पुस्तक समीक्षा: गौहर रज़ा की ‘मिथकों से विज्ञान तक’ को पढ़ते हुए


गौहर रज़ा की पुस्तक ‘मिथकों से विज्ञान तक’ हमारे सामने ब्रह्मांड और सृष्टि के बनने की कहानी को सुंदर तरीके से पेश करती है। इतनी सरलता से जैसे कि हम कोई कहानी सुन रहे हों। इस जटिल कहानी को सरलता से बयान कर पाने के लिए उनका लम्बा अनुभव और संवाद जिम्मेदार है।

अपनी पुस्तक में आभार प्रकट करते हुए वह कहते हैं कि मेरे विचारों को ढालने में हजारों नहीं तो सैकड़ों लोगों ने मेरी मदद की है, जिनमें स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी, कुंभ मेले में आए श्रद्धालु और टीवी बहसों में टकराने वाले धर्माचार्य शामिल हैं। इस पुस्तक के लिखने से पहले इस विषय पर उनके संवाद को बेहतर बनाने का काम जन विज्ञान आंदोलन ने किया। इससे जुड़ने के अपने अनुभव के बारे में वे कहते हैं:

“अस्सी के दशक में जन-विज्ञान जत्था आयोजित हुआ। मैं भी इसके आयोजन का हिस्सा था। मानव इतिहास में विज्ञान के सवालों पर कोई इतना व्यापक आंदोलन, शायद पहले कभी नहीं हुआ। चालीस दिन में पाँच करोड़ लोगों तक पहुँचना, वह भी विज्ञान की जानकारी, सिद्धांत व दृष्टिकोण लेकर, आसान नहीं था। पर हमारे देश में उस वक़्त उभरते हुए जन-विज्ञान आंदोलन ने ये कर दिखाया। मेरी ज़िंदगी में इस आंदोलन में भाग लेना एक अहम मोड़ साबित हुआ। अवाम से सीधे रूबरू होने पर एक बात साफ़ थी कि आम नागरिक आधुनिक वैज्ञानिक जानकारी का भूखा है। हर तबक़े, हर जाति, हर प्रांत में रहने वाले लोगों में जिज्ञासा का स्तर एक जैसा था।”

सृष्टि की उत्पत्ति के संबंध में लेखक ने विभिन्न धर्मों, विभिन्न जनजातियों में प्रचलित विश्वासों को सामने रखा है और उसके बाद विज्ञान सृष्टि की उत्पत्ति के संदर्भ में क्या बताता है इस बारे में लिखते हैं। किस प्रकार से प्रारम्भिक मानव द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति के संदर्भ में जो सवाल पूछे गए वह कितने सरल हैं और उसी तरह के सरल जवाबों से वह संतुष्ट हो गया। पर जैसे-जैसे मानव सभ्यता ने प्रगति की मानव द्वारा उठाए गए सवाल भी जटिल होते गए और उनके जटिल उत्तर भी तलाशे जाने लगे। किस प्रकार से धर्म-दर्शन में आत्मा का विचार विकसित किया और कब पुनर्जन्म का विचार आकर इसमें जुड़ गया होगा इन सबके बारे में पढ़ना-जानना बहुत रोचक लग रहा था।

एक सवाल यह है कि स्कूल के स्तर तक तो हम सब लोग अनिवार्य रूप से विज्ञान की पढ़ाई करते हैं लेकिन विज्ञान का वह ज्ञान हमारे जीवन और बुद्धि-विवेक का सहज हिस्सा क्यों नहीं बन पाता? उन सिद्धांतों को पढ़ने और जानने के बाद भी हम अपने रूढ़िवादी और परंपरा से प्राप्त विचारों को ही जीवन में क्यों ढोते रहते हैं?

इस बारे में गौहर रज़ा पाउलो फ़्रायरे की ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ पुस्तक को उद्धृत करते हुए बताते हैं:

“दार्शनिक पाउलो रेग्लुस नेवस फ़्रायरे (1921–1997) ने अपनी मशहूर किताब पेडागॉजी ऑफ़ दि ऑप्रेस्ड में ‘शिक्षा का बैंकिंग मॉडल’ कहा है। इसमें कहा गया है कि ‘जानकारी दिमाग़ों में जमा कर दो और परीक्षा देते वक़्त निकाल लो,’ ऐसी शिक्षा नागरिक के व्यक्तित्व का विकास नहीं करती और दी गई जानकारी छात्र के दृष्टिकोण का हिस्सा नहीं बनती। उनके अनुसार शिक्षा की इस पद्धति का समाज से कोई लेना-देना नहीं होता– बस, जानकारी जमा करो और जानकारी उगल दो। जानकारी का समाज में उठ रहे सवालों से, अपने माहौल से, आसपास की घटनाओं से और सामाजिक बदलाव लाने से कोई रिश्ता नहीं रहता। शिक्षा की यह पद्धति हमारे देश में, ख़ास तौर से विज्ञान पढ़ने वालों पर, थोपी जाती है। इसलिए विज्ञान के विद्यार्थी भी ऐसे सवाल कि ‘विज्ञान क्या है’, ‘इसका धर्म और समाज से क्या रिश्ता है’, सुन कर असमंजस में पड़ जाते हैं। शिक्षा के दौरान ये सवाल उनकी कल्पना से ही बाहर कर दिए जाते हैं।”

“विज्ञान के सफ़र को जारी रखने के लिए ज़रूरी है सामाजिक अमन, चैन, आपसी मुहब्बत और भाईचारा। ऐसा हर समाज जो हिंसा के रास्ते पर चल रहा हो ज़्यादा देर तक विज्ञान के रास्ते पर नहीं चल सकता। हिंसा, नफ़रत और युद्ध विज्ञान के रास्ते की सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। वैज्ञानिकों को कोई भी समाज जो सबसे बड़ा तोहफ़ा दे सकता है, वो है डर से निजात और सुकून। डर से निजात इसलिए, कि वो बेबाक सवाल पूछ सकें और सुकून इसलिए, कि वो इन बेबाक सवालों के जवाब तलाश कर सकें।”

यहां पर लेखक ने डर से निजात और सुकून की बात वैज्ञानिक के लिए कही है। पर हर विद्यार्थी को, हर अध्ययनशील व्यक्ति को यदि भयमुक्त माहौल मिले और सुकून मिले तो शायद वह किसी बेहतर खोज में लग सके। अपने देश में तो पढ़ने वालों को शुरूआत से ही भविष्य का भय दिखा-दिखा कर काबू में करने की कोशिश शुरू हो जाती है। अभी मेहनत करो तो बाद में चलकर कभी सुकून और आराम मिलेगा। लेकिन शिक्षा का मतलब यह तो नहीं है कि दिमाग को तथ्यों, सूचनाओं और आंकड़ों से भर लिया जाए।

जिद्दू कृष्णमूर्ति के अनुसार शिक्षा का अर्थ केवल जानकारी या कौशल प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वयं को समझना, दुनिया को समझना, स्वतंत्र और करुणामय मस्तिष्क विकसित करना है, जहाँ किताबें रटने की जगह जिज्ञासा को बढ़ावा दिया जाए, ताकि व्यक्ति जीवन की वास्तविकताओं का सामना बिना डर और पूर्वाग्रह के कर सके। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को जीवन की समग्र प्रक्रिया से जोड़ना है, न कि केवल तकनीकी या व्यावसायिक सफलता दिलाना। 

गौहर रज़ा की इस पुस्तक को एक बार जरूर पढ़ना चाहिए। हम आशा करते हैं कि इस पुस्तक के माध्यम से हिन्दीभाषी समाज में विज्ञान के ज्ञान का बेहतर ढंग से प्रचार-प्रसार होगा।


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