूक थे कि उनके पास लिखने को हजार कथाएं होती थीं।


अंशिका बिहार के मोतिहारी स्थित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में स्नातकोत्तर की छात्रा हैं


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