महाराष्ट्र: सरदार सरोवर बांध के विस्थापितों की पुनर्वास बस्ती में विकल्प की धुन


जिला परिषद के स्कूल के उस मैदान में सबसे पहले जो चीज़ आपको सुनाई देती है, वह है ढोल की आवाज़। दूर से आती हुई, फिर धीरे-धीरे पास आती हुई। कुछ बच्चे कतारों में चलते हुए ढोल बजा रहे हैं – ताल में, पूरे आत्मविश्वास के साथ। जैसे घाटी खुद उनके साथ लय मिला रही हो। वे दो-तीन पंक्तियों में आगे बढ़ते हैं और फिर मैदान में बैठ जाते हैं, मानो घाटी ने ही उन्हें व्यवस्थित कर दिया हो। सबने अपनी-अपनी जीवनशाला की रंगीन टी-शर्ट पहन रखी है – पीछे उनके नाम और नंबर लिखे हैं। रोज़ के दिनों में ये बच्चे गहरे नीले पैंट पहनकर स्कूल जाते हैं, लेकिन इस दिन वे अपने साथ रंग, लय और गर्व लेकर आए हैं।

यह नर्मदा बचाओ आंदोलन की जीवनशालाओं का सालाना बाल मेला 18-22 फ़रवरी के बीच महाराष्ट्र की उत्तरी सीमा पर स्थित नंदुरबार जिले के तलोदा तालुका की छोटी-सी – सरदार सरोवर बांध से विस्थापित – आदिवासी पुनर्वास बस्ती  जीवन नगर के स्कूल में हो रहा था । नर्मदा घाटी की जीवनशालाओं – मणिबेली, डनेल, भादल, खाऱ्या भादल, सावऱ्या दिगर, भाबरी, थुवानी और अन्य – के बच्चे यहाँ इकट्ठा हुए थे। पर इसे केवल स्कूल का वार्षिक उत्सव कह देना सही नहीं होगा। यह उस आंदोलन की कल्पना और आशाओं का उत्सव है, जो संघर्ष के साथ-साथ समाज को नए सिरे से बनाने का सपना भी देखता है।



मैदान में कदम रखते ही बच्चों की आवाज़ें गूंजती हैं, इन नारों के साथ जल-जंगल-जमीन बचाने की आवाज़ें भी मिल जाती हैं-

“जीवनशाला की क्या है बात?
लड़ाई पढ़ाई साथ-साथ!”
“जीवनशाला में सीखेंगे –
आगे बढ़ते जाएंगे!”

संयोग से मेले का पहला दिन छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती का भी था। “जय शिवाजी!” के उद्घोष पूरे मैदान में गूंज रहे थे। तिरंगे झंडों के साथ-साथ आंदोलन के नीले झंडे भी लहरा रहे थे जिन पर लिखा था  –  “नर्मदा बचाओ – मानव बचाओ।” । जिला परिषद स्कूल के बड़े मैदान में सभी जीवनशालाओं के झंडे गाड़कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई। मुंबई, पुणे, धुले, अकोला, झारखंड और कई अन्य जगहों से आंदोलन के समर्थक और साथी भी आए थे। कार्यक्रम के उद्घाटन में पिछले चालीस वर्षों के नर्मदा संघर्ष को याद किया गया और उन साथियों को श्रद्धांजलि दी गई जो अब हमारे बीच नहीं हैं। बाबासाहेब आंबेडकर, सावित्रीबाई फुले, महात्मा गांधी, बिरसा मुंडा, तंट्या भील, रानी काजल, छत्रपति शिवाजी और बाबा आमटे के चित्रों पर पुष्पांजलि अर्पित की गई।

बाल मेले में कई तरह के स्टॉल लगे थे, जिसे आंदोलन, शिक्षकों और समर्थकों ने लगे था। आदिवासी क्रांतिकारी टंट्या भील को समर्पित एक स्टॉल खास आकर्षण का केंद्र था, जिसे जन कलाकार संजय भोंसले जी ने बड़े ही सहजता से तैयार किया था। उनके बनाये अन्य चित्र जिनमें जल-जंगल-जमीन बचाने का संदेश दिया जा रहा था, अलग अलग जगहों पर आंदोलन और अभियान के बैनर के साथ लगे थे। पास ही नर्मदा बचाओ आंदोलन के 40 साल के सफर को दिखाने वाली एक फोटो प्रदर्शनी भी लगी थी। मराठी विज्ञान परिषद, पुणे विभाग के साथियों ने बच्चों के लिए विज्ञान के प्रयोगों का स्टॉल लगाया था। छोटे-छोटे वैज्ञानिक प्रयोग बच्चों को हैरान कर रहे थे।



स्वास्थ्य जांच का एक कोना भी था जहाँ बच्चों की जांच की जा रही थी, पुणे के काटे फाउंडेशन के डॉक्टर्स और वॉलंटियर्स, नज़दीकी सरकारी स्वास्थ्यशाला के डॉक्टर और नर्सेस, के अलावा अन्य डॉक्टर भी मौजूद थे। खेलों के लिए अलग जगह बनाई गई थी – खो-खो, कबड्डी और अन्य प्रतियोगिताओं के लिए मैदान तैयार था। पुणे की संस्था खेळघर, जो पिछले तीन दशकों से बस्तियों के बच्चों के साथ काम करती है, अपने बच्चों को लेकर आई थी। दूर मुंबई, झारखंड, तमिलनाडु आदि जगहों से भी कुछ छात्र सीखने समझने आए थे और तन्मयता से लोगों से बात कर रहे, नोट्स ले रहे थे और अपना योगदान दे रहे थे।

पहली रात बच्चों ने ज्योतिबा फुले के जीवन पर नाटक प्रस्तुत किया। मंच साधारण था लेकिन तैयारी बहुत ही गहरी और गंभीर। वेशभूषा, संवाद, मेक-अप – सबमें गुरुजी और बच्चों की मेहनत साफ दिख रही थी। यह केवल एक नाटक नहीं था, बल्कि सीखने की पूरी प्रक्रिया थी।

अगले दिन थुवानी जीवनशाला की लड़कियों ने झाखड़ी नृत्य प्रस्तुत किया। ऊर्जा और लय से भरा हुआ यह नृत्य पूरे मैदान को झंकृत कर रहा था। डनेल जीवनशाला के बच्चों ने गीत गाया –  “जान भी दे दो पर बचन नहीं” और हर मौके पर मैदान में “आदिवासी एकता जिंदाबाद” के नारे गूँजते रहे । जब भी कोई कार्यक्रम ख़त्म होता तो बच्चों की ड्रम बजाने वाली टोली जोरदार उत्साह बढ़ाती और साथ में उनके नारे। पास के ग्राम पंचायत स्कूल के बच्चे भी मंच पर आए। कुछ देर के लिए वे विभाजन मिट गए जो अक्सर उपेक्षा और राजनीति के कारण खड़े हो जाते हैं।

अगले दो दिनों में बच्चों ने कई नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किए –

  • महात्मा गांधी: अहिंसा और सत्याग्रह से न्याय
  • ज्योतिबा फुले: किसानों के आँसू और कोड़े
  • सावित्रीबाई फुले: शिक्षा के लिए संघर्ष
  • बाबासाहेब आंबेडकर: संविधान – जीवन का आधार
  • तंट्या भील: खजाना लूटकर गरीबों में बांटना
  • जयप्रकाश नारायण: भ्रष्टाचार के खिलाफ संपूर्ण क्रांति
  • सुंदरलाल बहुगुणा: जंगल बचाओ, नदियाँ-पहाड़ बचाओ

ये विषय ही बताते हैं कि जीवनशालाएं बच्चों में कौन-से गहरे मूल्य स्थापित करती हैं। अधिकांश नाटक शिक्षकों ने स्वयं लिखे थे। जोशीले प्रदर्शन, जीवंत नृत्य और दिल को छू लेने वाले गीतों ने पूरा माहौल विद्युतीय बना दिया था। ये गतिविधियां सिर्फ मनोरंजन नहीं थीं – बल्कि छात्रों, शिक्षकों और स्कूलों का एक अनौपचारिक लेकिन शक्तिशाली मूल्यांकन भी थीं।



दिन भर मेले का एक बड़ा आकर्षण खेल प्रतियोगिताएँ भी थीं जिनका इंतज़ार बच्चों को पूरे साल रहता। मैदान के एक हिस्से में तीनों दिन खो-खो, कबड्डी, तीन टांग की दौड़, 50 मीटर की दौड़, नींबू चम्मच रेस आदि के मुकाबले पूरे जोश के साथ चले। अलग-अलग जीवनशालाओं की टीमें अपने-अपने रंगों की टी-शर्ट में उतरतीं और साथी बच्चों की जोरदार आवाज़ों के बीच मुकाबला करतीं। मैदान के किनारों पर बैठे बच्चे अपनी टीमों के लिए तालियाँ बजाते, ड्रम बजाते, नारे लगाते और हर अंक पर उछल पड़ते। खेल सिर्फ प्रतियोगिता नहीं थे; उनमें टीम भावना, अनुशासन और आत्मविश्वास साफ दिखता था। छोटे बच्चों के लिए भी दौड़, रस्साकूद और अन्य हल्के खेल रखे गए थे ताकि हर कोई भाग ले सके। जीत-हार से ज़्यादा यहाँ महत्व था साथ खेलने का, शरीर को मजबूत बनाने का और यह महसूस करने का कि पढ़ाई के साथ खेल भी जीवनशालाओं की शिक्षा का जरूरी हिस्सा है।

बाल मेले और जीवनशाला में घाटी का पूरा सामाजिक ताना-बाना भी दिखाई देता है। नर्मदा माता, आदिवासी देवताओं की ठानी, बाबा आमटे और आंदोलन की स्मृतियाँ – सब सांस्कृतिक कार्यक्रमों में एक साथ दिखाई देती हैं। यहाँ की ज़िंदगी खेती से जुड़ी है – गन्ना, ज्वार, बाजरा, चावल, गेहूं। लगभग हर घर में गाय, बकरी, भैंस या बैल हैं। पारंपरिक घरों में बड़े रसोईघर, खुले हाल, दरवाज़ों की जगह परदे, खाटें बिछी, बर्तन दीवारों के साथ करीने से रखे और वैसे ही करीब हरेक जीवनशाला होती है जहाँ बच्चे रहते और पढ़ाई करते हैं। भले ही पुनर्वास की कहानियाँ अलग-अलग हैं, लेकिन आदिवासी समाज की संस्कृति में बड़ी समानता है। महाराष्ट्र में कई परिवारों को जमीन और मकान के प्लॉट मिले। मध्य प्रदेश में योजनाएँ कई बार बदलीं और कई बार न्यायाधिकरण के आदेश भी लागू नहीं हुए। कुछ परिवार पुनर्वास स्थलों पर चले गए, तो कुछ अब भी पुराने गांवों में रहते हैं – डूब के खतरे के साथ।

बाल मेले की कहानी दरअसल 1990 के दशक की शुरुआत से जुड़ी है। विंध्य और सतपुड़ा की पहाड़ियों के आदिवासी गांवों में सरकारी स्कूल अक्सर सिर्फ कागज़ पर मौजूद थे। लोग उन्हें “कागज़ी स्कूल” कहते थे। शिक्षक साल में दो बार – 15 अगस्त और 26 जनवरी – आते, झंडा फहराते और फिर गायब हो जाते। वेतन जिला मुख्यालय से मिलता रहता था। पचास साल तक यह व्यवस्था चलती रही – सबके लिए ठीक, बस आदिवासियों को छोड़कर!

नर्मदा बचाओ आंदोलन के शुरुआती दिनों में इन स्कूलों का मुद्दा उठाया गया। “इन भूतिया स्कूलों को बंद करो” – यह मांग उठी। कुछ निलंबन हुए, लेकिन व्यवस्था वही रही। आख़िरकार 1991-92 में, जब डूब का खतरा सामने था और चिमलखेड़ी, निमगांव जैसे गांवों ने विस्थापन का विरोध करने का फैसला किया, तब आंदोलन ने एक नया कदम उठाया – अपने स्कूल शुरू किए। इसी तरह जीवनशालाओं का जन्म हुआ।

आज नर्मदा नवनिर्माण अभियान द्वारा चलाए जा रहे, ये स्कूल कभी भी सरकारी शिक्षा का स्थायी विकल्प बनने के लिए नहीं बनाए गए थे। वे उस खालीपन के जवाब में पैदा हुए, जिसे राज्य ने छोड़ दिया था। आज मध्य प्रदेश, और महाराष्ट्र के जलसिंधी, जीवन नगर, सवारिया दीगर, भाभरी, थुवानी, मणिबेली और मध्य प्रदेश के खरया भादल गांव में साथ जीवनशालाएँ चल रही हैं जिसमें आज भी लगभग 650-700 बच्चे 1 से चौथी कक्षा में पढ़ रहे हैं । कभी इनकी संख्या 12-14 हुआ करती थी, इनसे करीब हज़ारों बच्चे पढ़ कर निकले हैं ।   





आंदोलन के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ कक्षाएँ चलाना नहीं थी। सवाल था ऐसी शिक्षा कैसी हो जो आदिवासी समाज की भाषा, स्मृति और गरिमा का सम्मान करे। समय के साथ शिक्षकों की एक टीम जिनमें कई खुद आदिवासी युवा थे – ने मिलकर पाठ्यक्रम तैयार किया। मातृभाषा को महत्व दिया गया। पावरी और भीलाली भाषाओं में किताबें तैयार हुईं – “अमरा कन्या” और “अक्षरान उळखाण”। रानी काजल की कहानियाँ, जंगल और औषधीय पौधों का ज्ञान, भील विद्रोहों का इतिहास – सब बच्चों की किताबों में शामिल किया गया। पहली बार बच्चों को अपनी भाषा में पढ़ने का मौका मिला।

यहाँ पढ़ाई संघर्ष से अलग नहीं है। कई बार जीवनशालाओं की कक्षाएँ आंदोलन के धरनों में भी लगी हैं। बच्चे सत्याग्रहों में गए हैं, पुलिस शिविरों के सामने सवाल पूछे हैं। 1992 में जब डूब का पानी बढ़ रहा था, तब भी बच्चों ने स्कूल छोड़ने से मना कर दिया था। यहाँ शिक्षा का मतलब अधिकारों को समझना और उन्हें बचाना भी है। “लड़ेंगे जीतेंगे, सीखेंगे बढ़ेंगे” – यह नारा यहाँ सिर्फ लिखा नहीं रहता, जीया जाता है।

जीवनशालाएँ चलाने के लिए संसाधन हमेशा सीमित रहे हैं। अभिभावक अपने बच्चों को जीवनशाला में छोड़ जाते हैं, इस वादे के साथ कि कुछ पैसा या फिर कुछ अनाज देंगे, कुछ कम या ज़्यादा । कई लोग वह भी नहीं दे पाते, लेकिन आदिवासी समाज का सहयोग हमेशा हरेक कार्यक्रम में रहता है। इसलिए अगर किसी व्यावसायिक तरीके से चल रहे स्कूलों से तुलना नहीं कर सकते। बालमेला के दौरान जैसे हमेशा होता है सभी अतिथि और बच्चे जीवन नगर बसाहट में ही चार दिन रुके और हमारे खाने पीने का पूरा प्रबंध उन्होंने ही किया था।

यहाँ एक बड़ा सवाल भी उठता है – क्या राज्य इस वजह से और पीछे हट जाएगा क्योंकि आंदोलन ने खाली जगह भर दी है? अगर सरकारी स्कूल बंद होते गए, तो क्या जीवनशालाओं से हमेशा यह जिम्मेदारी निभाने की उम्मीद की जाएगी? शायद इसका जवाब साझेदारी में है – प्रशासन, आंदोलन और गांव समुदाय मिलकर शिक्षा की जिम्मेदारी साझा करें।



आज कई पुराने छात्र खुद इन स्कूलों में शिक्षक बन चुके हैं। बट्टे सिंह गुरुजी जैसे लोग शुरुआत से जुड़े हैं। नई पीढ़ी ने वहीं से नेतृत्व संभाला है। लतिका राजपूत, चेतन साळवे और योगिनी खानोलकर जैसे साथी इन स्कूलों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मेधा पाटकर का मार्गदर्शन लगातार मिलता रहता है।

वैसे में जब ढोल की आवाज़ धीरे-धीरे थमती है और बच्चे मैदान में कतारों में बैठ जाते हैं, तब समझ में आता है कि यह बाल मेला केवल उत्सव नहीं है। यह एक प्रमाण है कि जब राज्य पीछे हट जाता है, तब समुदाय अपने विकल्प बना सकते हैं; कि जनता के संघर्ष केवल विरोध नहीं करते, बल्कि अपने हिसाब और जनतांत्रिक तरीके से वैकल्पिक निर्माण और चुनौतियाँ भी खड़े करते हैं। इतने सालों में नर्मदा घाटी ने विस्थापन, अदालतों के फैसले, पुलिस कैंप और डूब सब देखा है, लेकिन उसी घाटी में बच्चे ढोल बजाते हैं, नाचते हैं, गाते हैं और अपने भविष्य की कल्पना करते हैं, नई आशाओं और उम्मीद के साथ, एक नए भारत का सपना बुनते हैं। संघर्ष और निर्माण – दोनों साथ-साथ के नारे के साथ। शायद यही जीवनशालाओं की सबसे बड़ी सीख है। जीवनशाला जिंदाबाद!


सुनीति और मधुरेश नर्मदा बचाओ आंदोलन के समर्थक रहे हैं और NAPM के कार्यवाहक दल के सदस्य हैं ।


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