पुस्तक समीक्षा: भारत का संविधान – महत्वपूर्ण तथ्य और तर्क

यह किताब संविधान की पृष्ठभूमि और इसके निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए हिंदी में एक जरूरी दस्तावेज की तरह हैं जो महत्वपूर्ण तथ्यों के साथ-साथ संविधान के वजूद में आने के तर्कों को बहुत ही सटीकता के साथ प्रस्तुत करती है।

Read More

धर्मनिरपेक्षता के संघर्ष में सरदार पटेल को सही नजरिये से समझने की कोशिश

, जब हम सेकुलरिज्म को पश्चिमी अवधारणा से देखते हैं जिसमें धर्म और राजनीति एक दूसरे से पर्याप्त दूरी बरतते हैं, तभी हमें सरदार हिंदुत्ववादी रुझान वाले दिखते हैं। किताब के परिचय में नानी पालखीवाला ने इस धारणा के लिए स्पष्ट तौर पर समाजवादियों जैसे जेपी, वामपंथियों के साथ ही आज़ाद को भी को ज़िम्मेदार ठहराया है।

Read More

नागरिकता पर सवाल उठाता IPTA का नाटक “धीरेंद्र मजूमदार की मां”

देश में औपनिवेशिक आजादी के लिए चले जन संग्राम का परिणाम सांप्रदायिक आधार पर देश विभाजन के रूप में सामने आया। देश के बंटवारे का दंश अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को भी भुगतना पड़ा था जो विभाजन नहीं चाहते थे। ऐसे ही लोगों में धीरेंद्र मजूमदार की मां शांति मजूमदार भी थी। वह मां जिसकी चार संतानों ने अंग्रेजों से हुई लड़ाई में शहादत दी और बाकी चार ने बांग्लादेश के लिए चले मुक्ति संघर्ष में अपनी जान गंवाई।

Read More

‘पठान’ को मिल रहा समर्थन उसे मिले विरोध का विरोध है?

शाहरुख और दीपिका उस पुराने भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं जहां कलाकारों को उनके हुनर से पहचाने जाने की रवायत रही है न कि उनकी जाति, धर्म या विचारधारा से। ऐसे में महज कुछ सेकेंड की एक क्लिप से बिना पूरी फ़िल्म देखे जिस कदर व्यापक विरोध हुआ और ऐसे असंवैधानिक विरोध होने दिये गए उससे यह स्पष्ट होता है कि इस आलोकतांत्रिक विरोध के पीछे केवल कुछ संगठन ही नहीं थे बल्कि नए भारत की परियोजना में शामिल पूरा तंत्र शामिल था।

Read More

जीवन में संविधान: रोजमर्रा की कहानियों में संवैधानिक मूल्यों को आत्मसात करने की कोशिश

इस किताब में 76 लघु कहानियां हैं। ये महज कहानियां नहीं हैं बल्कि किसी न किसी के साथ हुई सच्ची घटनाएं हैं जिन्‍हें कहानी के माध्यम से किताब में बयां किया गया है। लेखक ने इन सभी घटनाओं को बहुत ही सरल भाषा में कहानी में ढाला है। इन कहानियों के जीवंत पात्र बच्चे हैं, महिलाएं हैं, किशोर/किशोरियां हैं, युवा हैं, बुजुर्ग हैं, दलित हैं, आदिवासी है, गरीब हैं, वंचित तबकों से हैं।

Read More

नये भारत के उदय के बीच तीन ख़ानों की दास्तान

इन तीनों के बारे में लगातार लिखा जाता रहा है। इनसे जुड़े विवादों से लेकर अफवाहों और फिल्मों तक के बारे में बहुत कुछ पहले से ही लिखा और कहा जा चुका है। ऐसे में पहला सवाल यह उठता है कि इन तीनों पर आधारित एक किताब नया क्या पेश कर सकती है?

Read More

अपनी छवि की गुलामी का ‘बेशरम रंग’ क्यों ढो रहे हैं बॉलीवुड के बूढ़े सितारे?

आपत्ति तो इस पर होनी चाहिए कि जनसंचार के एक इतने जबर्दस्त माध्यम को कचरा परोसने का यंत्र क्‍यों बना दिया गया है। मुकदमा तो इस पर दर्ज होना चाहिए कि करोड़ों फूंक कर भी दर्शकों के सामने इस तरह की चीज क्यों परोसी जा रही है। क्‍या इसका शाहरुख की निजी महत्‍वाकांक्षा से कोई लेना-देना हो सकता है?

Read More

बिहार की घुटी हुई चीख वाया ‘कंट्री माफिया’ और ‘खाकी’

बिहार के लिए खुश होने लायक कुछ भी नहीं है, दोनों ही सीरीज में। दोनों ही में बिहार की ‘अंडरबेली’ को दिखाया गया है। बिहारी जातिवाद, अराजकता, अर्द्ध-सभ्यता, हिंसा और बात-बेबात का अहंकार, सब कुछ इन दोनों में दिखाया गया है, कुछ भी छोड़ा नहीं गया है।

Read More

मट्टो की सायकिलः विकास की राजनीति और जाति के दंश का सिनेमाई आईना

यह कहानी सिर्फ़ मट्टो की नहीं है। यह उस दर्ज़े के लोगों की कहानी है जो हिंदुस्तान के निर्माण में अपना सब कुछ लगा देते हैं। जिनके दम पर इंडिया फ़र्राटे भरता है, पर मट्टो जैसे लोग रेंगने को मजबूर हैं। आगे बढ़ने वाले देश में पीछे छूट जाने वाले लोगों की कहानी, जो सिर्फ़ आर्थिक वजह से पीछे नहीं छूटते बल्कि अपनी जाति की वजह धकेल दिए जाते हैं।

Read More

पराक्रमहीनता का राग मालकौंस

समीक्ष्य पुस्तक Modi@20: Dreams meet Delivery 21 अध्याय और 1 प्राक्कथन से संयोजित-संपादित पुस्तक है जिसमें राजनीति, कला, संगीत, खेल, उद्योग आदि से जुड़े देश के 22 दिग्गजों के आलेखों को सम्मिलित किया गया है। शायद यह पहली ऐसी पुस्तक मेरे देखने में आयी है जिसका सम्पादन कोई व्यक्ति नहीं एक ‘फाउंडेशन’ ने किया है।

Read More