हम दोनों साथ बैठे हुए थे और यही सोच रहे थे कि इस अनुभव को कैसे कहा जाए। हम वही कह सकते हैं जो हमने जिया है, देखा है, और महसूस किया है। और सच कहें तो मनरेगा हमारे लिए सिर्फ़ रोज़गार की एक योजना नहीं रहा। वह उससे कहीं आगे चला गया। उसने लोगों की ज़िंदगी को, ख़ासकर महिलाओं की ज़िंदगी को, गहरे स्तर पर छुआ। उसने सोच बदली, रिश्ते बदले, और सत्ता से बात करने का तरीका बदला।
मनरेगा ने यह अहसास पैदा किया कि सरकार कोई दूर बैठी हुई चीज़ नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था है जिससे सवाल किया जा सकता है, जिससे काम माँगा जा सकता है, और जिसे जवाबदेह ठहराया जा सकता है। बहुत सी महिलाओं और ग़रीब परिवारों के लिए यह पहला मौका था, जब वे ब्लॉक दफ़्तर गए, अफ़सरों से बात की, काम की माँग रखी, काम क्यों नहीं और समय पर मजदूरी भुगतान क्यों नहीं – इसका जवाब माँगा। यह सब सिर्फ़ काम के लिए नहीं था — यह एक राजनीतिक अनुभव था, जिसमें लोगों ने पहली बार अपनी ताक़त पहचानी।

अगर देखें तो महिलाओं के सशक्तिकरण पर काम नया नहीं है। 70–80 के दशक से ही महिलाओं को संगठित करने, उन्हें बोलने, सोचने और अपने जीवन को लेकर फ़ैसले लेने की प्रक्रिया चल रही थी। हम खुद 1991 के आसपास इस काम से जुड़े। गाँवों में लोग एकजुट होने लगे, बैठकों का दौर चला, महिलाओं में चेतना आई। लेकिन मनरेगा ने इस पूरे सशक्तिकरण के साथ एक ऐसी चीज़ जोड़ दी, जो बहुत सी दूसरी पहलों में नहीं थी — सीधा और तुरंत आर्थिक सशक्तिकरण।
उत्तर प्रदेश के हमारे अनुभव में, खासकर सीतापुर जैसे इलाक़ों में, मनरेगा के शुरुआती दौर में महिलाओं का काम पर निकलना बिल्कुल आसान नहीं था। कई जगह महिलाओं को काम के स्थलों से भगाया गया। समाज का यह मानना था कि अगर महिला घर में काम करे तो ठीक है, लेकिन अगर वह तालाब खोदने जाए, चकरोड काटे, मिट्टी ढोए—तो यह उसके और उसके परिवार के “सम्मान” के ख़िलाफ़ है। यह सम्मान भले “झूठा” था, लेकिन समाज में उसकी पकड़ बहुत मज़बूत थी।
एक डर यह भी था कि अगर महिलाएँ बराबर काम करेंगी और बराबर मज़दूरी पाएँगी, तो खेतों में भी उन्हें बराबर मज़दूरी देनी पड़ेगी। दूसरा डर यह कि अगर उनके हाथ में पैसा आ गया, तो वे ज़्यादा बोलेंगी, सवाल करेंगी। इसलिए महिलाओं को बाहर निकलने से रोकने की पूरी कोशिश की गई।
लेकिन हालात बदल रहे थे। ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में महँगाई बढ़ रही थी, ज़रूरतें बढ़ रही थीं, संयुक्त परिवार टूट रहे थे, खेती की जोत छोटी होती जा रही थी। खेती से अब घर नहीं चल पा रहा था। ऐसे में मनरेगा ने एक दरवाज़ा खोला। हर जगह नहीं, लेकिन जहाँ-जहाँ लोग थोड़ा भी संगठित हो पाए, वहाँ यह सवाल उठा — क्या चोरी करके, उधार लेकर, अपमान सहकर जीना बेहतर है, या फिर खुलेआम मेहनत करके, तालाब खोदकर, सड़क बनाकर रोज़ी कमाना?
महिलाओं ने खुद कहा — हम चोरी नहीं कर रहे, हम मेहनत कर रहे हैं। और जैसे-जैसे यह उदाहरण बनता गया, वैचारिक सशक्तिकरण और आर्थिक सशक्तिकरण साथ-साथ चलने लगे। यह कोई चमकदार सशक्तिकरण नहीं था, बल्कि बहुत ज़मीनी, बराबरी वाला सशक्तिकरण था। आज भी कई जगह यह कमजोर है, लेकिन जहाँ यह जुड़ पाया, वहाँ महिलाओं की ज़िंदगी सचमुच बदली।
इसके साथ गाँव और प्रशासन के रिश्ते भी बदले। पहले योजनाओं के नाम पर लोग हाथ जोड़ते थे। यह सदियों पुरानी आदत थी — साहब के सामने हाथ जोड़ो, शायद कुछ मिल जाए। मनरेगा ने पहली बार यह एहसास दिया कि हम अधिकार से माँग सकते हैं, हम सवाल कर सकते हैं। हालाँकि यह भी सच है कि कई जगह मनरेगा को प्रधान की योजना बना दिया गया — लोग कहने लगे कि प्रधान अच्छा नहीं है, इसलिए योजना नहीं चल रही।
लेकिन जहाँ लोग थोड़ा भी संगठित हुए, वहाँ अचानक यह समझ बनी कि हम प्रधान से, सचिव से, रोजगार सेवक से बात कर सकते हैं। शिकायत कर सकते हैं। आरटीआई और दूसरी प्रक्रियाओं का भी योगदान रहा, लेकिन मनरेगा ने मज़दूरों और महिलाओं को एक जबरदस्त ताक़त दी। पहले जिन अधिकारियों के स्वागत में गाँव सजता था, वही अधिकारी अब गाँव वालों से पूछने लगे—काम कहाँ होना चाहिए? कौन सा रास्ता ठीक रहेगा? तालाब कहाँ बने?
इससे लोगों को यह एहसास हुआ कि यह उनका गाँव है, उनकी योजना है। वे नक़्शा देखते, अनुमान समझते, सवाल पूछते। डर कम हुआ, नज़दीकी बढ़ी। योजना बनाने का हक़ धीरे-धीरे लोगों के हाथ में आने लगा।

हम अपने इलाके का एक उदाहरण देते हैं — एक दलित गाँव है जहाँ 60–70 के दशक में उन्हें सरकारी पट्टे मिले थे, लेकिन ज़मीन ऐसी थी — नदी किनारे, बलुई, झाड़-झंखाड़ से भरी — कि कागज़ में ज़मीन थी, हक़ीक़त में खेती नहीं थी। मनरेगा के ज़रिये वहाँ ज़मीन का समतलीकरण हुआ। आज उसी ज़मीन पर गेहूँ की फसल है — कमज़ोर सही, लेकिन फसल है।
पहले जब अनाज नहीं होता था, तो लोग मजबूर होकर दूसरों से उधार लेते थे — एक क्विंटल लेकर डेढ़ क्विंटल लौटाते थे। यह एक तरह की बंधुआ मज़दूरी थी। जैसे ही मनरेगा से ज़मीन ठीक हुई, अनाज आया, यह सिलसिला टूटा। आज वही लोग कहते हैं — आज हम अपना बोएँगे, कल तुम्हारा बो देंगे। यह बदलाव सिर्फ़ रोज़गार का नहीं, रिश्तों का भी था।
इसी के साथ गाँव की सत्ता संरचना भी बदली। पहले प्रधान, सचिव — ज़्यादातर ताक़तवर जातियों से होते थे। मनरेगा ने पहली बार कमज़ोर तबकों के हाथ में भी ताक़त दी। दलित प्रधान बने, दलित महिलाओं ने सवाल उठाए। इससे गाँव का समाजीकरण बदला — धीरे, लेकिन गहराई से।
हमारे लिए मनरेगा सिर्फ़ काम का कानून नहीं था। यह लोगों को यह सिखाने वाला अनुभव था कि अधिकार माँगे जाते हैं, कि संगठन से ताक़त आती है, कि पैसा सिर्फ़ पेट नहीं भरता — वह इंसान को थोड़ा मज़बूत भी बनाता है। आज जब इस क़ानून को कमज़ोर किया जा रहा है या ख़त्म किया जा रहा है, तो सिर्फ़ रोज़गार नहीं छीना जा रहा। वह पूरा राजनीतिक अनुभव, वह आत्मविश्वास, वह सामूहिक ताक़त भी छीनी जा रही है। लेकिन यह भी सच है कि इस प्रक्रिया में लोगों ने यह सीख लिया है कि संगठित होकर बोलना ही रास्ता है। यह सीख आसानी से मिटने वाली नहीं है।
(ऋचा सिंह और सुरबाला संगतिन किसान मज़दूर संगठन, सीतापुर, उत्तर प्रदेश से सम्बद्ध हैं)

