बात शुरू होती है ख़्वाजा अहमद अब्बास के एक ख़त से, जो वे उस बच्चे के नाम लिखते हैं जो पन्द्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस को पैदा हुआ है। ख़्वाजा अहमद अब्बास उस नवजात को बताते हैं कि इस मुल्क की आजादी के लिए हमारी आम जनता ने कितनी कुर्बानियां दी हैं और इसे याद रखा जाय- यह हमारी, अवाम की आजादी है और इसे हमने अपने खून-पसीने से हासिल किया है इसलिए यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इसे बिल्कुल वैसे ही याद रखें जैसे इसे याद रखा जाना चाहिए।
ख़्वाजा अहमद अब्बास के इस खत का आधार लेकर भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) इंदौर की शानदार नाट्य प्रस्तुति ‘गुलों में रंग भरे- तराना-ए-आज़ादी’, बीते 12 अगस्त की शाम दिल्ली स्थित जवाहर भवन में हुई। यह नाटक ख़्वाजा अहमद अब्बास मेमोरियल ट्रस्ट, राजीव गांधी फाउन्डेशन और भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का संयुक्त आयोजन था। इस नाटक के आयोजन में भारतीय महिला फेडरेशन, बालिगा ट्रस्ट और अनहद का सहयोग था।
उल्लेखनीय है कि इप्टा की इंदौर इकाई की प्रस्तुति इसके पहले 1950 के दशक में दिल्ली में हुई थी जिसमें तब के युवा इप्टा कलाकार नरहरि पटेल, प्रोफ़ेसर मिश्रराज आदि शामिल हुए थे। इस बार नाटक का आकल्पन जया मेहता ने किया और इसकी पटकथा प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव, कवि, पत्रकार और रंगकर्मी विनीत तिवारी लिखी। सुप्रसिद्ध अभिनेत्री और निर्देशक फ्लोरा बोस के कुशल के निर्देशन में इंदौर इप्टा के रंगकर्मियों ने अपने सहज सजीव अभिनय से इस नाटक को यादगार बना दिया।

‘तराना-ए-आज़ादी’ नाटक देश की आज़ादी में शामिल आम लोगों के संघर्षों को अपना सलाम पेश करता है और बिना आज के हालात पर टिप्पणी किये इस तरह अतीत को प्रस्तुत करता है कि अगर लोग सही मायने में अपने अतीत को समझ लें तो साम्प्रदायिकता और जातिभेद जैसी आज की समस्याओं से भी निजात पायी जा सकती है।
15 अगस्त को मिली एकमुश्त आज़ादी से पहले ही चिमूर, बलिया, मिदनापुर, सतारा आदि अनेक जगहों पर अवाम ने चन्द दिनों, महीनों के लिए ही सही, आज़ादी के अहसास को महसूस किया और सदियों की गुलामी में जीने की बजाय आज़ादी के लिये संघर्ष करना स्वीकार किया। यह लड़ाई देश की जनता की थी जिसने उसे जाति, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठकर एक होना सिखाया।
यह नाटक हमारे स्वतंत्रता संग्राम के 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ से लेकर 1947 तक के दौर को दर्ज़ करता है। नाटक हमारे समय के बेहतरीन और मक़बूल शायरों के गीतों से सजा है जिन्हें गाकर आज़ादी के मतवालों ने उन गीतों को नारों में ढाल लिया था।
मख़्दूम मोहिउद्दीन का तराना जो जंगे आज़ादी की लड़ाई में अवाम का कौमी तराना बन गूंज रहा था, आज भी आप इसे सुनकर उस दौर के जोश का अनुभव कर सकते हैं।
‘ये जंग है जंगे आज़ादी,
आज़ादी के परचम के तले।
हम हिन्द के रहने वालों की,
महकूमो की, मजबूरों की
आज़ादी के मतवालों की,
दहक़ानों की, मज़दूरों की
ये जंग है जंगे आज़ादी
आज़ादी के परचम के तले।’
शैलेन्द्र सागर का गीत – ‘तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर’; बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के ‘वंदेमातरम’, नरसी मेहता के भजन ‘वैष्णव जन’ जैसे गीत इस नाट्य प्रस्तुति को एक यादगार बना देते हैं।
नाटक में रंगमंच की साज-सज्जा बिल्कुल साधारण ही थी और ऐसा करना निर्देशक की प्रतिभा का कमाल ही कहा जाना चाहिए। दरअसल, नाटक उस समय के हिंदुस्तान की सीधी सादी साधारण अवाम के बारे में है। रंगमंच का साधारण होना, बड़े बड़े काले पैनल का प्रयोग, जनता की अभावग्रस्त स्थिति को ही प्रतिबिम्बित करता है और उस विरोध को भी जिसके लिए देश एकजुट हुआ। यह नाटक बंबई की मिलों में काम करने वाले मजदूरों के बारे में है, कई दिनों तक पैदल चलकर जलूस में शामिल होने आने वाले किसानों के बारे में है, चिमूर, बलिया, मिदनापुर, सतारा में गोली खाकर मरते शहीदों के बारे में है। यह नाटक बंबई में 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में तिरंगा फहराती अमर नायिका अरुणा आसिफ अली के बारे में भी है।
यह नाटक वास्तव में हम सब के बारे में है। हमारी चेतना का एक अंश तो निसंदेह हमारे इतिहास से, अतीत से जुड़ा हुआ ही है। हमें इसका सम्मान बनाये रखना है। हमें यह याद रखना है कि कितने संघर्षों और बलिदानों के बाद हमें आज़ादी मिली है। इस नाट्य प्रस्तुति को याद रखा जाना चाहिए। स्मृतियों को विकृत करने के प्रयास होते रहे हैं लेकिन आज ये प्रयास ज्यादा सुनियोजित हो गये हैं। आज़ादी के आंदोलन का पुनर्लेखन हो रहा है। नये नायक आरोहित किये जा रहे हैं और वास्तविक नायकों के नाम इतिहास से मिटाये जा रहे हैं।


ख़्वाजा अहमद अब्बास का वह खत, जो इस नाटक के केंद्र में है, दरअसल हम सब के लिए है। यह खत यह जिम्मेदारी हम सब पर आयद करता है कि इसे याद रखा जाये।
नाटक के आख़िरी हिस्से में मंच पर किरदारों के तौर पर पृथ्वीराज कपूर, जोहरा सहगल, कृष्ण चंदर, राज कपूर और अन्य लोग आये, तब जो उत्सव का माहौल पैदा हुआ, उसने दर्शकों की पलकों की कोरों को ख़ुशी की तरलता से भिगो दिया। एक दृश्य में आज़ाद हिंद फ़ौज के प्रसिद्ध जांबाजों ढिल्लो, सहगल, शाहनवाज़ का ज़िक्र आता है और उनकी तस्वीरें नुमायां की जाती हैं। नाटक के बाद पता चला कि दर्शकों में जोहरा सहगल की बेटी और प्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना पद्मश्री किरण सहगल तथा शाहनवाज़ ख़ान की पड़पोती निमरा ख़ान भी अपने परिजनों सहित मौजूद थीं और उन्हें भी नाटक भीतर तक ख़ुश कर गया।
नाट्य प्रस्तुति के दौरान ख़्वाजा अहमद अब्बास मेमोरियल ट्रस्ट की चेयरपर्सन मक़बूल लेखिका, शिक्षाविद, संस्कृतिकर्मी, ख्वाजा अहमद अब्बास की भतीजी और नारी अधिकारों के हक में बुलंद आवाज़ डॉ. सईदा हमीद की उपस्थिति रही। डॉ. सईदा हमीद ने मंच पर अपने पिता ख़्वाजा अहमद अब्बास के उस खत का भी पाठ किया जो इस नाटक का आधार बना।
इस नाट्य प्रस्तुति को देखने के लिए प्रमुख रूप से जोहरा सहगल की पुत्री किरण सहगल, इप्टा संगठन के संस्थापक नेमिचंद जैन की पुत्री और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की पूर्व निदेशक कीर्ति जैन, अनहद की शबनम हाशमी, सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के प्रमुख सेनानी शाहनवाज ख़ान की पड़पोती निमरा ख़ान एवं उनके परिजन, भारतीय महिला फेडरेशन की अध्यक्ष मंडल सदस्य, कामरेड एनी राजा, भारतीय महिला फेडरेशन की राष्ट्रीय महासचिव निशा सिद्धू, अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजन क्षीर सागर, आप पार्टी के पूर्व विधायक पंकज पुष्कर के अलावा अरुणा आसफ अली की सहयोगी रंजना रे स्वास्थ्यगत परेशानियों के बावजूद व्हीलचेयर पर नाटक देखने आयीं।
इस नाटक के अधिकाधिक प्रदर्शनों से ख्वाजा अहमद अब्बास का वह ख़त और उनका हिंदुस्तान की सच्ची जम्हूरियत का ख़्वाब और दूर तक पहुंचेगा।

[9 सितम्बर 1969 को कानपुर में जन्म। मूलतः कलाकार और कवि। साहित्य और संगीत से प्रेम। चित्रों, कविताओं, संस्मरणों के माध्यम से पिछले तीस सालों से सांस्कृतिक कार्य। कला में योगदान के लिए 1995 में उत्तरप्रदेश के राज्यपाल द्वारा ‘राष्ट्रीय युवा पुरस्कार’ से सम्मानित। कला यात्रा जारी है। देश की महत्वपूर्ण कला दीर्घाओं में लगभग पचास से अधिक कला प्रदर्शनियां। संपर्क: paint.pankaj@gmail.com]


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