मजदूर एकता केंद्र, भारत (डब्लू.यू.सी.आई) कार्यकर्ताओं व सम्बद्ध यूनियनों ने आज ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों के आह्वान पर अखिल-भारतीय बंद में हिस्सेदारी निभाई। ध्यान दें कि यह आह्वान भाजपा सरकार की मज़दूर विरोधी नीतियों, जैसे चार श्रम संहिताओं और हाल ही में किए गए भारत-अमरीका व्यापार समझौते के विरोध में किया गया था, जो असल में देश में मेहनतकश लोगों के हितों को पूरी तरह से निरस्त करने का काम करते हैं।
ध्यान दें कि यह व्यापार समझौता अमरीकी कंपनियों को भारत में व्यापार करने की खुली छूट देकर भारतीय मज़दूरों और किसानों के हितों को पूरी तरह से नुकसान पहुँचाती है। जहाँ कॉर्पोरेट घराने और कंपनियां इस समझौते का जश्न मना रहे हैं, वहीं कड़वी सच्चाई यह है कि ये कंपनियाँ अपने उत्पाद को अमरीकी बाजार में बेचने के लिए मज़दूरों का आती-शोषण करेंगी। इसके लिए, चार लेबर कोड पहले ही लागू किए जा चुके हैं। इसके अलावा, अमरीकी कृषि-व्यापार कंपनियाँ भारत के बहुसंख्यक छोटे और सीमांत किसानों की खस्ताहाल स्थिति का फ़ायदा उठाकर उन्हें और भी तबाह कर देंगी। इस समझौते का पूरा मकसद भारतीय मेहनतकश लोगों के हितों को भारतीय और विदेशी पूंजीपतियों के हितों के आगे नीलाम करना है।
यह भी ज्ञात हो कि सत्तारूण भाजपा सरकार द्वारा श्रम कानूनों का सरलीकरण करने के नाम पर मजदूरों के शोषण को बढ़ाने का काम किया जा रहा है| 2020 में लॉकडाउन के दौरान संसद में बिना किसी बहस के इन 4 संहिताओं को पारित किया जाना दिखाता है कि किस प्रकार भाजपा सरकार पूँजीपतियों और कॉर्पोरेटों को खुली छूट देने के लिए आमादा है| इस मजदूर-विरोधी योजना के पीछे सरकार व्यापार को बढ़ावा देने का बहाना बना रही है, जबकि इसके जरिए पूंजीपति वर्ग को मजदूरों का और भी अधिक शोषण करने का अवसर दिया जाएगा| साथ ही, काम के घंटे बढ़ाने और ठेका प्रथा को कानूनी जामा पहनाने के लिए भी प्रयास किए गए हैं|

श्रम संहिताएँ मजदूरों की छटनी को आसान बनाती हैं और इसके बरक्स मजदूरों का शोषण के खिलाफ विरोध करने का अधिकार भी छीना जा रहा है| श्रम संबंध कानून के तहत जहां पहले 100 लोगों तक की उद्यमों को मजदूरों की छटनी के लिए राज्य सरकार से इजाज़त नहीं लेनी पड़ती थी, वहीं अब 300 मजदूरों वाले उद्यमों तक को इसमें शामिल किया गया है| साथ ही, इस कानून के तहत किसी भी हड़ताल से पहले मजदूरों को 60 दिन का नोटिस देना अनिवार्य होगा| प्रभावी रूप से, इस कानून द्वारा पूँजीपतियों को तो कामगारों को काम से निकालने की आज़ादी दी जा रही है, लेकिन कामगारों का विरोध करने का भी अधिकार छीना जा रहा है| साथ ही, कामगारों की सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी कानून में सिर्फ कुछ ही कामगारों को लिया गया है, और कामगारों के एक बड़े हिस्से को इससे अलग रखा गया है, जबकि सरकार इन क़ानूनों द्वारा कामगारों के बहुसंख्यक हिस्से के लिए काम की स्थिति पहले से और भी ज्यादा बदतर बना रही है| ज्ञात हो कि व्यापार के लिए आसानी के नाम पर कंपनियों को कभी भी किसी को रखने, निकाल देने और कामगारों का वेतन मनमाने ढंग से तय करने का अधिकार दिया जा रहा है| साथ ही, इन संहिताओं द्वारा राज्य सरकारों को भी किसी भी श्रम कानून का पालन करने में कंपनियों को छूट देने की खुली आज़ादी है| इसके अतिरिक्त, मजदूरों द्वारा यूनियन बनाकर अपनी मांगों के लिए संघर्ष करने को और भी मुश्किल बना दिया गया है।
ज्ञात हो कि मौजूदा समय में भारत का कामगार वर्ग अतिशोषणकारी परिस्थितियों में काम करने को मजबूर है| आज भी बिनी किसी सुरक्षा के मानकों के पालन के मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी नीचे काम करने को मजबूर होना पड़ता है| छोटी फैक्ट्रियों में तो सिर्फ न्यूनतम मजदूरी का ही नहीं अन्य श्रम कानूनों का भी खुलेआम उल्लंघन किया जाता है| कम दाम में ज्यादा काम छोटी फैक्ट्रियों में बेहद आम है, जहां न्यूनतम मजदूरी से भी कम वेतन पर मजदूरों को 12-14 घंटे काम करने के लिए मजबूर किया जाता है| इन संहिताओं द्वारा अब कानूनी रूप से काम के घंटे 12 किए जा रहे हैं| ज्ञात हो कि अनौपचारिक क्षेत्र में मजदूर बेहद कठिन काम भी बिना किसी सुरक्षा साधनों के करने को मजबूर हैं| श्रम कानूनों में बदलाव कर के पूंजीपतियों का मुनाफा बढाया जा रहा है| हर क्षेत्र में ठेकेदारी प्रथा बढ़ी है जिसके कारण कंपनियाँ अपनी मनमर्जी से मजदूर को काम से निकल सकती है| ज्ञात हो देशी-विदेशी कम्पनियाँ श्रम कानूनों को पूरी तरह दरकिनार कर मजदूरों का शोषण कर रही हैं, जिसमें केंद्र सरकार उनका साथ दे रही है| प्राइवेट कंपनियों से नियंत्रण हटाने के नाम पर असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे भारत के बहुसंख्यक कामगारों को अति-शोषित करना और आसान किया जा रहा है|

मजदूर एकता केंद्र भाजपा सरकार द्वारा अमरीका से किए गए व्यापार समझौते और श्रम संहिताओं की कड़ी भर्त्सना करता है और तुरंत इन्हे रद्द करने की मांग करता है| साथ ही, यूनियन मांग करता है कि श्रम क़ानूनों के दायरे में सभी कामगारों को लाया जाए, खासकर अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले बहुसंख्यक मज़दूरों को जो श्रम क़ानूनों के दायरे से अब तक बाहर रहे हैं| मजदूर एकता केंद्र ऐलान करता है कि आने वाले समय में भाजपा सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ आंदोलन को तीव्र किया जाएगा|
दिनेश कुमार
सदस्य, कार्यकारिणी
मजदूर एकता केंद्र,भारत (डब्ल्यू.यू.सी.आई)
प्रेस विज्ञप्ति

